ज्योतिरादित्य का आशावाद और कांग्रेस में एकजुटता दूर की कौड़ी

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०- अरुण पटेल

पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का कहना है कि मिशन 2018 के तहत प्रदेश में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस पूरी एकजुटता के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। यह सिंधिया का आशावाद हो सकता है लेकिन जमीनी हकीकत और आज तक के अनुभव के आधार पर कांग्रेसजनों में एकता या एकजुटता दूर की कौड़ी ही मानी जाती रही है। देखने वाली बात यही होगी कि सिंधिया का आशावाद किस सीमा तक आने वाले समय में सही साबित होता है। विभिन्न दिशाओं में अपनी-अपनी अंध महत्वाकांक्षाओं के घोड़े दौड़ाने वाले नेताओं की दिशा, ताल और लय एक हो पाती है या नहीं। सिंधिया अभी भी यह मानते हैं कि कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में किसी एक चेहरे को सामने रखकर चुनावी मैदान में जाना चाहिए और मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र-बिहार सहित जिन भी राज्यों में उसके पास चेहरे हैं उसे मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव लडऩा चाहिए। जहां तक चेहरे का सवाल है उनका मानना है कि चेहरा घोषित किया जाए या नहीं यह हाईकमान को तय करना है और हाईकमान जो भी निर्णय लेगा वह सभी को स्वीकार्य होगा। मध्यप्रदेश में कांग्रेस नेताओं की भूमिका 18 जनवरी को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ प्रदेश के नेताओं की होने वाली मुलाकात के बाद तय होगी। लेकिन कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में दो-टूक फैसला कर जिम्मेदारियां बांट दी हैं और एक अहम जिम्मेदारी जो कि चुनाव अभियान समिति की है उसका दायित्व पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत को सौंपा है।

