200 साल पुराने युध्द के बहाने वर्तमान को बांटने की कोशिशें

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०- उमेश त्रिवेदी

पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव युध्द की 200वीं सालगिरह पर आयोजित जश्न में पनपी हिंसा ने देश में सामाजिक-समरसता की राहों को नए जातीय तनाव की ओर मोड़ दिया है। 1 जनवरी 1818 के दिन भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने चितपावन ब्राम्हण पेशवा बाजीराव व्दितीय की सेना को हरा दिया था। भूगोल के नक्शे में भीमा-कोरेगांव पुणे और अहमदनगर के बीच स्थित है और इतिहास के पन्नों में यह दर्ज है कि इस जंग में भारी संख्य़ा में महार जाति के सैनिकों ने अंग्रेजों की ओर से पेशवा की सेना के विरुध्द हथियार उठाए थे। जीत अंग्रेजों की हुई थी और इतिहासकारों का मानना है कि दलितों ने पेशवा साम्राज्य की ब्राह्म्णवादी और दलित विरोधी नीतियों के खिलाफ अंग्रेजों की ओर से यह जंग लड़ी थी। इस परिप्रेक्ष्य में महाराष्ट्र में कई जगहों पर दलित समुदाय के लोग 1 जनवरी को पेशवा पर अंग्रेजों की जीत को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं। आयोजन को पिछड़ी जातियों की उच्च जातियों की दलित विरोधी व्यवस्था को खत्म करने के तौर पर देखा जाता है।

ऐतिहासिक तथ्यो में यह उल्लेखनीय है कि जीत के बाद अंग्रेजों ने इस गांव में विजय स्तंभ का निर्माण किया था। इस विजय-स्तंभ पर युध्द में मारे गए महार सैनिकों के नाम लिखे हैं। शौर्य स्मारक अंग्रेजों की नेक-नीयत का नहीं, बल्कि सामाजिक-विव्देष की नीतियों के विस्तार का परिचायक था। सामाजिक विव्देष की इस ऐतिहासिकता का अगला महत्वपूर्ण पन्ना यह है कि 1927 में बाबा साहब आंबेडकर ने इस विजय-स्तंभ पर कार्यक्रम को संबोधित किया था। सामाजिक परिवेश की ऐतिहासिक घटनाओं की ताजा स्याही यह कह रही है कि हिंसा से पहले 31 दिसम्बर 2017 को गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी ने गांव में बने युध्द स्मारक का दौरा किया था और उसी दिन पुणे में आयोजित यलगार-परिषद में शामिल हुए थे। इस मर्तबा पहली बार अखिल भारतीय ब्राह्मण महासंघ ने पेशवाओं की ड्योढ़ी पर दलितों के प्रदर्शन करने पर रोक लगाने की मांग की थी। महासंघ का कहना है कि इससे जातीय-भेद बढ़ेगा।

भीमा-कोरागांव युध्द की कहानी के विस्तार में यह तथ्य काफी नीचे सरक गया है कि अंग्रेजों की यह लड़ाई उसकी साम्राज्यवादी नीतियों की परिणति थी, जिसको जीतने के लिए उसने भारतीय समाज के तत्कालीन विरोधाभासों और कुरीतियों का इस्तेमाल किया था। दलितों का कहना है कि उनकी यह लड़ाई चितपावन ब्राम्हणों की क्रूर शासकीय व्यवस्था के खिलाफ प्रतिशोध की लड़ाई थी। अंग्रेजों के खिलाफ इस लड़ाई के साथ यह सवाल अन्तर्निहित है कि यदि हम 1857 की लड़ाई को आजादी की पहली लड़ाई के रूप में मान्य करते हैं, तो 1818 में अंग्रेजों के खिलाफ पेशवा के इस युद्द को स्वतंत्रता-संग्राम से अलग क्यों माना जाता है? इतिहासकार महारों और पेशवा की फौजों के इस युध्द को अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय शासकों के युध्द के रूप में मान्य करते हैं। तथ्यात्मक रूप से इस सवाल का तार्किक और सटीक उत्तर नहीं है, लेकिन कतिपय इतिहासकारों के जायज सवालों के बावजूद पिछले दो सौ साल से दलित बगैर किसी प्रतिरोध के शौर्य दिवस मनाते रहे हैं।

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भीमा कोरेगांव की इस घटना की चिंगारियों ने मुंबई सहित कई इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया है। यह आग एकाएक नहीं भड़की है। इस जश्न की तैयारियां कई दिनों से चल रही थीं। इंटेलीजेंस की रिपोट्र्स भी हवाओं में धुंए के एहसास से भरी पड़ी थीं, इसके बावजूद महाराष्ट्र में दलितों के आंदोलन का सुलग उठना मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस की नीयत पर सवाल उठाता है। एनसीपी के प्रमुख पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद पवार ने आरोप लगाया है कि प्रशासन व्दारा सावधानी नहीं बरतने के कारण यह आंदोलन भड़का है। राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों के लोगों को उत्तेजक बयानों से बचना चाहिए। जितनी राजनीतिक-सहजता शरद पवार के बयानों में झलकती है, राजनीति का माहौल उतना सहज नहीं है। विकास के पैमानों पर देश की राजनीति काफी तेजी से पिछड़ रही है। गुजरात के चुनाव परिणामों ने भाजपा को सिखा दिया है कि जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के हथियार उसके लिए कितने कारगर हैं? सांप्रदायिक तनाव और जातीय-संघर्ष के प्रायोजित आंदोलन और संघर्ष की घटनाएं 2018 और 2019 में यूं ही जारी रहेंगे, क्योंकि इस दरम्यान आठ राज्यों और लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।
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