दलित राजनीति में देशद्रोही जहर घातक

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०- जयकृष्ण गौड़
स्वतंत्रता के बाद हमने पाश्चात लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया। संविधान के अनुसार व्यवस्थाएं बनी। बहुमत के आधार से सत्ता संचालन के अधिकार मिलने से राजनैतिक नेतृत्व का ध्यान चुनाव पर केन्द्रित हो गया। जातीय भावना को भुनाकर थोक वोट प्राप्त करने की प्रवृत्ति बढ़ी। इसी  राजनैतिक में जातिवाद, वंशवाद, तुष्टीकरण की पैठ हो गई। इसी आधार पर टिकिट देने से लेकर चुनावी जीत की रणनीति अपनाई गई। अगड़े, पिछड़े, स्वर्ण, आदिवासी, हरिजन शब्द जातीय भावना भडकाने के लिए अपनाये गये। इन शब्दों को संविधान में भी स्थान मिल गया। एक और शब्द प्रचलित हुआ, जिसे दलित कहा गया और इसकी पहचान हरिजन, आदिवासी आदि पिछड़े या कथित उपेक्षित समुदाय से जोडकऱ बनी। दलित शब्द का राजनैतिक शोषण बहुजन समाजवादी पार्टी के काशीराम, मायावती ने किया। बाबा साहेब अम्बेडकर ने समग्र समाज के हित के लिए काम किया, उनका संविधान के निर्माण में प्रमुख योगदान रहा, विडंबना यह रही जो संविधान सारे भारत के लिए है, उसके निर्माता की प्रतिमा को दलित राजनीति में खड़ी कर दी गई। चाहे वाल्मीक, एकलव्य, शबरी, रविदास हो, इनका जीवन भारतीय समाज के लिए प्रेरक है, लेकिन राजनैतिक स्वार्थ के लिए महापुरूषों को भी जातीय सीमा में बांधने की प्रवृत्ति बढ़ी। जातीय भावना को राष्ट्रीय भावना से ऊपर मानने की बुराई पनपी। राजनीति राष्ट्र और समाजहित में केन्द्रित होने के बजाय, जाति, मजहब और परिवार, वंश में केन्द्रित हो गई। वोट के लिए राष्ट्रहित के साथ भी खिलवाड़ होने लगा। सेक्यूलर नीति तुष्टीकरण और हिन्दू विरोधी नीति का परिचायक हो गई।

दलित राजनीति का नंगा नाच महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव से फैली हिंसा में दिखाई दिया। दो सौ वर्ष पुराने घटनाक्रम के बारे में बताया जाता है कि भारत को गुलामी की जंजीरों से जकडऩे वाले अंग्रेजों की सेना में कुछ महार जाती के लोग शामिल थे उन्होंने अंग्रेजों के साथ लडकऱ पेशवाओं को पराजित किया। चूंकि पेशवा ब्राह्मण थे और अंगे्रजों के साथ लडऩे वाले महार थे, जिनको राजनीति में दलित कहा जाता है। इसलिए अंग्रेजों की जीत को दलित राजनीति से जोडकऱ दलित शौर्य का गौरव माना गया। सवाल यह है कि जिन अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया, उनके खिलाफ लडऩे वाले देशभक्त है या अंग्रेजों का साथ देने वाले? शिवाजी के आदर्शों के अनुसार पेशवाओं ने अपने शौर्य की इबारत लिखी। बाजीराव पेशवा ने तो दिल्ली तक विदेशी मुगल, पठानों को परास्त किया। शिवाजी की सेना में मालवे, महार आदि सभी जाती के लोग थे। इंदौर-महेश्वर में धनगर मराठाओं का शासन रहा, जिन्हें महाराष्ट्र मेें पशु चराने वाले माना जाता है। इसी होल्कर राज्य में देवी अहिल्या ने आदर्श राज्य स्थापित किया। पूरे भारत के तीर्थों में देवी अहिल्या ने धर्मशाला, मंदिर घाटों का निर्माण कराया। होल्कर सेना में भी भील थे। उनके नाम से ही भील पलटन बनी। राणा प्रताप की सेना में भील सैनिक थे, उन्होंने मुगल अकबर की सेना के हल्दीघाटी के युद्ध में छक्के छुड़ा दिये। हल्दीघाटी में भीलवीरों ने बलिदान दिया। चाहे बिरसा मुंडा हो, टंट्या भील हो इनका जीवन देश के लिए था। उनके जीवन से प्रेरणा मिलती है या भारत को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों का साथ देने वालों के शौर्य से हम गौरव की अनुभूति प्राप्त करते है? फिर तो 1857 में अंग्रेजों ने अपनी सेना के भारतीयों के द्वारा ही पहले स्वतंत्रता संग्राम को बर्बरता से कुचला, क्या अंगे्रजों की सेना के भारतीयों की बर्बरता की शौर्य गाथा के गीत हम गायेंगे? यदि कोई ऐसा करता है तो यह न केवल बलिदानी देशभक्तों का अपमान है, बल्कि ऐसी प्रवृत्ति से देश विरोधी प्रवृत्ति को ही बल मिलता है। यदि हम इसी संदर्भ में भीमा कोरेगांव से भडक़ी हिंसा, जिसने एक युवक की बलि ले ली, तीन दिन तक पूरा महाराष्ट्र इस हिंसा का बंधक बन गया। जिन दलितों के नाम पर हिंसा हुई, उन्हें तो केवल पुलिस की लाठियां मिली, लेकिन राजनीतिक लाभ मिला गुजरात में दलित राजनीति से विधायक बने जिग्नेश मेवाणी और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल जेएनयू के कथित छात्र नेता उमर खालिद को। इसे समाज में भेदभाव की राजनीति का जहर घोलने वाली दलित और देशद्रोही विचारों को संगम ही कहा जायेगा। मायावती दलित मुस्लिम की बात कहकर समाज में भेद करना चाहती है। जिग्नेश और खालिद की राजनीति के नाते इस घटना को देखने से भ्रम ही पैदा होगा। राष्ट्रीय समाज, जिसे हिन्दू समाज कहते है, जिसके आधार पर यह सनातन राष्ट्र भारत खड़ा है, उसकी एकता को को छिन्न-भिन्न कर देश को खंडित करने की साजिश का गठजोड़ है जिग्नेश और खालिद की राजनीति। ये समाज और देश तोडक़ शक्तियों के ऐसे मोहरे है, जो विदेशी शक्तियों के संकेत से चलते है। गुजरात चुनाव में भी जातिवादी राजनीति का खेल राष्ट्रवादी ताकतों को कमजोर करने के लिए खेला गया। अब भी इन मोहरों का उपयोग कर सामाजिक एकता को कमजोर करने की साजिश जारी है। भीमा कोरेगांव हिंसा की न्यायिक आदेश दे दिये गये है।

