प्रदेश की बेहतर सेवा के ढिंढोरे के बाद मप्र १७वें नम्बर पर

0
14

०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल के १४ वर्षों के दौरान और खासकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल के दौरान यूँ तो विकास का खूब ढिंढोरा पीटा गया लेकिन इस ढिंढोरे के बावजूद भी प्रदेश हर मामले में चाहे वह किसान का मामला हो या फिर बचपन से लेकर पचपन तक के सेहत से जुड़े मामले या फिर मुख्यमंत्री की बहुचर्चित बेटी बचाओ का मामला हो, फिर स्कूली शिक्षा या फिर महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार व दुष्कर्म तो वहीं कानून व्यवस्था की स्थिति तो यह है कि शांति का टापू कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में आज जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के माताजी के गले से बदमाश चैन तक खींचकर भाग जाते हैं तो वहीं उनके भाई जो भोपाल नगर निगम परिषद के अध्यक्ष हैं उन पर टीटी नगर थाने के पास ही पार्किंग में अवैध वसूली करने वाले लोगों द्वारा हमला किये जाने की घटना भी घटित हो रही हैं तो वहीं प्रदेश में अपहरण की घटनाओं के मामले में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है लेकिन इसके बावजूद भी मुख्यमंत्री यह ढिंढोरा पीटते नजर आते हैं कि प्रदेश की कानून व्यवस्था बेहतर है उनके इस दावे को लेकर तमाम सवाल खड़े होते हैं, तो वहीं संविधान में प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकारों के तहत नि:शुल्क शिक्षा, नि:शुल्क पानी उपलब्ध कराने का सरकार का दायित्व है लेकिन इन तीनों संविधान में प्रदत्त व्यवस्थाओं की इस प्रदेश में क्या दुर्गति है यह तो जमीनी स्तर पर ही इसका अंदाजा लगाया जा सकता है न तो लोगों को पीने के लिये शुद्ध पानी उपलब्ध हो रहा है और न ही बचपन से लेकर पचपन तक प्रदेश के नागरिकों को सरकार के बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के ढिंढोरे के बावजूद भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति यह है कि सरकार अब प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को निजी संस्थाओं को सौंपने की तैयारी में लगी हुई है और इसकी पहल ठेठ आदिवासी जिला झाबुआ से प्रारम्भ हो गई है, वैसे सरकार ने २८ जिलों की स्वास्थ्य सेवायें निजी स्वयंसेवी संस्था के हाथों सौंपने की योजना बनाई है लेकिन इसके बावजूद भी सरकार बेहतर स्वास्थ्य का ढिंढोरा पीटने में लगी हुई है। इसके बावजूद भी राज्य के अधिकांश जिलों में पचपन की तो बात छोडि़ए राज्य में बड़ रहे प्रदूषण की चपेट में आकर विंध्य क्षेत्र के सतना, सीधी, शहडोल, सिंगरौली के जिलों में पैदा होने वाले बच्चे तमाम तरह की बीमारियां अपने साथ लेकर मध्यप्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के स्वर्णिम मध्यप्रदेश की धरती पर जन्म ले रहे हैं तो वहीं झाबुआ, अलीराजपुर और धार सहित जहां-जहां सीमेंट फैक्ट्रियों का जाल सरकार द्वारा बिछाया गया उन सभी सीमेंट फैक्ट्रियों के आसपास के रहवासी तमाम बीमारियों की चपेट में हैं और उनका बेहतर इलाज कराने की सरकार के पास कोई व्यवस्था नहीं है इसका अंदाजा मुख्यमंत्री स्वैच्छानुदान कोष से लेकर राज्य के मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के द्वारा दिये जाने वाले अनुदानों की यदि सूची सार्वजनिक की जाए तो इनमें ज्यादातर अनुदान राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं के चलते लोगों का बेहतर इलाज किये जाने को लेकर राज्य के बाहर के अस्पतालों में इलाज कराने के लिये प्रदान किये गये तो वहीं करोड़ों रुपये प्रतिवर्ष सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में अव्यवस्थाओं के चलते निजी नर्सिंग होमों और चिकित्सालयों को करोड़ों रुपये सरकार द्वारा लोगों के इलाज के लिये प्रतिवर्ष प्रदान किये जाते हैं। इस सबके चलते अन्य योजनाओं में लगभग यही स्थिति है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चहेती नौकरशाही के चलते हर योजना में फर्जी आंकड़ों की रंगोली सजाकर उनकी सफलता के दावे सरकारी विज्ञापनों के माध्यम का ढिंढोरा पीटकर लोगों को भ्रमित करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति क्या है इसका खुलासा राज्यों में स्वास्थ्य का हाल बताने वाली नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स (स्वास्थ्य सूचकांक) में केरल देश में सर्वश्रेष्ठ जबकि मप्र १७वें स्थान पर है। उत्तर प्रदेश सबसे फिसड्डी राज्य है। स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत बयां करने वाले इस सूचकांक पर मप्र का प्रदर्शन पड़ोसी छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र से भी बदतर है। तेजी से प्रदर्शन सुधारने के मामले में झारखण्ड सबसे आगे है। इस इंडेक्टस की अहमियत इसलिए है क्योंकि केन्द्र इसी आधार पर विशेष अनुदान देगा। नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत ने ‘हेल्दी स्टेट्स, प्रोग्रेसिव इंडियाÓ शीर्षक से रिपोर्ट जारी की जिसमें स्वास्थ्य सूचकांक रप राज्यों की रैकिंग दी गई है। नीति आयोग में सलाहकार व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आलोक कुमार के नेतृत्व में आयोग के अधिकारियों के दल ने विश्व बैंक, केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय, राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों तथा विशेषज्ञों की मदद से इस इंडेक्स को तैयार किया है। शिश्ुा मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर जैसे स्वास्थ्य संकेतकों के वर्ष २०१५-१६ के आंकड़ों के आधार पर बनाई गई इस इंडेक्स पर २१ बड़े राज्यों, आठ छोटे राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों की तीन अलग-अलग श्रेणियों में रैकिंग की गई है। अंक सुधरे, रैकिंग वही वर्ष २०१४-१५ में मध्यप्रदेश ३८.९९ अंकों के साथ १७वें स्थानपर था। वर्ष २०१५-१६ में भी ४०.०९ अंकों के साथ १७वें स्थान पर रहा प्रदेश। हालांकि १.१० अंक के साथ सुधार के मामले में प्रदेश का स्थान नौंवा है। शिशु मृत्युदर के मामले में प्रदेश अंकित स्थान पर काबिज ओडिशा से एक पायदान ऊपर है। वर्ष २०१४-१४५ में शिशु मृत्यु दर ३५ (प्रति एक हजार जन्मे नवजात) थी, जो २०१५-१६ में घटकर ३४ रह गई। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर के मामले में मप्र देश में सबसे ऊपर प्रति हजार बच्चों में ६२ की होती है मौत। उत्तरप्रदेश सबसे फिसड्डी ८० अंकों के स्कोर के साथ बड़े राज्यों में केरल का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ है जबकि ३३.६९ अंकों के साथ उप्र सबसे फिसड्डी है। उप्र का स्कोर सभी राज्यों में न्यूनतम है। पर संतोष की बात यह है कि २०१४-१५ में इस इंडेक्स पर उप्र का स्कोर २८.१४ था जो २०१५-१६ में ५.५५ अंक सवुधरकर ३३.६९ हो गया है। अब सरकारी अस्पतालों की रैकिंग नीति आयोग के सीर्ईओ अमिताभ कांत ने कहा कि इस साल जून तक आयोग देश के ७३० सरकारी अस्पतालों की रैकिंग भी जारी करेगा ताकि ताकि अच्छा और खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों का नाम सार्वजनिक किया जा सके। इस रैकिंग पर प्रदश्रन के आधार पर ही राज्यों को एक निश्चित अनुदान प्रदान किया जाएगा।

०००००००००००

LEAVE A REPLY