चुनाव आयोग में ‘ज्योति से कितनी बेहतर होगी ‘रावत की ज्वाला

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०- अरुण पटेल

मध्यप्रदेश कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे ओम प्रकाश रावत ने भारत के निर्वाचन आयोग के मुखिया के तौर पर कमान संभाल ली है। उन्हें यह महत्वपूर्ण दायित्व मुख्य चुनाव आयुक्त ए.के. ज्योति के सेवानिवृत्त होने के बाद मिला है। पिछले कुछ समय से चुनाव आयोग को लेकर विश्वसनीयता और साख का जो संकट पैदा हो रहा था वह हाल ही में कुछ ज्यादा घनीभूत हुआ है। चुनाव आयोग की साख और विश्वसनीयता फिर से न केवल स्थापित करना बल्कि उसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाना भी रावत के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। बड़ी चुनौती इसलिए होगी क्योंकि उन्हें यह सब करने के लिए एक साल से भी कम वक्त मिलेगा। रावत के अंदर ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और परिणामोन्मुखी होने की प्रखर अग्नि हमेशा प्रज्वलित रही है इसलिए देखने की बात यही होगी कि चुनाव आयोग में ज्योति से कितनी बेहतर रावत की ज्वाला रहती है, जिसके आलोक से फिर से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रकाशवान होगी। रावत से लोगों को उनके पुराने ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए अधिक उम्मीद इसलिए है क्योंकि वे न तो कभी किसी दबाव के आगे झुके हैं और न ही उन्होंने अपने उज्ज्वल भविष्य की अभिलाषा में कभी किसी राजनेता या अपने कैडर के वरिष्ठजनों से कोई समझौता किया है।

चुनाव आयोग की साख और विश्वसनीयता तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने इस कदर बनाई थी कि न केवल निष्पक्षता और पारदर्शिता बढ़ी थी बल्कि लोगों को भी यह अहसास होता था कि चुनाव आयोग वास्तव में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव करा रहा है। वैसे तो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर थोड़े-बहुत सवालिया निशान हमेशा लगते रहे लेकिन पिछले डेढ़-दो दशक से कुछ ज्यादा ही सवाल उठने लगे हैं। चुनाव आयोग के निर्णयों को लेकर जितने सवाल ए.के. ज्योति के कार्यकाल में उठे उतने सवाल इससे पहले शायद ही कभी उठे हों। अब तो कुछ राजनीतिक दलों ने यहां तक आरोप लगाये हैं कि ज्योति के कुछ फैसले प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुसार हुए हैं। खासकर हिमाचल और गुजरात के चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा और चुनाव के दौरान कुछ निर्णयों को लेकर संदेह घनीभूत हुआ और चुनाव आयोग पर आरोपों की बौछार हुयी। चुनाव आयोग को कोई भी निर्णय करते समय केवल स्वयं संतुष्ट हो जाना पर्याप्त नहीं होता और न केवल इतना काफी होता है कि वह यह मान ले कि उसने जो निर्णय किया है वह पूरी तरह न्यायोचित है। न्याय होने से अधिक न्याय होता हुआ दिखने का अहसास हो यह ज्यादा जरूरी है। एक तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर जो आरोप और लोगों के मन में संदेह है उसे दूर करना और उसके प्रति विश्वास कैसे पैदा हो, ऐसा माहौल बनाना चुनाव आयोग की पहली प्राथमिकता होना चाहिए। चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष एवं दबावरहित काम कर रहा है ऐसा विश्वास लोगों के मन में पैदा करना रावत की प्राथमिकता होना चाहिए।

रावत से कुछ अधिक अपेक्षाएं इसलिए हैं क्योंकि उनके पिछले ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वे नियम, कानून-कायदों से काम करने वाले ऐसे प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं जिन पर कभी भी राजनीतिक दबाव काम नहीं कर पाया और ईमानदारी इस कदर है कि उसके लिए वे जान को जोखिम में डालने से भी नहीं हिचकिचाते हैं। जो काम नियम, कानून, प्रक्रियाओं के अंतर्गत आता है उसे करने में उन्हें कभी कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन यदि नियमों के खिलाफ कोई काम है तो फिर वह काम उनसे राजनीतिक दबाव या लोभ-लालच देकर नहीं कराया जा सकता। 1977 बैच के आईएएस अधिकारी रावत 2013 में सेवानिवृत्त हुए और वे मूलत: उत्तरप्रदेश के निवासी हैं, लेकिन मध्यप्रदेश कैडर के होने के कारण उन्हें कई महत्वपूर्ण पदों पर काम करने का राज्य में मौका मिला। उन्होंने कांग्रेस के मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह, मोतीलाल वोरा और दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में काम किया तो वहीं भाजपा के मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा, उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में भी महत्वपूर्ण दायित्वों को निभाया। बाबूलाल गौर जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने अपने प्रमुख सचिव के रूप में रावत को चुना। यदि गौर पर बतौर मुख्यमंत्री कोई घपले-घोटाले का आरोप नहीं लगा तथा प्रशासनिक स्तर पर लिए गये निर्णयों को लेकर सवालिया निशान नहीं लग पाये तो इसमें एक बड़ा कारण रावत का उनका प्रमुख सचिव होना भी था। रावत के कारण ही गौर सरकार कभी विवादों में नहीं फंसी और गौर भी सभी महत्वपूर्ण फैसले करने से पूर्व रावत से विचार-विमर्श अवश्य करते थे। कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों में काम करने के बाद भी रावत उन गिने-चुने कुछ अधिकारियों में से रहे हैं जिन पर कभी किसी दल विशेष का समर्थक होने का न तो ठप्पा लगा और न ही दल विशेष का कोई रंग चढ़ा।

