बकवास और बोगस मुद्दा है लाभ का पद

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०-रविश कुमार
हर सरकार तय करती है कि लाभ का पद क्या होगा, इसके लिए वह कानून बनाकर पास करती है। इस तरह बहुत से पद जो भी लाभ से ज्यादा प्रभावशाली हैं, वे लाभ के पद से बाहर हैं। लाभ के पद की कल्पना इसलिए की गई थी कि सत्ता पक्ष या विपक्ष के विधायक सरकार से स्वतंत्र रहें। क्या वााकई होते हैं? बात इतनी थी कि मंत्रियों के अलावा विधायक कार्यपालिका का काम न करें, सदन के लिए उपलब्ध रहें और जनता की आवाज उठाएं। आप अगर पता करेंगे कि किस राज्य की विधानसभाएं १०० दिन की भी बैठक करती हैं तो शर्म आने लगेगी। सदन चलते नहीं और लाभ के पद के नाम पर आदर्श विधायक की कल्पना करने की मूर्खता भारतीय मीडिया में ही चल सकता है। जब ऐसा है तो फिर व्हिप क्यों है, क्यों व्हिप जारी कर विधायकों को सरकार के हिसाब से वोट करने के लिए कहा जाता है। व्हिप तो खुद से लाभ का पद है। किसी सरकार में दम है क्या कि व्हिप हटा दे। व्हिप का पालन न करने पर सदस्यता चली जाती है। बकायदा सदन में चीफ व्हिप होता है ताकि वह विधायकों या सांसदों को सरकार के हिसाब से वोट के लिए हांक सके। अगर इतनी सी बात समझ आती है तो फिर आप देख सकेंगे कि चुनाव आयोग या कोई भी दिल्ली पर फालतू में चुनाव थोप रहा है जिसके लिए लाखों या करोड़ों फूंके जाएंगे। मीडिया ने इनसब बातों को नहीं बताया, लगे भाई लोग सर्वे कर रिजल्ट ही बताने कि चुनाव होगा तो क्या होगा। संविधान में लाभ कापद परिभाषित नहीं है। इसकी कल्पना ही नहीं है। इसका मतलब है जो पद लाभ के पद के दायरे में रखे गए हैं वे वाकई लाभ के पद नहीं हैं क्योंकि लाभ के पद तो कानून बनाकर सूची से निकाल दिया जाता है। लोकतंत्र में टाइम बर्बाद करने का गेम समझे आप? अदालती आदेश भी लाभ के पद को लेकर एक जैसे नहीं हैं। उनमें निरंतरता नहीं है। बहुत से राज्यों में हुआ है कि लाभ का पद दिया गया है। कोर्ट नेउनकी नियुक्ति को अवैध ठहराया है, उसके बाद राज्य ने कानून बना करउसे लाभ का पद से बाहर कर दिया है और अदालत ने भी माना है। फिर दिल्ली में क्यों नहीं माना जा रहा है? कई राज्यों में रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट यानी बैक डेट से पदों को लाभ के पद को सूची से बाहर किया गया। संविधान में प्रावधान है कि सिर्फ क्रिमिनल कानून को छोड़ कर बाकी मामलों में बैक डेट से छूट देने के कानून बनाए जा सकते हैं। फोटो क्लियर हुआ? कांता कथुरिया राजस्थान के कांग्रेस विधायक थे। लाभ के पद पर नियुक्ति हुई। हाईकोर्अ ने अवैध ठहरा दिया। राज्य सरकार कानून ले आई, उस पद को लाभ के पद से बाहर कर दिया। तब तक सुप्रीम कोर्ट में अपील हो गई, सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार भी कर लिया। विधायक की सदस्यता नहीं गई। ऐसे अनेक केस हैं, २००६ में शीला दीक्षित ने १९ विधायकों को संसदीय सचिव बनाया। लाभ के पद का मामला आयाव तो कानून बनाकर १४ पदों को लाभ के पद की सूची से बाहर कर दिया। केजरीवाल ने भी यही किया। शीला के विधेयक को राष्ट्रपति को मंजूरी मिल गई, केजरीवाल के विधेयक को मंजूरी नहीं दी गई। मार्च २००५ में दिल्ली में २१ विधायक संसदीय सचिव नियुक्त किए जाते हैं। जून २०१५ में छत्तीसगढ़ में भी ११ विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया जाता है। इनकी भी नियुक्ति हाईकोर्ट से अवैध ठहराई जा चुकी है, जैसे दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के विधायकों की नियुक्ति को अवैध ठहरा दिया। छत्तीसगढ़ के विधायकों के मामले में कोई फैसला