परम्परावादी कांग्रेस स्वयं को बदलेगी या एम्बेसडर कार बनेगी

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०- अरुण पटेल

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुकाबले कांग्रेस किसी चेहरे को लेकर चुनाव लड़े या अपनी परम्परा के अनुसार सामूहिक नेतृत्व की परम्परा को आगे बढ़ाये। अभी भी कांग्रेस में चेहरा घोषित करने को लेकर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और कांग्रेस हाईकमान इस बात को लेकर पसोपेश में है। कुछ कांग्रेस विधायकों ने प्रदेश प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया के सामने खुलकर शिवराज के मुकाबले किसी चेहरे को सामने रखकर चुनावी समर में जाने की मांग की है। जबकि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव अभी भी कह रहे हैं कि कांग्रेस में ऐसी परम्परा नहीं रही है कि चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाए। दो वरिष्ठ नेता कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस पक्ष के बताये जाते हैं कि किसी चेहरे को सामने रखकर चुनाव में जाना बदले हुए परिवेश में जरूरी है। देखने की बात यह होगी कि कांग्रेस परम्परा से चिपकी रहकर एम्बेसडर कार बनना पसंद करेगी या परंपरा छोडऩे का जोखिम उठायेगी। मुंगावली और कोलारस विधानसभा उपचुनाव की घोषणा हो गयी है और इन उपचुनावों में प्रत्याशी चाहे कोई भी हो असली मुकाबला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेस नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच ही होगा। यह चुनावी मुकाबला दोनों के बीच प्रतिष्ठा का बन गया है क्योंकि 2018 के विधानसभा आमचुनाव के पूर्व अब कोई राजनीतिक मुकाबला नहीं होगा और एक प्रकार से इसे ही सेमीफायनल माना जा रहा है। नगरीय निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के अनूकूल नहीं रहे हैं और उसकी एकतरफा जीत के रिकार्ड में इन नतीजों ने स्पीड ब्रेकर का काम किया है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव नतीजे जहां उत्साहवर्धक हैं वहीं दूसरी ओर भाजपा को आत्मचिंतन करने के लिए विवश करने वाले हैं।

कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में किसी चेहरे को आगे कर लड़े या फिर बिना किसी चेहरे को सामने कर चुनावी समर में जाए, इसको लेकर चर्चाओं का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ था वह अभी पूरी तरह थमा नहीं है और अनेक विधायक यह चाहते हैं कि किसी चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाए। विधायकों का कहना है कि लोग हमसे क्षेत्र में पूछते हैं कि मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया की बैठक में आये कांग्रेस विधायकों में से लगभग आधा दर्जन विधायकों ने खुलेआम मांग की है कि कांग्रेस को चेहरा सामने रखकर चुनाव लडऩा चाहिए। वरिष्ठ विधायक आरिफ अकील, युवा विधायक तरुण भानोट और अनुसूचित जाति विधायक इमरती देवी सहित लगभग आधा दर्जन विधायकों की ऐसी ही राय थी। जहां तक बावरिया का सवाल है उन्होंने भी इस संभावना को पूरी तरह नहीं नकारा बल्कि यह कहकर बड़ी ही होशियारी से गेंद हाईकमान के पाले में डाल दी कि वे इस बात के लिए अधिकृत नहीं हैं और परिस्थितियों को देखते हुए हाईकमान को जो ठीक लगेगा वह करेगा। इससे पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी और झारखंड के प्रभारी पूर्व केंद्रीय मंत्री आर.पी.एन. सिंह ने एक टीवी चैनल से साक्षात्कार में मध्यप्रदेश के संदर्भ में कहा था कि कांग्रेस की चेहरा आगे कर चुनाव मैदान में जाने की परम्परा नहीं रही है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बड़े चेहरे हैं फिर भी यदि हाईकमान चेहरे को सामने कर चुनाव मैदान में जाना चाहेगा तो वह हमारा रणनीतिक फैसला होगा और उसकी घोषणा समय आने पर कांग्रेस हाईकमान करेगा, अभी हम अपनी रणनीति का इतनी जल्दी खुलासा नहीं करेंगे।

इससे एक बात साफ होती है कि कहीं न कहीं कांग्रेस में अभी भी चेहरे को लेकर पसोपेश की स्थिति है और वह अभी अपने पत्ते नहीं खोलना चाहती। जिस परम्परा की कांग्रेस के कुछ नेता दुहाई दे रहे हैं वह पुरानी पड़ गयी है और उस पर चलकर वांछित चुनावी नतीजे सामने आयेंगे इसको लेकर कांग्रेसजनों के ही एक वर्ग में संदेह है। एम्बेसडर कार जिसने अपनी परम्परा और मूल डिजाइन में कोई बदलाव समय की मांग और लोगों की बदलती इच्छाओं के अनुरूप नहीं किया था तो वह इतिहास की वस्तु हो गई। ऐसे ही वामपंथियों ने भी तौर-तरीकों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं किया तो उनका भी आधार निरंतर सिकुड़ रहा है। कांग्रेस परम्पराओं से चिपकी रहकर एम्बेसडर कार बनना पसंद करती है या फिर समय के अनुसार स्वयं जोखिमपूर्ण रास्ते पर आगे बढऩे का साहस दिखायेगी यह तो समय ही बतायेगा। राहुल गांधी उदार हिंदुत्व के रास्ते पर कांग्रेस को आगे बढ़ाने की जोखिमपूर्ण राजनीति पर आगे बढ़ रहे हैं इसलिए अभी भी यह उम्मीद कुछ कांग्रेसजनों को है कि वे किसी चेहरे को आगे कर चुनाव मैदान में जायेंगे।