आबकारी विभाग एक कमाऊ विभाग माना जाता है जहां लक्ष्मी की खनक साफ-साफ सुनी जा सकती है। जब अधिकारियों में आबकारी आयुक्त बनने की होड़ लगी रहती है, ऐसे में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती ने रावत को जब आबकारी आयुक्त पदस्थ कर दिया तो यह समय उनके लिए कुछ अधिक ही असुविधाजनक रहा। यह पद कमाई का माना जाता है लेकिन रावत इस पद को स्वीकार नहीं करना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने लिखित में भी आग्रह किया था। लेकिन जब आदेश निरस्त नहीं हुआ तब उन्हें मजबूरीवश इस पद को स्वीकार करना पड़ा। इस पद पर रहते हुए उन्होंने शराब दुकानों की नीलामी लाटरी के जरिए करने की नीति को लागू किया जिसके कारण राज्य की आबकारी से होने वाली आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। रावत के लिए रक्षा मंत्रालय में हुई पदस्थापना काफी चुनौतियों से भरी रही। रक्षा मंत्रालय में वे मई 1993 से जून 1998 तक पहले संचालक और फिर बाद में ज्वाइंट सेक्रेटरी रहे। हथियारों की खरीदी का संवेदनशील काम वे देखते थे। चूंकि भय या लालच देकर उनसे कोई काम नहीं कराया जा सकता था इसलिए हथियारों के सौदागरों ने उन्हें रास्ते से हटाने की कोशिश की। इस दौरान दो अप्रिय घटनाएं घटित हुईं। एक घटना में उनकी कार को कुचलने की कोशिश की गई तो दूसरी घटना में दिल्ली के लोधी रोड पर घूमते वक्त एक पेड़ गिर जाने की हुई। रावत और उनकी पत्नी मंजू रावत को गंभीर चोटें भी आई थीं तथा एम्स में उनका इलाज भी चला। मामले की जांच के बाद जो तथ्य उजागर हुए उससे यह बात सामने आई कि रक्षा सौदों की एक फाइल पर निगेटिव नोटिंग के चलते प्रभावित कंपनी ने रावत को रास्ते से हटाने की कोशिश की थी। कार एक्सीडेंट के बाद जब तक रावत रक्षा मंत्रालय में रहे उन्होंने कभी भी सरकारी गाड़ी का उपयोग नहीं किया। हमले की आशंका चूंकि हमेशा ही बनी रहती थी इसलिए वे उस दौरान ज्यादातर दिल्ली में सिर्फ डीटीसी की बस में ही सफर करते थे।

रावत को जिस श्रेणी की जब पात्रता रही उससे अधिक की सुविधाओं का उपयोग उन्होंने कभी नहीं किया और जहां तक संभव हुआ ज्यादा सुख-सुविधाओं के उपयोग से किनारा ही करते रहे। दिग्विजय सिंह की सरकार में उन्हें ग्रामीण विकास विभाग का सचिव नियुक्त किया गया। उस समय इस विभाग के राज्यमंत्री जो कि छत्तीसगढ़ मूल के थे, उन्होंने रावत को अपने बंगले पर बुलाकर सीधे-सीधे कहा कि मैं आईएएस अफसरों से भी पैसा लेता हूं तथा डांटता-फटकारता भी हूं। इस पर रावत ने दो-टूक शब्दों में कह दिया था कि पैसे की उम्मीद मुझसे न रखें। मौजूदा दौर में जबकि लगभग हर संवैधानिक संस्था की साख पर किसी न किसी रूप में सवालिया निशान लग रहे हैं और पिछले कुछ माहों से चुनाव आयोग भी इससे मुक्त नहीं रहा है। ऐसे में रावत की नियुक्ति से यह आशा बलवती हुई है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और निष्पक्षता बहाल हो सकती है क्योंकि वे उन अधिकारियों में हैं जिन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद किसी पद की अपेक्षा से किसी भी राजनेता के चक्कर नहीं लगाये।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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