कुपोषण पर काबू किए बगैर फिट नहीं हो सकता इंडिया

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०- दिनेश गुप्ता

मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में सरकार ने कुपोषण से होने वाली मौतों के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में जो जानकारी दी थी, उसमें बताया गया था कि हर दिन 92 बच्चों की मौत हो जाती है। कुपोषण से होने वाली मौतें सरकार की सेहत को खराब नहीं करती हैं। कुपोषण भी सरकारी अफसरों और नेताओं को सेहममंद रखने का माध्यम भर है। भारतीय संस्कृति में बच्चों के मुंह का निवाला छीनना पाप का कारक माना जाता है। पिछले कुछ सालों से राजनीति में भारतीय संस्कृति की दुहाई हर मोड़ पर हर घटना के साथ दी जाती है। नसीहत देने वाले भी भारतीय संस्कृति से कोसों दूर नजर आते हैं। बच्चों के आहार देने में भी इनकी नीयत बिगड़ जाती है। राजनीति में नीयत का उपयोग भी जुमले की तरह किया जाता है। नीयत साफ है या नहीं यह योजनाओं के क्रियान्वयन में दिखाई दे जाता है। देश भर में शायद ही कोई ऐसा राज्य हो, जिसका मुख्यमंत्री बच्चों की सेहत को प्राथमिकता में सबसे ऊपर रखता हो? देश के खेल मंत्री राजवर्धन सिंह राठौर ने फिट इंडिया चैलेंज का शिगूफा छोड़ा तो प्रधानमंत्री सहित तमाम जानीमानी हस्तियां अपने फिटनेश का राज सोशल मीडिया पर बताने लगे। देश की किसी भी हस्ती ने कुपोषित बच्चों की स्थिति पर चिंता प्रकट नहीं की।

जनसंख्या, स्वास्थ्य का विकास के बीच मजबूत संबंध है। यद्यपि, भारत विकास दर के मामले में उन देशों से मुकाबला करता है जो निरंतर उच्च विकास दर का लाभ उठाते हैं, जैसे चीन, जापान, मलेशिया एवं कोरिया लेकिन स्वास्थ्य परिणामों के संदर्भ में यह पिछड़ रहा है। भारत में केरल तमिलनाडु और पंजाब जैसे कुछ राज्य ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। भारत के खराब स्वास्थ्य के लिए कम आर्थिक विकास वाले देशों जैसे नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान से तुलनीय है। भारत के खराब स्वास्थ्य परिणाम कई कारणों से है। यह भारत के आर्थिक विकास की कहानी के अनुरूप नहीं है। भारत में स्वास्थ्य के अच्छे बुनियादी ढांचे के विकास और सभी के अच्छे स्वास्थ्य को सुनिश्?चित करने में राज्यों की भूमिका बहुत नाजुक और महत्वपूर्ण है।

मध्य प्रदेश उन स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है, जो उच्च मातृ एवं बाल मृत्यु दर में योगदान देती है। इन समस्याओं में रक्तहीनता, वयस्कों और बच्चों के बीच कुपोषण, बचपन की बीमारियाँ और कई संक्रामक रोग सम्मिलित हैं। मध्य प्रदेश को सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के अंतर्गत निर्धारित महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने और स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न संकेतकों को सुधारने के लिए मिलेनियम डेव्हलपमेंट गोल (एमडीजी) के छूटे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए तेजी से काम करने की जरूरत है।

माइक्रोन्यूट्रियेंट कुपोषण (एमएनएम), को चिकित्सीय भाषा में छिपी हुई भूख के रूप में जाना जाता है। इसमें व्यक्ति के अंदर लौह (आयरन), फॉलिक एसिड, विटामिन ए और डी एवं आयोडीन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है। पोषण सुरक्षा और नागरिकों के सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए एमएनएम सर्वोपरि मुद्दा बन जाता है। पूर्व में एमएनएम को केवल विकासशील और अविकसित दुनिया के लिए एक पहेली माना जाता था। हाल ही के एक शोध ने इस मिथक को खारिज कर दिया है एवं यह सिद्ध किया है कि विटामिन बी 12 और विटामिन डी जैसे माइक्रोन्यूट्रियेंट की कमी सबसे समृद्ध व्यक्तियों में भी विद्यमान है। एमएनएम सभी आयु समूहों को प्रभावित करता है; इसकी चपेट में विशेष रूप से बच्चे और महिलाएं आती हैं। एनएफएचएस-4 के आंकड़ों के अनुसार पर्याप्त आहार पाने वाले 6 से 23 महीने के बच्चे इस आयु समूह में भारत की कुल जनसंख्या का प्रतिशत 9.68 प्रतिशत है, और मध्य प्रदेश के लिए यह आंकड़ा केवल 6.6 प्रतिशत है।