मध्यप्रदेश में स्थानीय निकाय के जो चुनाव नतीजे सामने आये हैं उनमें कांग्रेस ने भाजपा को कांटे की टक्कर दी है और एकतरफा जीत की भाजपाई चाहत को इससे झटका लगा है। नगरपालिकाओं और नगर पंचायतों के लिए 19 स्थानों पर चुनाव हुए थे जिनमें से भाजपा और कांग्रेस ने नौ-नौ स्थानों पर जीत दर्ज की है जबकि एक स्थान पर भाजपा का विद्रोही निर्दलीय उम्मीदवार जीता है। भाजपा अभी तक स्थानीय निकाय चुनाव में काफी अन्तर से कांग्रेस को पीछे छोड़ती रही थी, लेकिन इस बार मुकाबला लगभग बराबरी का रहा है। यह नतीजे जहां कांग्रेस के लिए उत्साहवर्धक हैं तो वहीं दूसरी ओर भाजपा के लिए आने वाले समय में सिरदर्द पैदा करने वाले बन सकते हैं। तीन बड़ी नगरपालिकाएं कांग्रेस ने भाजपा से छीन लीं और वे भी आदिवासी इलाके की हैं। छह नगरपालिकाओं के चुनाव हुए थे उनमें से दो पर भाजपा जीती और चार पर कांग्रेस को सफलता मिली। तेरह नगर पंचायतों में से सात पर भाजपा जीती और पांच कांग्रेस के खाते में गईं, जबकि एक स्थान पर भाजपा का विद्रोही सफल रहा। भाजपा के लिए यह संतोष की बात है कि पार्षदों की संख्या के मामले में वह कांग्रेस से काफी आगे रही लेकिन सीधे अध्यक्षीय निर्वाचन में कांग्रेस उसकी बराबरी पर आकर खड़ी हो गयी। मिशन 2018 के लिए भाजपा ने 200 प्लस का लक्ष्य रखा है और जिस ढंग से नतीजे सामने आ रहे हैं उसको देखते हुए उसे इस बात पर आत्मचिंतन करना होगा कि कहां और किस स्तर पर कमी रह गयी है और उसे किस प्रकार दूर किया जाए। चौथी बार प्रदेश में सरकार बनाने के लिए भाजपा को यह जरूरी है कि वह अपनी कमजोर कडिय़ों को पहचाने और खामियों को दूर करते हुए पूरी मुस्तैदी से चुनावी समर में जाए। स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता ने भाग नहीं लिया था, केवल अरुण यादव व अजय सिंह ने ही बराबरी की टक्कर दे दी है। भाजपा यदि सही प्रत्याशी का चयन नहीं कर पा रही या संगठन की माकूल पकड़ नहीं है तो फिर इस बात पर और गंभीरता से विचार करने के लिए अब भाजपा विवश होगी कि नंदकुमार सिंह चौहान के अध्यक्ष रहते क्या पार्टी आसानी से विधानसभा चुनाव जीत पायेगी या शिवराज के साथ उनकी रफ्तार से आगे बढऩे के लिए कोई नया चेहरा तलाशना होगा। आम चुनाव में सत्ता व संगठन में जिस प्रकार की जुगलबंदी 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव में थी वैसी ही जुगलबंदी की भाजपा को अब दरकार है। चित्रकूट में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने अपना गढ़ बचा लिया था और स्थानीय निकाय चुनाव में दिग्विजय सिंह का राघौगढ़ का किला भाजपा नहीं भेद पाई। यहां उनके बेटे विधायक जयवर्धन सिंह ने एकतरफा कांग्रेस को जीत दिलाने में सफलता हासिल की और अध्यक्ष के साथ ही 24 पार्षदों में से 20 पार्षद कांग्रेस के जीत गए। अब देखने की बात यही होगी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने प्रभाव वाले मुंगावली और कोलारस के गढ़ को बचा पाते हैं या नहीं। यहां 24 फरवरी को मतदान होगा और चुनाव नतीजों की घोषणा 28 फरवरी को होगी। इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों पर अभी कांग्रेस का ही कब्जा है और उसके विधायकों महेंद्र सिंह कालूखेड़ा तथा रामसिंह यादव के निधन के कारण उपचुनाव हो रहा है। शिवराज की कोशिश है कि इन दो में से कम से कम एक सीट भाजपा कांग्रेस से छीन ले ताकि उसको 2018 के पूर्व ही धीरे से एक जोर का झटका दिया जा सके।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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