बिहार की तर्ज पर प्रदेश में आकार लेती महागठबंधन की राजनीति

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०- अरुण पटेल
बिहार की तर्ज पर मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को मिशन 2018 में शिकस्त देने के मकसद से महागठबंधन बनाने की राजनीतिक पहल प्रारंभ हो गयी है और यहां कांग्रेस की अगुवाई में प्रयास तेज हो गए हैं। विगत शुक्रवार को भोपाल के छोला दशहरा मैदान में लाठी रैली के माध्यम से जो एक नई राजनीतिक बिसात बिछाने का आगाज हुआ है उसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और जदयू के शरद यादव धड़े ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि कांग्रेस की अगुवाई में मध्यप्रदेश में विपक्षी दलों का एक महागठबंधन आकार लेने जा रहा है। इसमें बहुजन समाज पार्टी के भी शामिल होने के संकेत हैं। चूंकि यहां पर कांग्रेस को छोड़कर विपक्ष की राजनीति करने वाले अन्य दलों का कोई व्यापक जनाधार नहीं है इसलिए कांग्रेस की अगुवाई में महागठबंधन बनना उत्तरप्रदेश की तुलना में यहां अधिक आसान है। बहुजन समाज पार्टी से भी कांग्रेस की बात चल रही है और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ, गोंगपा और बसपा से तालमेल कराने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं। राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और प्रदेश कांग्रेस के महामंत्री संगठन चंद्रिका प्रसाद द्विवेदी भी बसपा से गठबंधन की संभावनाओं के साथ ही अन्य दलों से कैसे तालमेल हो सकता है इस दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं।

