क्या अब ! केन्द्र द्वारा दबाए पैसों की मांग के लिए मुख्यमंत्री देंगे धरना ?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान कभी भी ऐसी स्थिति नहीं बनी कि केन्द्र सरकार ने मध्यप्रदेश के हिस्से के पैसे रोके हों लेकिन फिर भी राजनैतिक चालबाजी और यूपीए सरकार की छवि खराब करने के उद्देश्य से प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान कई बार कभी कोयले की समस्या को लेकर कोयला यात्रा तो कभी, किसानों की समस्याओं को लेकर कर्जदार प्रदेश की जनता के करोड़ों रुपये अपनी राजनीति पर खर्च करके धरना-प्रदर्शन की नौटंकी करते रहे लेकिन हकीकत यह है कि यदि यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान दिये गये मध्यप्रदेश को दी गई राशि का सरकार खुलासा करे तो यह बात जनता के सामने आ जाएगी कि हकीकत क्या है, तो वहीं दूसरी ओर भाजपा के नेताओं जिनमें लालकृष्ण आडवाणी सहित वह पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी शामिल हैं जो आज नरेन्द्र मोदी के सदस्य हैं इन सभी ने मिलकर जो २०१४ के लोकसभा चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री के पद के उम्मीदवार को लेकर मोदी के स्थान पर शिवराज को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की लालसा जगाई थी उनकी इस उच्च पद पाने की लालसा के चलते आज प्रदेश के साथ मोदी सरकार द्वारा भेदभाव तो किया ही जा रहा है तो वहीं प्रदेश सरकार को मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार से मिलने वाले करोड़ों रुपये की राशि मध्यप्रदेश को दिये जाने के मामले में हीला हवाली की जा रही है, अब प्रदेश के नागरिकों में इस सवाल को लेकर चर्चा का दौर जारी है कि क्या यूपीए सरकार के समय जब मध्यप्रदेश के विकास के लिये पर्याप्त राशि मिल रही थी लेकिन फिर भी राजनीति के चलते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आयेदिन यूपीए सरकार के द्वारा प्रदेश के साथ भेदभाव करने के आरोप तो लगाया करते थे तो ऐसे भी कई अवसर आये जब यूपीए सरकार को बदनाम करने के लिये मुख्यमंत्री ने धरने की नौटंकी पर करोड़ों रुपये खर्च किये तो वहीं लोकसभा चुनाव के समय इस प्रदेश की जनता को यह झांसा भी दिया कि जब मध्यप्रदेश और केन्द्र में एक ही पार्टी की सरकार बन जाएगी तो विकास की गति इस प्रदेश की बढ़ जाएगी लेकिन उनके उच्च पद पाने की लालसा के चलते मोदी शासित केन्द्र सरकार द्वारा मध्यप्रदेश को मिलने वाले हजारों करोड़ की राशि दिये जाने के साथ भेदभाव किया जा रहा है जिससे प्रदेश की विकास योजनायें तो ठप पड़ी हुई हैं तो वहीं राज्य की यह स्थिति है कि उसे अपने जरूरी काम निपटाने के लिये आयेदिन बाजार से कर्ज उठाना पड़ता है जिसके चलते राज्य डेढ़ लाख करोड़ से भी ज्यादा के कर्ज से जूझ रहा है। लेकिन केन्द्र की मोदी के नेतृत्व वाली सरकार है जो प्रदेश की मिलने वाली राशि को दबाए बैठी है, इस तरह की केन्द्र की सरकार की नीतियों को लेकर अब यह सवाल उठा रहा है कि आखिर शिवराज सिंह चौहान के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने का खामियाजा इस प्रदेश को कब तक भुगतना पड़ेगा। मप्र सरकार का खजाना खाली है। प्रदेश गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है, ऐसे में केंद्र ने राज्य सरकार के लगभग १३ हजार करोड़ रुपए रोक रखे