क्यों दी गई रमजान में बर्बरता को राहत ?

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०- जयकृष्ण गौड़
जब कश्मीर घाटी की जटिल स्थिति के बारे में चर्चा होती है तो आजादी के बाद के इतिहास का स्मरण करना होगा। पं. जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के कारण कश्मीर हित की बलि चढ़ाकर न केवल इस राज्य को राष्ट्रसंघ के चार्टर में शामिल करवाया बल्कि भारत से अलग स्थिति के लिए अस्थाई धारा 370 को संविधान में शामिल करवा दिया। आतंकवाद अलगाववाद और अब पथराववाद उसी राष्ट्र विरोधी गलती का परिणाम है, जिसे भारत करीब सात दशक से भुगत रहा है। जून 1953 माह की 23 तारीख को शेख अब्दुल्ला की जेल मेें देश की अखंडता के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया। उस समय वे उस जनसंघ के अध्यक्ष थे, जिसकी आयु मात्र दो वर्ष की थी। आजादी के बाद केवल एक विचार प्रभावी था, जिसे सेक्यूलर विचार कहते है। यह विचार नेहरूवादी कांग्रेस का रहा। तिलकजी, सुभाषचंद्र बोस, लाला लाजपत राय और पं. मदन मोहल मालवीय जैसे राष्ट्रवादी नेताओं के बाद पं. नेहरू की कांग्रेस ने राष्ट्रवादी विचारों को तिलांजलि दे दी थीं, भारत की धर्म, संस्कृति और परम्परा में मातृभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा के भाव रहे है, इसी भाव भूमि से उपजे विचार की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में पहचान बनी। ‘वाद’ शब्द लगाये बिना किसी विचार की पूर्ण पहचान नहीं बनती। हालांकि ‘वाद’ का प्रचलन विदेशी विचार धाराओं में रहा है। जनसंघ के वैचारिक आधार में भारत माता के प्रति अटूट श्रद्धा, समर्पण और बलिदान के विचार रहे। डॉ. मुखर्जी के बलिदान के बाद जम्मू कश्मीर में जाने के लिए परमिट प्रणाली समाप्त कर दी गई। इसी तरह निर्वाचन आयोग और नियंत्रक एवं महालेख परीक्षक के प्राधिकार को जम्मू-कश्मीर तक बढ़ा दिया। अन्य प्रतिबंधों को भी हटा दिया गया। राष्ट्रवाद के दबाव के कारण ही ये प्रतिबंध हट सके लेकिन दो विधान ओर अस्थाई धारा 370 की समस्या का समाधान नेहरूवादी नीति के कारण नहीं हो सका। इस सवाल का उत्तर अभी तक नहीं मिल सका है कि राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार केन्द्र और राज्यों में होते हुए भी अखंडता विरोधी धारा 370 का प्रावधान अब भी संविधान में क्यों हैं? इसके साथ ही कश्मीर में हिन्दू पंडितों के साथ हुए पाशविक अत्याचार के बाद इन्हें पलायन करना पड़ा उनको पुन: बनाने की चर्चा होती है, लेकिन उनको सुरक्षा के साथ बसाने की स्थिति अभी तक नहीं बनी? प्राकृतिक आपदा में भी लोग पलायन करते है लेकिन हिन्दू पंडितों के साथ ही कश्मीर घाटी से देशभक्ति का भी पलायन हो गया। मन को यह बात चुभती है कि जब कोई जवान शहीद होता है तो उसके जनाजे में शामिल हुए लोग उसके अमर हो का नारा लगाते है, जबकि भारत के अन्य क्षेत्र में शहीद जवानों के अंतिम संस्कार के समय भारत माता की जय की गूंज सुनाई देती है। जब औरंगजेब खान नामक जवान शहीद हुआ तो उसके जनाजे में शामिल होग उसके अमर होने के नारे लगा रहे थे, लेकिन वहां भारत माता का श्रद्धाभाव और पाकिस्तान के प्रति आक्रोश दिखाई नहीं दिया। यह सवाल भी मन को चुभता है कि वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की आतंकवादियों द्वाार की गई हत्या की चर्चा मीडिया में अधिक हुई, विदेश में भी इस बारे में टिप्पणीयां की गई लेकिन शहीद औरंगजेब खान की हत्या की चर्चा वैसी नहीं हुई, जैसी होनी चाहिए। महत्व का अलग-अलग तराजू होने कई प्रकार के संशय पैदा होते हैं।

सुरक्षा जवान देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा देते है, उनके बलिदान और देशभक्ति के प्रति श्रद्धाभाव और सम्मान होना आवश्यक है। जब हम राजनैतिक परिस्थिति और सरकार की कश्मीर नीतियों की चर्चा करते है तो यह सवाल भी मन को वेदना देता है कि कश्मीर की स्थिति सामान्य बनाने के लिए उसी घिसी पिटी और असफल नीतियों का प्रयोग बार-बार क्यों किया जाता है, जिनको कांग्रेस सरकारों ने अपनाकर कश्मीर को रक्तरंजित कर दिया। प्रकृति ने कश्मीर को स्वर्ग जैसा स्वरूप प्रदान किया, लेकिन राष्ट्रघाती नीतियों के कारण आज कश्मीर घाटी नर्क से बदतर हो गई है। सवाल महत्व का यह नहीं है कि कश्मीर घाटी के कुछ लोग क्या चाहते है, महत्व इस बात का है भारत के सवा सौ करोड़ लोग कश्मीर के बारे में क्या सोचते है। चर्चा में भारत का आम आदमी यही रोष व्यक्त करता है कि पाकिस्तान से निर्यात आतंकवाद को जड़मूल से खत्म क्यों नहीं किया जा सकता। इस आक्रोश का सरकार के पास क्या उत्तर है?