क्यों नहीं, क्यों चर्चा क्यों नहीं। जबकि दोनों मामले एक ही समय के हैं। आपने कोई बहस देखी? कभी देखेंगे भी नहीं क्योंकि चुनाव आयोग भी अब मोहल्ले की राजनीति में इस्तेमाल होने लगा है। सदस्यों को अपना लाभ चाहिए, इसलिए वे आयोग के बहाने लाभ के पद की पालिटिक्स हो रही है। मई २०१५ में रमन सिंह सरकार ने ११ विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया। इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस में एक अगस्त २०१७ को खबर छपी है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सभी संसदीय सचिवों की नियुक्ति रद्द कर दी है क्योंकि इनकी नियुक्ति राज्यपाल के दस्तखत से नहीं हुई है। दिल्ली में भी यही कहा गया था। हरियाणा में भी लाभ के पद का मामला आया। खट्टर सरकार में ही। पांच विधायक पचास हजार वेतन और लाख रुपये से अधिक भत्ता लेते रहे। पंजाब हरियाणा कोर्ट ने इनकी नियुक्ति अवैध ठहरा दी। पर इनकी सदस्यता तो नहीं गई। राजस्थान में भी दस विधायकों के संसदीय सचिव बनाए जाने का मामला चल ही रहा है। पिछले साल १७ नवम्बर को हाईकोर्ट ने वहां के मुख्य सचिव को नोटिस भेजा है। इन्हें तो राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है। मध्यप्रदेश में भी लाभ का पद का मामला चल रहा है। यहां तो ११८ विधायकों पर लाभ का पद लेने का आरोप है। २० विधायकों के लिए इतनी जल्दी और ११८ विधायकों के बारे में कोई फैसला नहीं? ११८ विधायकों के बारे में खबर पिछले साल २७ जून २०१७ के टेलीग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी थी कि नौ मंत्री आफिस ऑफ प्रोफिट के दायरे में आते हैं। २०१६ में अरुणाचल प्रदेश में जोड़तोड़ से भाजपा की सरकार बनती है। सितम्बर २०१६ में मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू २६ विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर देते हैं।उसके बाद अगले साल मई २०१७ में पाँच और विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर देते हैं। अरुणायल प्रदेश में ३१ संसदीय सचिव हैं। वह भी तो छोटा राज्य है। वहांभी तो कोटा होगा कि कितने मंत्री होंगे। फिर ३१ विधायकों को संसदीय सचिव क्यों बनाया गया? क्या लाभ का पद नहीं है? क्या किसी टीवी चैनल ने बताया आपको? क्या ३१ संसदीय सचिव होने चाहिए? क्या २१ संसदीय सचिव होने चाहिए? जो भी जवाब होगा, उसका पैमाना तो एक ही होगा या अलग अलग होगा। अरविंद केजरीवाल की आलोचना हो ही रही है कि २१ विधायकों को संसदीय सचिव क्यों बनाया? मुझे भी लगता है कि उन्हें नहीं बनाना चाहिए था। पर क्या कोई अपराध हुआ है, नैतिक या आदर्श या संवैधानिक पैमाने से? केजरीवाल अगर आदर्श की राजनीति कर रहे हैं, इसलिए उन्हें २१ विधायकों को संसदीय सचिव नहीं बनाना चाहिए था तो फिर बाकी मुख्यमंत्री आदर्श की राजनीति नहीं कर रहे हैं? क्या वो मौज करने के लिए मुख्यमंत्री बने हैं और लालच देने के लिए संसदीय सचिव का पद बांंट रहे हैं? इसलिए लाभ के पद का मामला बकवास है। इसके ज़रिए दिल्ली पर एक फालतू का मसला थोपा गया है। अव्वल तो इस व्यवस्था और इससे होने वाले कानूनी झंझटों को ही हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहिए। आपकी संस्थाओं का तमाशा उड़ रहा है। आंखे खोलकर देखिए। टीवी चैनलों के भरोसे देश को मत छोडि़ए। पता करते रहिए। देखते रहिए। आप किसी की साइड ले मगर तथ्य तो देखें। यह भी तो देखें कि चुनाव आयोग किसी का टाइपिस्ट तो नहीं बन रहा है।
०-लेखक – वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं।
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