संघ की बैठक में आदिवासी और दलितों की उपेक्षा को लेकर उठे सवाल

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। जिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के १२ वर्षों के कार्यकाल में प्रदेश के किसानों की खेती को लाभ का धंधा बनाने के ढिंढोरे की तरह प्रदेश में दलित और आदिवासी वर्ग के लोगों की बेहतरी के लिये तमाम योजनायें चलाई गई हों लेकिन उन सभी योजनाओं के बावजूद प्रदेश में न तो दलितों की स्थिति में सुधार हुआ और न ही आदिवासी वर्ग का इसी सबको लेकर यह चिंता भी संघ की बैठक में चर्चा का दौर चला तो वहीं इस दौर में शायद संघ प्रमुख के साथ-साथ संघ से जुड़ी विभिन्न अनुषांगिक संस्थाओं से जुड़े सदस्यों को शायद प्रदेश के ठेठ आदिवासी संसदीय क्षेत्र झाबुआ-रतलाम के इतिहास में हुए पहले उपचुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री से लेकर पूरे लाव लश्कर के साथ सरकारी मशीनरी का भरपूर उपयोग करने के बाद भी वहां के वर्तमान सांसद कांतिलाल भूरिया और कांग्रेसी नेताओं के साथ-साथ ठेठ आदिवासियों ने जो भाजपा को करारी हार का स्वाद चखाया था शायद इस बैठक के दौरान संघ प्रमुख से लेकर सभी सदस्यों को स्मरण हो आया और इसके चलते उन्हें अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के मतदाताओं के साथ-साथ उससे जुड़े नेताओं की उपेक्षाओं को लेकर चर्चाओं का दौर जारी रहा। मजे की बात यह है कि जिस आदिवासी-दलित वर्ग से जुड़े नेताओं की पार्टी के वर्तमान नेतृत्व के द्वारा की गई उपेक्षा को लेकर चिंतन किया गया तो वहीं इस वर्ग के मतदाताओं को लुभाने के लिये भी क्या-क्या प्रयास किये जायें इस पर मंथन किया गया, यह सर्वविदित है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के १२ वर्षों के कार्यकाल के दौरान यहां प्रदेश के आदिवासी-दलित पार्टी के नेताओं की जमकर उपेक्षा तो की ही गई तो वहीं इस वर्ग के लोगों पर अत्याचार की घटनाएं पूरे कार्यकाल के दौरान सुर्खियों में रहीं तो वहीं इन वर्ग के लोगों की जमीनों पर दबंगों द्वारा कब्जा किये जानेे की घटनाओं में बेहताशा वृद्धि का दौर जारी रहा तो वहीं सत्ता से जुड़़े लोगों द्वारा आदिवासी और दलितों की जमीनों को औने-पौने दामों में खरीदी का दौर भी खूब जारी रहा। जहां शिवराज सरकार के कार्यकाल में आदिवासी-दलित वर्ग से जुड़े लोगों के बेहतरी के लिए कागजों में तो तमाम योजनायें चलाई गई लेकिन उन योजनाओं का लाभ इस वर्ग से जुड़े कितने लोगों को मिला यह जाँच का विषय है। हाँ, यदि शिवराज सरकार के कार्यकाल में उस वर्ग से जुड़े दबंग भाजपा नेताओं का खूब चली लेकिन वह उनके और उनके परिवारों तक ही सीमित रही जिसके चलते आदिवासी-दलित वर्ग से जुड़े भाजपाई नेताओं के द्वारा शिवराज सरकार की सबका साथ, सबका विकास की अवधारणा के नारे के चलते जो परम्परा अवैध रेत खनन अवैध वन कटाई, अवैध शराब का कारोबार के साथ-साथ हर प्रकार के अवैध कारोबारों में लिप्त हो भाजपा से जुड़े आदिवासी-दलित वर्ग के नेताओं ने इस वर्ग के उस अंतिम छोर के व्यक्ति की बेहतरी की उपेक्षा करते हुए खूब लाभ उठाया तो वहीं झाबुआ जिले में तो राजनीति की यह स्थिति है कि वहां शराब माफियाओं की सरकार है जिसके चलते भाजपा के तमाम नेताओं पर झूठे केस में फंसाकर उन्हें जेल भेजने का दौर भी खूब चला इन सब मुद्दों को लेकर पिछले दिनों इस जिले के प्रभारी मंत्री के द्वारा सर्किट हाउस में अधिकारियों और भाजपा नेताओं की बैठक के दौरान इस तरह के तमाम मामले सामने आये लेकिन इसके बावजूद भी इस स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और आज भी स्थिति यह है कि इस जिले के अधिकांश थाने शराब माफिया चला रहे हैं तो वहीं इस जिले के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग के ही विभाग से जुड़े दो समिति सेवक प्रदेश में उन भाजपा नेताओं के उन नेताओं के पास जिनके पास शिवराज सरकार आने के पूर्व टूटी साइकलें तक नहीं थीं, आज भ्रष्टाचार की इस सरकार में बह रही ऊपर से लेकर नीचे तक की गंगोत्री के चलते वह आज आलीशान भवनों और लग्जरी वाहनों में फर्राटे लेते नजर आ रहे हैं, इन्हीं नेताओं के पदचिन्हों पर चलते हुए ठेठ आदिवासी जिला झाबुआ के दो समिति सेवक लग्जरी वाहन पजेरो में फर्राटे लेकर आदिवासी वर्ग की बेहतारी के लिये सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर सवाल खड़े करते नजर रहे हैं, तो वही शिवराज सरकार के इन १२ वर्षों के कार्यकाल में संगठन का महत्व घटा है तो वहीं आदिवासी और दलित वर्ग के नेताओं के साथ जमकर भेदभाव और उपेक्षा का दौर भी खूब चला वैसे तो शिवराज सरकार के कार्यकाल में लगभग यही स्थिति हर वर्ग के भाजपा के नेता के साथ अपनाई गई और उन भाजपा के ताकतवर नेताओं का जिनको पिछले ३७ वर्ष से लोकतंत्र की प्रक्रिया केे चलते कांग्रेस उनको जनप्रतिनिधित्व से अलग नहीं कर पाई लगभग यही स्थिति शिवराज सरकार में हर वर्ग के नेताओं के साथ अपनाई गई फिर चाहे वह आदिवासी-दलित या ब्राह्मण वर्ग से जुड़ा नेता हो, इन सभी वर्ग के नेताओं के साथ शिवराज सरकार में जंगल में एक शेर की परम्परा को कायम रखते हुए जमकर इन सभी वर्गों की उपेक्षा की गई। अब देखना यह है कि मिशन-२०१८ के लिये संघ प्रमुख की चल रही यह बैठक इन वर्ग के नेताओं की उपेक्षा को किस तरह से लेता है और चुनावी समर में फतेह पाने के लिये कितने आदिवासी व दलित नेताओं को शिवराज की कार्यशैली के आगे कितना बलवान बनाने में सफलता हासिल करते हैं।

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