औरंगजेब खान के पिता मोहम्मद लतीफ ने अपने शहीद बेटे की मौत पर आंसू बहाते हुए आक्रोशित शब्दों में कहा कि बेटे के कातिल आतंकवादियों को 72 घंटे के अंदर मौत के घाट नहीं उतारा गया तो खुद ही हथियार उठाकर उनको ढेर कर दूंगा। मोहम्मद लतीफ पूर्व सैनिक है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इतना छोटा और कमजोर है कि वह भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। यही वेदना और आक्रोश पूरे भारत का है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साहसिक निर्णय लेते है, लेकिन जब सर्जिकल स्ट्राइक का निर्णय लिया और भारत के वीर कमांडों ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर आतंकियों के ठिकानों को ध्वस्त कर आतंकियों और पाक सैनिकों की लाशे बिछा दी तो भारत के लोगों को न केवल इस शौर्य के लिए सेना के कमांडो को शाबासी दी वरन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस साहसिक निर्णय से यह जाहिर हो गया कि भारत को ऐसा नेतृत्व मिला है जो देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ को मुंहतोड़ उत्तर देना जानता है।

दुनिया का इतिहास साक्षी है कि जो नेतृत्व साहसी और विजय की इबारत लिखता है, उसके साथ जनता खड़ी हो जाती है, क्रांति के मूूल में भी यही शौर्य गाथा रही है। साहस और पराक्रम ही नेतृत्व को महान बनाता है। पराक्रम की नींव पर ही विकास की इमारत खड़ी हो सकती है। ऐसी नीतियों से मोदी सरकार के सामने भी सवाल खड़े हो रहे है कि हम क्यों यह मानने लगते है कि पाकिस्तान के शब्द कोष में शांति के शब्द भी है। जो देश घृणा, द्वेष और भारत से दुश्मनी के आधार पर बना। जहां के बच्चाों को भारत से दुश्मनी के पाठ पढ़ाया जाता है। जिसका डीएनए भारत विरोधी है, वह केवल शक्ति की भाषा समझता है। रमजान का महीना मुस्लिमों का पवित्र महिना है, भारत सरकार ने रमजान में आतंकवादियों पर आक्रमक कार्यवाही नहीं करने के निर्देश दिये? सवाल यह है कि क्या जिहादी आतंकवाद इस्लाम का एक अंग है। यदि इस्लाम के लिए आतंकवाद है तो फिर रमजान में शाति की पहल के औचित्य पर सवाल नहीं खड़े हो सकते। लेकिन आतंकवाद इस्लाम के लिए खतरा है तो फिर आतंकवाद को रमजान में राहत क्यों दी गई? इस का परिणाम यह हुआ कि ईद के एक दिन पहले ही पत्रकार बुखारी उनके तीन अंग रक्षकों और जवान औरंगजेब खान के खून से कश्मीर की माटी लहुलुहान हो गई। क्रूरता अनुनय, विनय और शांति की भाषा नहीं समझती। तुगलक, नादिर शाह से लेकर औरंगजेब तक के क्रूर शासन से सबक सीखकर अपनी नर्म और लचीली नीति पर विचार और निर्णय लेना होगा। रमजान में जो शांति की पहल की नीति अपनाई गई, उससे शहीद जवानों के ताबूतों के संख्या में वृद्धि हुई है, बर्बरता को राहत देने का अर्थ है बर्बरता को अधिक अवसर देना। आतंकवादियों, पाकिस्तान हुक्मरानों, अलगाववादियों, पत्थरबाजों में कोई फर्क नहीं है, इन सबका मकसद है कश्मीर को भारत से अलग करना। देश के दुश्मनों की तरह ही इनके खिलाफ कार्यवाही में कोई लचीली नीति अपनाई नहीं जा सकती। पाकिस्तान का अस्तित्व ही भारत के लिए खतरा है, इस खतरे से कैसे निपटा जाय या कैसे समाप्त किया जाय, इसी आधार पर कूटनीति और आक्रमक रणनीति अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक सर्जिकल स्ट्राइक इन सवालों का उत्तर नहीं है। ऐसी कई सर्जिकल स्ट्राइक से ही यह बर्बरता ध्वस्त होगी। शांति का गलियारा बर्बरता में नहीं बन सकता।
०लेखक – वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं।
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