जिग्नेश मेवाणी और उमर खालिद के खिलाफ हिंसा भडक़ाने के मामले दर्ज हो गये, सर्च वारंट भी जारी हो गया है। प्रशासकीय व्यवस्था और कानून के द्वारा जो कार्यवाही होना है, होगी ही। इसका केवल यह उपचार नहीं है। दलित मुस्लिम राजनीति के उतने ही घातक परिणाम हो सकते है, जितने अल्पसंख्यक या मजहबी राजनीति के कारण देश का विभाजन हुआ। मुस्लिम राजनीति का चेहरा है, असरूद्दीन औवेसी, जिनका भाई सरेआम हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलता है, वे भी दलित मुस्लिम एकता की बात करने लगे है। यह साजिश है हिन्दू समाज से दलितों को अलग करने की। जिस तरह मुस्लिमों में यह भ्रम फैलाया गया कि तुम्हारी संस्कृति, तुम्हारे पूर्वज हिन्दुओं से अलग है, तुम्हारी मजहबी राष्ट्रीयता है, यही कारण है कि हिन्दू विरोधी नीतियों से मुस्लिम संतुष्ट होते है। जबकि सच्चाई यह है कि मुस्लिमों की संस्कृति और पूर्वज भी वहीं है जो हिन्दुओं के है। इसी झूठ का दलित सम्प्रदाय के गले उतारने की साजिश के मोहरे है जिग्नेश और खालिद। हिन्दू समाज के अंग-भंग करने की साजिश उसी तरह की है, जिस तरह फूट डालो और राज करो की नीति पर अंग्रेज चले थे। अब हिन्दू पहचान को मिटाकर दलितों को पांच सौ वर्ष की गुलामी की याद दिलाई जा रही है। उन्हें अपनी मूल संस्कृति से अलग करने की यह साजिश है। जिस तरह मुस्लिमों को गलत तथ्यों के आधार पर अपनी मूल संस्कृति से अलग कर अरबी इस्लामी संस्कृति का पाठ पढ़ाया गया। इसी कारण मुस्लिम सम्प्रदाय राष्ट्र की मूलधारा से छिटका दिखाई देता है। इसी तरह दलित राजनीति का जहर भी मूल संस्कृति से अलग करने की सुनियोजित साजिश है। इस साजिश को समझकर इसे असफल करने के प्रभावी प्रयास ही देश की एकता अखंडता को सुदृढ़ और स्थिर रखने में सहायक हो सकते है। यह दलित मुस्लिम राजनीति देशद्रोहिता की पर्याय बन गई है। सामाजिक समरसता के इस मंत्र को ध्यान में रखकर इस साजिश को असफल करना होगा। रा.स्व. संघ के द्वितीय सरसंघ चालक पूज्य गुरुजी ने कहा है कि ‘हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत् मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र: समानता। अर्थात सब हिन्दू भाई है, कोई भी हिन्दू पतित नहीं है। हिन्दुओं की रक्षा मेरी दीक्षा है, समानता, यही मेरा मंत्र है।
०-लेखक – वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक है।
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