कलि कथा वाया चाय-पास

0
58

०-रविश कुमार
चाय की दुकान में आक्सीजन सिलेंडर जैसा पात्र देख मेरी नजर ठहर गई। दुकानदार राजेश शुक्ला ने बताया कि ये अंग्रेजों का सिस्टम है। वो चले गए लेकिन चाय पीने का ये स्टाइल भारत में रह गया। अंग्रेज दूध वाली चाय नहीं पीते थे। लीकर (सिर्फ पत्ती वाली चाय) ही पीते थे। सिलेंडर में खौलता पानी है। ”नीचे लगे नलके से जब पानी निकलता है तो हम पत्ती वाली ग्लास नीचे रख देते हैं। ग्लास के भीतर छन्नी लगी हुई है जिस पर पत्ती रखी होती है गरम पानी का रंग बदल जाता है।

”लेकिन इंडियन लोग को लीकर उतना पसंद नहीं है। तीन-तीन पीढिय़ों से चाय बेचने की ठसक ने राजेश शुक्ला को चाय का समाजशास्त्री बना दिया है। सौ साल से ज्यादा समय हो गया है। शुक्ला कहते हैं कि मुझे लीकर चाय बनाने की ही आदत है। अब के टेस्ट के अनुसार में पहले लीकर ही बनाता हूँ बाद में उसमें दूध और चीनी मिला दिया जाता है फिर थोड़ी देर के लिए उबाल देते हैं। शुक्ला की दुकान पर बहुत भीड़ होती है। अच्छी बात यह है कि वे मिट्टी के कप (चुक्कड़) का इस्तेमाल करते हैं। बंगाल में चाय का स्तर देश के किसी भी हिस्से से बेहतर है। यहां दिल्ली या बाकी हिस्से की तरह चूल्हे पर पानी, दूध और पत्ती को साथ-साथ घंटों नहीं खौलाया जाता है। दिल्ली के लोगों ने तेज और कड़क चाय के नाम पर चाय पीने की आदत बिगाड़ ली है। वैसे खौला-खौला कर बनाई गई चाय के मामले में भी बंगाल दिल्ली को टक्कर दे सकता है। शायद कोलकाता में औपनिवेशिक छाप गहरी रही होगी तभी यहां रिक्शावाला से लेकर मछली बेचने वाला लीकर चाय पीता हुआ नजर आता है। नींबू चाय भी खूब पीते हैं। जबकि उत्तर भारत के लोग लीर चाय को आफिसर या कलस्टर चाय समझते हैं। दिल्ली की तुलना में कोलकाता में खुली चाय की दुकानें भी बहुत हैं। इन दिनों दिल्ली का अपर-मिडिल क्लास टशन से ग्रीन टी पी रहा है कोलकाता का लोअर-क्लास कब से ऐसी चाय पी रहा है। एक ओर अंतर है। बंगाल की चाय दुकानों में चाय बनाने की विधि में खूब विविधता दिखेगी। कारीगरों और कलाकारी दोनों ही मामलों में। दिल्ली की सड़कों पर कहीं चले जाइये एक ही तरीके सेचाय बनते दिखेगी। विजयगढ़ इलाके की चाय की यह दुकान मुझे काफी पसंद है। मग के नीचे छन्नी लगी है। उसके ऊपर लीफ रखी होती है। दुकानदार खोलते पानी को इस मग के पास कराता है। गरम पानी के संपर्क में आकर पत्ती अपनारंग और स्वाद छोड़ती है। इसे दूसरी केतली में जमा कर लिया जाता है। पहले से ग्लास में गरम दूध रखा होता है। जिसमें पत्ती वाले पानी कोडाल दिया जाता है। चाय तैयार। दूध चाय का स्वाद भी लीकर जैसा लगता है। बिना दूध वाली लीकर चाय की विधि भी आसान है। पहले दुकानदार ने मग वाली छन्नी पर रखी पत्तियों के ऊपर से खौलते पानी को पास कराया। मग के नीचे एक बड़ा मग रखा होता है जिसमें इस पानी को रोक लिया जाता है। अब यहएक तरीके सो सोल्यशुन बन जाता है जिसमें तीन-तीन चम्मच केक हिसाब से ग्लास में डाल दिया जाता है। इसमें अलग से खौलते पानी को डाला जाता है। चीनी अलग अलग हिसाब से मिला दी जाती है। बड़ा बाजार में चायबनाने की इस टेक्नालाजी को देखिये। इसने तो खौलने के मामले में दिल्ली को भी पीछे छोड़ दिया है। बकायदा चूल्हे के नीचे एक बंदा बिठाया गया है जो लगातार इस देसी मशीन से हवा पैदा कर रहा है। मशीन की टोंटी सेनिकलने वाली हवा चूल्हे की आंच को तेज रखती है और ऊपर चाय इस कदर खदकती रहती है कि बेचारी पत्तियां जलकर खाक हो जाती होंगी। स्वाद का तो पता ही नहीं चलता होगा। लेकिन इस स्वाद के रसिया भी काफी हैं। चाय का बर्तन काफी बड़ा है। यहां से छोटी छोटी केतलियों में भरकर दुकानदार का आदमी बड़ा बाजार की तंग गलियों में ले जाता है। एक तरह से यह चाय बनाने को औद्योगिक तरीका है। बनाने और वितरण के काम में लगे हैं। चाय भारत का ‘राष्ट्रीय रास्ता पेय (नेशनल स्ट्रीट ड्रिंक) है। किसी नुक्कड़ पर चाय की दुकान न मिले तो लगता है कि यहाँ आबादी ही नहीं है। और हाँ दाम के मामले में कोलकाता काफी सस्ता है। चार से पाँच रुपये में दूध चाय मिल जाती है। तीन रुपये में लीकर चाय। दिल्ली में आपको दूध चाय के आठ से दस रुपये देने पड़ते हैं।
०-लेखक एनडीटीवी के वरिष्ठ संवादादता हैं।
००००००००००००००००००००००००००००००००

LEAVE A REPLY