देश की आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ रखने की पहली जिम्मेदारी सरकार की है। मध्यप्रदेश में सत्तर लाख से अधिक बच्चे कम वजन वाले हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक कार्यक्रम में अपने भाषण में जोर देकर कहा था कि गरीबों के बच्चे तंदरूस्त पैदा होने चाहिए। कई दावे भी मुख्यमंत्री की ओर से किए गए थे। मुख्यमंत्री ने वे तमाम योजनाएं भी गिनाई थीं, जिनके जरिए सरकार महिला के गर्भधारण से लेकर बच्चे के छह वर्ष के होने तक मोटी रकम खर्च कर रही है। बच्चों को कुपोषण से बचाने का बजट ही बारह सौ करोड़ रुपए से अधिक बताया जाता है। राज्य में अस्सी लाख से अधिक बच्चों को पूरक पोषण आहार दिया जा रहा है। ये बच्चे नब्बे हजार से अधिक आंगनबाडिय़ों और मिनी आंगनबाडिय़ों के हैं। भारत सरकार के मापदंडों के अनुसार हर बच्चे पर प्रतिदिन आठ रुपए खर्च किए जाते हैं। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों पर बारह रुपए प्रतिदिन का प्रावधान है। इतने में तो फिट इंडिया चैलेंज को स्वीकार करने वाले लोगों की पानी की एक बॉटल भी नहीं आती। चाय की कीमत भी इससे ज्यादा ही होती है। वैसे भी अपने आपको फिट दिखाने की प्रतिस्पर्धा में शामिल रहने वाला वर्ग का भोजन कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन से भरपूर होता है। शीर्ष पदों पर बैठने वाले राजनेता या नौकरशाह को शायद ही किसी ने विटामिन की कमी से जूझते देखा हो? जबकि गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को हर दिन आठ सौ कैलोरी आहार दिया जाना होता है। सामान्य बच्चे के लिए पांच सौ कैलोरी प्रतिदिन की मात्रा निर्धारित है। पिछले साल फरवरी में भारत सरकार ने कुपोषण को काबू में करने के लिए कुछ दिशा निर्देश जारी किए थे। इसके तहत तीन वर्ष से छह वर्ष तक के बच्चों को सुबह का नाश्ता और पका हुआ भोजन, छह माह से छत्तीस माह के कुपोषित बच्चे को 800 कैलोरी तथा बीस से पच्चीस ग्राम प्रोटिनयुक्त घर ले जाने वाला राशन देने का प्रावधान किया गया। तीन से छह वर्ष के बच्चों के लिए अतिरिक्त पूरक आहर की भी व्यवस्था करने के लिए कहा। भारत सरकार के निर्देशों के बाद राज्य में पोषण आहार की वितरण व्यवस्था में भी परिवर्तन किया जाना है। वर्तमान टेकहेम राशन की योजना में बच्चों और गर्भवती महिला को सप्ताह में पांच दिन अलग-अलग मैन्यू के अनुसार आहार दिया जाता है। इसमें सोया बर्फी से लेकर हलुआ, खिचड़ी भी शामिल है। यह व्यवस्था वर्ष 2009 से चली आ रही है। बच्चे इसके बाद भी कुपोषित हैं। बच्चों को निवाला देने की जिम्मेदारी से जुड़े लोगों के बच्चे करोड़ों के आसामी हो गए। सरकार एमपी एग्रो के जरिए इस योजना को चलाती थी। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश थे कि पोषण आहार की व्यवस्था में किसी भी तरह का बिचोलिया नहीं होना चाहिए। मध्यप्रदेश के अफसरों ने अक्लमंदी दिखाई। पोषण आहार का काम एमपी एग्रो को दे दिया। वैसे ही जिस तरह विभाग लघु उद्योग निगम के जरिए खरीदी करते थे। लघु उद्योग निगम सिर्फ दरों का अनुबंध सप्लायरों से करता है। पोषण आहार का मामला एग्रो को देने से सरकार अदालत की अवमानना से बच गई। एमपी एग्रो ने ठेकेदरों के साथ अनुबंध कर लिया। राज्य में बढ़ते कुपोषण पर जब विवाद बढ़ा तो मुख्यमंत्री ने पोषण आहार का वितरण महिला स्व सहायता समूह से कराने का एलान कर दिया। महिला स्व सहायता समूह राज्य के सिर्फ 26 जिलो में हैं। यह समूह पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत चलाए जाने वाली आजीविका परियोजना के अधीन है। परियोजना का संचालन सिर्फ अफसर करते हैं। विभागीय मंत्री की इसमें कोई प्रशासनिक भूमिका नहीं होती।

मुख्यमंत्री और उनकी नौकरशाही की नीयत कितनी साफ है, इसे जानने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट को देखा जा सकता है। समिति ने सिफारिश की कि स्व सहायता समूहों के परिसंघ के माध्यम से रेडी टू ईट टेक होम राशन प्रदाय किया जाए। जिन्हें राज्य के महिला स्व सहायता समूह की स्थिति मालूम है, वे इस तथ्य से भी वाकिफ होंगे कि समूह की क्षमता कितनी है। भारत सरकार और कोर्ट के निर्देश स्पष्ट हैं कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों का पालन भी कड़ाई से किया जाए। इसमें सुरक्षा मानकों का पालन भी प्रमुख है। नौकरशाही ने प्रक्रिया को इतना लंबा कर दिया है कि स्व सहायता समूहों के लिए पोषण आहार का काम करना मुश्किल भरा होता जाएगा। समूहों का परिसंघ सहकारी बनाए जाने का निर्णय है। अगस्त 2018 तक प्रक्रिया पूरी करना है। राज्य में कुल जिलों की संख्या 51 है। पोषण आहार के मामले में सरकार की नीयत पर सवाल उठने की और भी कई वजह हैं। जहां स्व सहायता समूह अभी काम कर रहे हैं, वहां महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा उनके बिलों का ही भुगतान नहीं किया जा रहा है। बाजार की उधारी बढ़ गई है। उधारी चुकता होगी, तो नया खाता खुलेगा।
०- लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक पत्रिका ‘पॉवर गैलेरीÓ के संपादक हैं।
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