कदमताल से परेशान संघ चाहता है पुराना रुतबा … ?

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०- ओमप्रकाश मेहता
देश के सत्तारूढ़ कुनबे में आजकल कुछ भी ठीक-ठाक नहीं चल रहा है, सत्तारूढ़ दल की जहां अपने भविष्य की चिंता में छटपटाहट बढ़ गई है, वहीं उसके अनुषांगिक संगठन भी उजाड़ु पशु की तरह इधर-उधर घूम रहे हैं, जहां तक सत्तारूढ़ दल के पूरे कुनबे पर नियंत्रण रखने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सवाल है, वह भी पिछले चार सालों में मोदी के साथ कदमताल करके परेशान हो गया है और उसकी स्थिति रात भर नृत्य कर सुबह अपने पैरों की दुर्गति देख रोने वाले मोर जैसी हो गई है, पिछले चार साल में संघ की उम्मीदों का पर्वत तो भरभरा कर गिर ही गया, उसकी पुरानी संरक्षक वाली छाप भी छीन ली गई न राममंदिर बन पाया ना धारा-३७० हटी और ना ही निवासित हिन्दुओं को कश्मीर वापसी र्हु और अब संघ को भी सत्ताधारी दल के अनुषांगिक संगठनों की पंक्ति में खड़े रहने को मजबूर होना पड़ रहा है। इसके साथ ही संघ अपने स्वयं द्वारा भाजपा शासित राज्यों में हाल ही करवाए गुप्त सर्वेक्षण के परिणामों से भी परेशान है, इस सर्वेक्षण परिणामों में सभी भाजपा शासित राज्यों में सत्ता विरोधी लहर का जरबदस्त असर बताया जा रहा है। इन सब स्थितियों से परेशान संघ ने अब अपनी कुछ नई रणनीति तैयार की है, जिसे सत्ताधारी दल व उसके सर्वेसर्वा नेताओं से छुपा कर रखा गया है, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संघीय घटनाक्रम इसी रणनीति का एक अंग बताया जा रहा है और संघ ने अपने आपातकालीन पथ प्रदर्शन के रूप में प्रणब दा का चयन कर लिया है, कोई आश्चर्य नहीं होगा कि २०१९ में राजग (एनडीए) को पर्याप्त बहुतमक न होने पर प्रणब दा को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंप दी जाए? साथ ही संघ ने अपने स्तर पर अगले चुनाव की रणनीति भी तैयार की है, जिस पर वह धीरे-धीरे अमल करने की तैयारीी में है। संघ चूंकि एक संरक्षक व वरिष्ठ मार्गदर्शक की भूमिका में है, इसलिए वह एनडीए या भाजपा का परित्याग तो नहीं कर सकता किंतु येन-केन-प्रकारेण भाजपा की मौजूदा चुनावी रणनीति मेंं आमूल-चूल परिवर्तन अवश्य चाहता है और अपनी रणनीति पर पुन: सत्ता प्राप्त कर पुन: संरक्षक की भूमिका में आना चाहता है, फिर इसके लिए चाहे उसे मोदी-शाह का परित्याग ही क्यों न करना पड़े, वह तो प्रणब दा जैसे सुलझे हुए वरिष्ठ व अनुभवी नेताओं की फौज अपने साथ खड़ी करना चाहता है, फिर उनके किसी भी दल में अधिग्रहित क्यों न करना पड़े? भाजपा के वरिष्ठत नेता लाकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा आदि को भी वह राजनीति की मुख्य धारा में लौटाने को उत्सुक है, कुल मिलाकर संघ यह चाहता है कि भाजपा से मौजूदा अधिनायकवाद खत्म हो और भाजपा व अन्य अनुषांगिक संगठन फिर से अपने पुरानी भूमिका में आ जाएं, संघ इसी दिशा में जी-जान से जुट गया है। इस लेखक को मिली खुफिया और विश्वस्त जानकारी के अनुसार संघ ने हाल ही में विस्तृत गुप्त सर्वेक्षण करवाया उसमें करीब इक्कीस मुख्य सवाल थे, जो केन्द्र व राज्य सरकारों की भूमिका, उनके जन कल्याण कार्यक्रमों का असर, केन्द्र के नोटबंदी, जीएसटी व सर्जिकल स्ट्राइक के व्यापक असर तथा भाजपा व अनुषांगिक संगठनों की मौजूदा भूमिका पर आधारित थे। इस सर्वेक्षण में लोगों ने जहां नोटबंदी व जीएसटी को देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया, वहीं सर्जिकल स्ट्राइक की तारीफ के साथ पाकिस्तान को माकूल जवाब नहीं देने की आलोचना भी की, इसी के संदर्भ में कई ने यह सवाल भी उठाया कि हमारे निर्दोष सैनिक व जवान सीमा पर कब तक मरते रहेंगे? इस सर्वेक्षण में मौजूदा जन प्रतिनिधियों को लेकर भी सवाल थे, जिसमें डेढ़ सौ से अधिक भाजपा सांसदों के खिलाफ रिपोर्ट प्राप्त हुई, यही स्थिति भाजपाशासित राज्यों में पार्टी विधायकों की देखी गई। इस तरह कुल मिलाकर संघ देश की मौजूदा सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी व अनुषांगिक संगठनों की भूमिका से बिलकुल भी खुश नहीं है तथा अब उसने न सिर्फ वर्तमान स्थिति को अगले कुछ ही महीनों में बदलने का संकल्प ले लिया है, बल्कि अपनी पुरानी साख फिर से लौटाने का भी स्वयं से वादा कर लिया है, अब संघ के इस फैसले से कौन-कोन प्रभावित होता है? यह तो भविष्य केक गर्भ में है।
०-(नया इंडिया से साभार)
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