इस रैली के माध्यम से कांग्रेस हाईकमान से सीधे-सीधे मांग की गई कि उसे डेढ़ दशक बाद सत्ता में वापस आने का सपना साकार करना है तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव मैदान में जाने का ऐलान करना चाहिए। रैली से गठबंधन की आधार भूमि तो तैयार हो रही है लेकिन साथ ही देखने वाली बात यह होगी कि इससे कांग्रेस के भीतर अरुण यादव का महत्व कितना बढ़ता है और कांग्रेस को मजबूती के साथ ही साथ उनकी अपनी राजनीति कितनी प्रभावी होती है। कांग्रेस अभी इस बात को लेकर उहापोह की स्थिति में है कि मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कर चुनाव लड़ा जाये या विभिन्न प्रभावशाली नेताओं को सुनिश्चित जिम्मेदारियां देकर चुनावी मैदान में कूदें। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से चेहरा कौन होगा यह गुत्थी सुलझ भी नहीं पाई थी कि जिन सहयोगियों के सहारे वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अगुवाई में भाजपा को शिकस्त देने की रणनीति बना रही है उन्होंने अरुण यादव का नाम आगे कर दिया है। जिस प्रकार की राजनीतिक बिसात गुजरात की तरह प्रदेश में कांग्रेस बिछाना चाहती है उसमें इन हालातों के चलते अरुण यादव की अनदेखी अब आसान नहीं होगी। कांग्रेस जो भी रणनीति बनाने जा रही है वह अंतिम चरण में है और उसका ऐलान अतिशीघ्र हो जाएगा। चूंकि अब चुनाव के लिए अधिक समय नहीं बचा है इसलिए फैसले की घड़ी नजदीक है। कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव के बाद प्रदेश अध्यक्ष से लेकर जिला अध्यक्षों, ब्लाक अध्यक्षों, मंडलों, सेक्टर कमेटियों और बूथ कमेटियों का गठन भी इस दौरान हो जाएगा ताकि वह एक सुनिश्चित रणनीति के तहत मिशन 2018 को आकार दे सके।
राजधानी भोपाल में पूर्व सांसद सुखलाल कुशवाहा की याद में आयोजित लाठी रैली जो कि अखिल भारतीय महात्मा फुले समता परिषद के बैनर तले हुई उसमें एक नये सियासी महागठबंधन के ऐलान के साथ ही इस बात पर जोर दिया गया कि नई सरकार यदि कांग्रेस के नेतृत्व में बनती है तो उसका नेतृत्व पिछड़े वर्ग के हाथों में होना चाहिए। साझी विरासत बचाओ अभियान के तहत भाजपा के खिलाफ सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने के अभियान में भिड़े पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव ने कहा कि कांग्रेस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगली सरकार बनने पर मुख्यमंत्री पिछड़े वर्ग का होगा। तो वहीं भरिप बहुजन महासंघ के नेता प्रकाश अम्बेडकर जो कि बाबा साहब अम्बेडकर के पोते हैं ने दो-टूक शब्दों में कहा कि कांग्रेस पार्टी अरुण यादव को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़े। इस रैली में जहां एक ओर विपक्षी एकता की पहल हुई तो वहीं दूसरी ओर पूर्व सांसद सुखलाल कुशवाहा के पुत्र सिद्धार्थ कुशवाहा ने इसके माध्यम से अपनी ताकत दिखाते हुए स्वयं के लिए संभावनाएं तलाशने की कोशिश की। इस प्रकार लगता है कि कांग्रेस दलितों को साधने की इनके माध्यम से कोशिश करेगी। मध्यप्रदेश में सामान्यतया दलित मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर अधिक रहा है और संघ परिवार सामाजिक समरसता पर विशेष जोर दे रहा है इसलिए इस वर्ग में सेंध लगाने के उद्देश्य और विपक्षी मतों का बंटवारा रोकने के लिए बसपा को भी इस गठबंधन का अंग बनाने के लिए कांग्रेस पूरी कोशिश कर रही है। चूंकि यहां किसी अन्य दल से बसपा की उतनी प्रतिस्पर्धा नहीं है जितनी उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी से है, इसलिए यहां गठबंधन का हिस्सा होने में शायद मायावती को कोई एतराज नहीं होगा। वहीं कांग्रेस हाथी का साथ पाने के लिए बेताब है। कांग्रेस की सोच यह है कि बसपा और गोंगपा को साथ लेकर न केवल मध्यप्रदेश बल्कि छत्तीसगढ़ में भी अपनी चुनावी संभावनाओं को वह चमकीला बना सकती है तथा अजीत जोगी की पार्टी की चुनौती को न्यूनतम कर सकती है। कांग्रेस हर हाल में 2018 में सत्ता में आना चाहती है इसलिए यहां राहुल गांधी भी अपनी सक्रियता बढ़ायेंगे एवं प्रदेश स्तर पर कांग्रेस पार्टी नये-नये प्रयोग करने से नहीं चूकेगी, जिनसे अभी तक बड़ा दल होने के मिथक में परहेज कर रही थी। उत्तरप्रदेश की सीमा से लगे इलाकों में बसपा और सपा से उसका तालमेल चुनावी गणित के हिसाब से फायदेमंद हो सकता है। कांग्रेस बसपा को डेढ़ से दो दर्जन तथा सपा, गोंगपा और शरद यादव धड़े एवं रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया को एक से डेढ़ दर्जन सीटें देकर संतुष्ट कर सकती है। कांग्रेस की रणनीति यही है कि सबको समेटने के लिए यदि उसे 30 तक सीटें देना पड़ीं तो वह इसके लिए सहर्ष तैयार रहेगी। वामपंथियों को भी इस धड़े में शामिल करने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं पिछड़े वर्ग के बड़े नेता हैं इसलिए उन पर निशाना साधते हुए शरद यादव ने कहा कि आरक्षण बचाने का ढोंग करने वाली शिवराज सरकार पिछड़ा वर्ग विरोधी है। “कोई माई का लालÓÓ जुमला उछालने वाले शिवराज सिंह चौहान पिछड़ा वर्ग विरोधी हैं यही कारण है कि पिछड़ा वर्ग को राज्य में आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। पदोन्नति का लाभ भी इस वर्ग को अब नहीं मिल पा रहा है और युवा चपरासी भर्ती होकर उस पद पर ही रिटायर हो जायेगा। इस रैली में मौजूद शरद यादव, पूर्व सांसद प्रकाश अम्बेडकर और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव तथा प्रदेश प्रभारी सचिव जुबेर खान ने एक स्वर से पिछड़े वर्गों के साथ दलित, मुस्लिम और आदिवासियों को एकजुट करने पर जोर दिया। शरद यादव का कहना था कि पिछड़े, दलित, मुस्लिम और आदिवासी एक हो जायें क्योंकि अब हमें अपनी सरकार बनानी है और 80 प्रतिशत बिखरे हुए वोट को एकजुट कर सत्ता हासिल करना है। नवम्बर में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की नैया पार करने की दिशा में यह लाठी रैली संजीवनी का काम कर पायेगी या नहीं यह चुनाव परिणामों से पता चलेगा। लेकिन इससे कांग्रेस में जोश तो आ ही गया है क्योंकि विपक्ष के दो बड़े चेहरों ने सत्ता के लिए गैर-भाजपाई दलों का गठबंधन बनाने का मंत्र दे दिया है।

लाठी रैली को जदयू के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोविंद यादव, महेंद्र सिंह मौर्य, राजेश कुशवाहा, सत्यशोधक समाज के सुनील सरदार और गोंगपा के गुलजार सिंह मरकाम ने भी सम्बोधित किया। इस रैली में विंध्य, बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल संभाग से बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। लाठी रैली के आयोजक सिद्धार्थ कुशवाहा ने स्पष्ट किया कि लाठी सहारे और साहस का प्रतीक है इसीलिए हमने इसे चुना है। अनेक कार्यकर्ता अपने कंधे पर लाठी भी टेके हुए थे। शरद यादव ने नसीहत दी कि दुनिया कलम और बुद्धि से चलती है लाठी से नहीं, इसलिए लाठी छोड़ कलम थामें। देखने की बात यही होगी कि यह लाठी रैली कांग्रेस को आने वाले चुनाव में कितना सहारा और साहस दे पाती है।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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