हैं। खास बात यह है कि केंद्र में दूसरे दल की सरकार होती तो मुख्यमंत्री धरना-प्रदर्शन कर अपना हिस्सा मांग लेते, लेकिन अपनी ही पार्टी की सरकार है तो चाह कर भी सीएम अपना हिस्सा मांगने दबाव नहीं बना पा रहे हैं। रोचक बात यह भी है कि आर्थिक संकट से निबटने मुख्यमंत्री ने प्रदेश के कमाऊ विभागों को १५०० करोड़ की अतिरिक्त वसूली का लक्ष्य थमा दिया है, जिससे अफसरों की हालत खराब है। देश में एक जुलाई से जीएसटी लागू होने के बाद एक कर प्रणाली लागू की गई है। पहले राज्यों को केंद्रीय करों के रूप में ३३ प्रतिशत हिस्सा मिलता था, लेकिन इस साल से इसे बढ़कार ४३ कर दिया गया है। साथ ही जीएसटी लागू होने से मप्र सरकार को उम्मीद थी कि केंद्रीय करों में उसे ५१ हजार १०६ करोड़ की राशि मिलेगी, लेकिन २४ जनवरी तक की स्थिति में केन्द्र से करों के रूप में ४३ हजार ५१९ करोड़ रुपए ही मिल सके हैं, साथ ही सहायक अनुदान के रूप में मिलने वाले २६ हजार ३४ करोड़ में से २० हजार ६८४ करोड़ की राशि मिल सकी। यानी केन्द्र ने अभी भी मप्र की १२ हजार ९३७ करोड़ की राशि जारी नहीं की, जिसके चलते केंद्रीय योजनाओं के काम जहां प्रभावित हो रहे हैं। वहीं मप्र सरकार की महत्वपूण्र योजनाएं भी प्रभावित हो रहे रही हैं। बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कहा था कि मप्र को स्वयं के करों से सरकार को ५० हजार २९५ करोड़ की राशि मिलेगी। इसके लिए जीएसटी, सीएसटी, आबकारी, माइनिंग, रजिस्ट्री एवं स्टाम्प, पेट्रोल-डीजल पर वैट, प्रवेश शुल्क, परिवहन तथा भूमि डायवर्सन और लीज पर भूमि आवंटित करने सहित बांस, लघु वनोपज करने सहित बांस, लघु वनोपज तथा काष्ठागार, बिजली आदि से जो पैसा मिलना चाहिए था, वो नहीं मिल पा रहा है। इसमें अभी भी १५ हजार करोड़ की कमी देखने को मिली है। केंद्र से सहायक अनुदान के रूप में मिलने थे २६ हजार ३४ करोड़, मिला २० हजार ६८४ करोड़, कम मिले पांच हजार ३५० करोड़, केंद्रीय करों में हिस्सा मिलना था ५१ हजार १०६ करोड़, मिला ४३ हजार ५१९ करोड़, कम मिले सात हजार ५८७ करोड़, कहां कितना बढ़ाया टारगेट परिवहन पूर्व में तय २५५० करोड़, बढ़ाकर किया ४८०० करोड़, रजिस्ट्री एवं स्टाम्प पूर्व में तय ४३०० करोड़, बढ़ाकर किया ४८०० करोड़, आबकारी पूर्व में में तय ७५०० करोड़, बढ़ाकर किया ८००० करोड़, माइनिंग पूर्व में तय ३४०० करोड़ गिरावट १४ प्रतिशत, ३५०० करोड़, फारेस्ट पूर्व में तय ११८० करोड़, आय हुई ७३५ करोड़, बढ़ाकर १४०० करोड़, पेट्रोल-डीजल पूर्व में तय दस हजार करोड़, आय हुई सात हजार करोड़, सेस से ३०० करोड़, बढ़ाकर किया एक हजार करोड़ था। इतने हजार करोड़ बकाया होने के बावजूद भी केन्द्र की मोदी सरकार मध्यप्रदेश सरकार को मिलने वाली राशि उपलब्ध नहीं करा रही है ऐसे में सवाल उठता है कि जिस यूपीए सरकार को बदनाम करने की राजनीति करने वाले भारतीय जनता के प्रदेश सरकार के मुखिया यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान किये जाने वाली रैलियों की धरने की राजनीति करेंगे या मोदी की नाराजगी के आगे चुप्पी साधे रहेंगे और प्रदेश की योजनाओं के लिये कर्ज दर कर्ज लेकर इस प्रदेश को डेढ़ लाख करोड़ से भी ज्यादा कर्जदार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाते रहेंगे।

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