चुनाव साल होने से अब आलाकमान और कांग्रेस नेता एक तरह से चुनावी मोड में आ गए हैं, उनकी सक्रियता बढ़ी है और इससे कार्यकर्ताओं में भी हलचल बढ़ी है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के पहले दौरे की आवश्यकता बड़ी शिद्दत से प्रदेश कांग्रेस महसूस कर रही है और उसे भरोसा है कि अब यहां भी राहुल गांधी की सक्रियता काफी बढ़ेगी और उनके रडार पर प्रदेश में चलने वाली प्रदेश की गतिविधियां रहेंगी। एक तरफ कांग्रेस जहां विधानसभा चुनाव के लिए कमर कस रही है तो वहीं दूसरी ओर मुंगावली और कोलारस में होने वाले संभावित विधानसभा उपचुनाव पर भी उसकी पैनी नजर है। कांग्रेस हर हाल में ये सीटें जीतकर यह दर्शाना चाहती है कि उसकी आंखों में चित्रकूट की जीत से सत्ता में आने का जो धुंधला रास्ता नजर आया था वह इन दोनों सीटों के उपचुनाव जीतकर यह साफ करेगा कि सत्ता में आने की राह पर वह सधे कदमों से आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी पूरी ताकत लगाकर इन दो सीटों में से कम से कम एक सीट जीतकर कांग्रेस की आंखों में किरकिरी पैदा करने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देंगे। सिंधिया के प्रभाव वाले उनके संसदीय क्षेत्र में यदि कांग्रेस से भाजपा एक सीट छीन लेती है तो भाजपा को यह प्रचार करने में आसानी होगी कि सिंधिया पूरे प्रदेश में शिवराज का क्या मुकाबला कर पायेंगे जो अपने ही क्षेत्र में एक सीट नहीं बचा पाये। यही कारण है कि सिंधिया ने अपने इन क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ा दी है और इन उपचुनावों को अपनी प्रतिष्ठा का मानकर लड़ रहे हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव की मौजूदगी में मुख्यमंत्री का चेहरा आगे करने की बात कहकर सिंधिया ने यह जता दिया कि अभी पूरी तरह से चेहरा घोषित नहीं करने का हाईकमान ने दोटूक फैसला नहीं किया है और यह चेप्टर अभी खुला हुआ है। जहां तक सिंधिया के सुझाव का सवाल है मौजूदा परिदृश्य कांग्रेस के लिए हर राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा आगे कर चुनावी समर में जाना बिना चेहरे की तुलना में ज्यादा मुफीद होगा। सिंधिया के इस तर्क की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जब आज मतदाता वार्ड मेम्बर से लेकर विधायक और सांसद तक के लिए वोट देते समय यह चाह रखता है कि उसके वोट से किसे ताकत मिलेगी तो उसके मन में यह चाह भी होगी कि हमारे वोट से मुख्यमंत्री कौन बनेगा। यह सही है कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री घोषित कर चुनावी मैदान में जाने की परम्परा नहीं रही है लेकिन अपवाद स्वरूप यह परम्परा बदली भी है। जहां परम्परा बदली है वहां पंजाब में कांग्रेस की सरकार भी बनी है। 2003 से भाजपा ने मुख्यमंत्री का चेहरा सामने कर चुनाव में जाने की शुरुआत की और इससे उसे राज्यों में अच्छी-खासी सफलता भी मिली। इसके विपरीत कांग्रेस ने भाजपा के मुख्यमंत्रियों के सामने कोई चेहरा नहीं रखा तो वह मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में लगातार तीन चुनाव भी हार चुकी है। अब यह तो कांग्रेस आलाकमान को तय करना है कि वह अपनी पुरानी परम्परा से चिपकी रहेगी या मतदाताओं के मानस को भांपते हुए किसी चेहरे को सामने कर चुनावी समर में जायेगी। सवाल यह नहीं है कि मध्यप्रदेश में चेहरा केवल ज्योतिरादित्य सिंधिया या कमलनाथ हों बल्कि अरुण यादव और अजय सिंह में से भी वह चेहरा चुन सकती है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में जरूरी नहीं कि वह भूपेश बघेल को ही चेहरा बनाये बल्कि टी.एन. सिंहदेव, चरणदास महंत, रविन्द्र चौबे या किसी अन्य को भी चेहरा बना सकती है। देखने की बात केवल यही रहेगी कि राहुल गांधी, शिवराज और रमन सिंह के मुकाबले दो अदद चेहरे खोज पाते हैं या नहीं।
छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांग्रेस के गठन से जो संकेत मिला है उससे लगता है कि मध्यप्रदेश में भी प्रमुख नेताओं को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे जायेंगे और विभिन्न क्षेत्रों व वर्गों के बीच सामंजस्य बैठाया जाएगा। मध्यप्रदेश में तीन से चार कार्यकारी अध्यक्ष हो सकते हैं और इसके अलावा विभिन्न महत्वपूर्ण कमेटियों में आला नेताओं को कमान सौंपी जायेगी। कमेटियों में एक महत्वपूर्ण कमेटी चुनाव अभियान समिति होती है जो मतदाताओं के मानस में पार्टी का आधार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, इसका दायित्व छत्तीसगढ़ में चरणदास महंत को सौंपा गया है। अजीत जोगी की चुनौती से निपटने के लिए भूपेश बघेल की जिस रणनीति पर हाईकमान ने मोहर लगाई है उसके तहत नई पार्टी बनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की धर्मपत्नी डॉ. रेणु जोगी को उपनेता सहित सभी पदों से हटाकर कांग्रेस आलाकमान ने यह संदेश दे दिया है कि न तो कांग्रेस का उनकी पार्टी से किसी प्रकार का तालमेल होगा और न ही कांग्रेस को उनकी परवाह है। इसी तरह सुनियोजित तरीके से कांग्रेस ने जोगी के आधार वोट बैंक में सेंध लगाने के मकसद से उनके नजदीक रहे लोगों को आगे कर दिया है। बतौर कार्यकारी अध्यक्ष रामलाल उइके और शिव डहरिया को चुना गया है। रामलाल उइके आदिवासी हैं, भाजपा विधायक रहे हैं और अजीत जोगी के लिए त्यागपत्र देकर उन्होंने उनके पहली बार विधायक बनने का मार्ग प्रशस्त किया था और इसके साथ ही वे कांग्रेस में आ गये थे। जोगी के प्रभाव वाले क्षेत्र के वे एक आदिवासी नेता हैं। शिव डहरिया भी जोगी के विश्?वासपात्र विधायक रहे हैं, लेकिन नई पार्टी बनाने पर उन्होंने उनसे दूरी बना ली थी। डहरिया सतनामी समाज के हैं और इस समाज में जोगी के आधार को कमजोर करने के लिए उन्हें भी कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। जोगी की पत्नी रेणु जोगी के स्थान पर बस्तर संभाग के आदिवासी नेता कवासी लखमा को चुना गया है। वे भी जोगी के खासमखास रहे हैं। छत्तीसगढ़ के एक बड़े आदिवासी नेता जो अविभाजित मध्यप्रदेश में भी लम्बे समय तक विधायक रहे हैं, उन बोधराम कंवर को अनुशासन समिति का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। प्लानिंग, स्ट्रैजी कमेटी का अध्यक्ष पूर्व नेता प्रतिपक्ष और अविभाजित मध्यप्रदेश में काबीना मंत्री रहे रविन्द्र चौबे को बनाया गया है। इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि इतने बड़े नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी देने से अध्यक्ष की भूमिका गौण न हो जाए, इसलिए भूपेश बघेल को प्रदेश चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। अभी वहां कुछ और पदाधिकारियों के शामिल होने की संभावना है। अब मध्यप्रदेश में राहुल गांधी के फैसले का इंतजार है जो कि 18 जनवरी के बाद कभी भी सामने आ सकता है।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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