जीत के जुनून, जज्बा और जिद के अभाव से जूझती कांग्रेस

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०- अरुण पटेल

कांग्रेस अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद राहुल गांधी ने कार्यसमिति की पहली बैठक में सूत्र वाक्य दिया कि कांग्रेस के पास सब कुछ है केवल विनिंग एट्टीट्यूट नहीं है और बस उसे इसकी ही जरूरत है। इससे लगता है राहुल ने कांग्रेसजनों की कमजोरी पकडऩे में कोई गफलत नहीं की है। गुजरात के चुनाव में भले ही कांग्रेस हार गई हो लेकिन हार में भी उसकी जीत छुपी हुई है। गुजरात के चुनाव नतीजों से कांग्रेस उत्साहित है और 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनावों में यही देखने वाली बात होगी कि क्या राहुल गांधी मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक सहित उन सब राज्यों में जहां चुनाव होने हैं कांग्रेसजनों के मन में जीत के प्रति जुनून, जज्बा और जिद पैदा कर पायेंगे, जिसका सामान्यतया अभाव देखा गया है। भाजपा की खासियत यह है कि वह हारी हुई चुनावी लड़ाई भी जीत के जज्बे के साथ लड़ती है जबकि कांग्रेसजन जीतने वाली लड़ाई की बाजी भी पराजय के मनोभाव से लड़ते हैं। दोनों पार्टियों के बीच यही मूल अन्तर है और लगता है राहुल के एजेंडे में अब यह बात सबसे ऊपर आ गई है कि कांग्रेसजनों में उन्हें जीत के प्रति एट्टीट्यूट पैदा करना है। जहां तक गुजरात चुनाव का सवाल है इसमें मध्यप्रदेश के भाजपा व कांंग्रेस के कुछ नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गयी थीं और इन चुनावों के बाद भाजपा में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा का कद और महत्व और अधिक बढ़ गया है, क्योंकि ये भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विश्वास की कसौटी पर खरे उतरे हैं। वहीं कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी को गुजरात का प्रभारी सचिव बनाने के साथ गुजरात में जो जिम्मेदारियां सौंपी गयी थीं उसमें वे भी राहुल की कसौटी पर खरे उतरे हैं।

जहां तक गुजरात चुनाव में भूमिका का सवाल है केंद्रीय पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को सह-प्रभारी बनाकर मूल रूप से सेंट्रल गुजरात और अहमदाबाद अंचल की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। इस अंचल में भाजपा को 36 सीटें मिली हैं जिसका मतलब यह है कि भाजपा की जीत का जो आंकड़ा 99 पर आकर टिक गया उसमें एक तिहाई से अधिक सीटों पर सफलता उस इलाके में मिली जहां तोमर ने दिन-रात एक किए थे। इसी प्रकार नरोत्तम मिश्रा को भी जिन क्षेत्रों में जिम्मेदारी दी गयी थी वहां भी भाजपा को अपेक्षाकृत अच्छी सफलता मिली और जिस इलाके में कांग्रेस ने जीत की अधिक उम्मीद लगा रखी थी वहीं उसे निराशा हाथ लगी। गुजरात चुनाव पूरी शिद्दत से लडऩे की राहुल गांधी ने जब योजना बनाई उस समय मध्यप्रदेश के युवा विधायक जीतू पटवारी को राष्ट्रीय सचिव बनाते हुए उन्हें प्रभारी महासचिव अशोक गहलोत का सहयोगी बनाकर गुजरात की जिम्मेदारी दी गयी थी। चुनाव के दौरान उन्हें 43 विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गयी थी और उसमें से 26 सीटों पर कांग्रेस ने सफलता हासिल की। कांग्रेस की सीटों में जो वृद्धि हुई है उनमें इन सीटों का काफी महत्व है। जीतू को जिन क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गयी थी उनमें से चार क्षेत्रों की जिम्मेदारी युवा कांग्रेस अध्यक्ष कुनाल चौधरी को मिली थी उनमें से तीन पर कांग्रेस जीती। मध्यप्रदेश की सीमा से सटे गुजरात के विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को काफी सफलता मिली। यही कारण है कि इन नतीजों ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भविष्य के प्रति सचेत कर दिया है। मंत्रिमंडल की बैठक के बाद अनौपचारिक चर्चा में शिवराज ने कहा कि हमें हर हाल में कोलारस और मुंगावली विधानसभा उपचुनाव और जिन 16 नगरीय निकाय संस्थाओं के चुनाव हो रहे हैं उनमें जीत का परचम फहराना है। भाजपा को उम्मीद है कि वह कोलारस तो जीत ही लेगी। शिवराज अपने अधिकांश मंत्रियों को दोनों क्षेत्रों में प्रचार में लगाने के बाद भी कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ में सेंध लगा पाते हैं या नहीं यह चुनाव नतीजों से ही पता चलेगा।

राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कांग्रेसजनों के बीच एक हारी हुई लड़ाई जीत में तब्दील करने का जुनून और जज्बा पैदा करना। यह काम यदि वे वास्तव में करना चाहते हैं तो यह होम्योपेथी की गोली या आयुर्वेद की पद्धति जैसा धीमी गति से नहीं हो पायेगा, इसके लिए जहां जरूरी होगा उन्हें तत्काल शल्यक्रिया करनी होगी। अब समय की कमी है इसलिए जो भी करना है वह तत्काल करना होगा। ऐसा करते समय उन्हें एक ऐसे कुशल सर्जन का किरदार निभाना होगा जिसके शल्यक्रिया करते समय अपने नजदीकी को देखकर हाथ न कांपें। जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है वहां तो कांग्रेस मैदान में डटी है और जमकर संघर्ष कर रही है एवं कार्यकर्ताओं का मनोबल भी ऊंचा है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को मैदानी संघर्ष करना होगा क्योंकि मैदान में बड़े नेताओं से लेकर मैदानी कार्यकर्ता तक सबको जमीन पर उतरना होगा। केवल सोशल मीडिया, ट्वीटर या विज्ञप्तियों के सहारे कांग्रेस का काम चलने वाला नहीं है। अभी तक देखने में यह आया है कि कई ज्वलंत मुद्दे हाथ लगे हैं लेकिन कांग्रेस उनको लेकर कोई बड़ा संघर्ष नहीं कर पाई। केवल किसानों के मुद्दों को लेकर ही उसने कुछ बड़े-बड़े प्रदर्शन किए हैं। अटेर और चित्रकूट का उपचुनाव कांग्रेस ने जीत के जुनून में लड़ा और सफलता पाई। आगे की रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस के प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया चुनावी मोड में आकर सक्रिय हो गए हैं। शनिवार से उन्होंने सिलसिला प्रारंभ कर दिया है और सोमवार तक वे मध्यप्रदेश में रहेंगे। इस दौरान वे उम्रदराज, अनुभवी व वरिष्ठ कांग्रेसजनों से भी मेल-मुलाकात करेंगे।

प्रदेश प्रभारी बनने के बाद दीपक बावरिया की कार्य करने की जो शैली है वह पुराने प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश से एकदम अलग है। बावरिया कार्यकर्ताओं की बात पूरे धैर्य से सुनते हैं जहां जरूरी होता है वहां नसीहत भी देते हैं लेकिन सबको अपनी बात कहने का मौका देते हैं। मोहन प्रकाश इसके विपरीत कार्यकर्ताओं को डांटते-फटकारते अधिक थे और उनकी बातें कम सुनते थे। यह सर्वविदित है कि प्रदेश में कांग्रेस गुटबंदी के दलदल में गहरे तक धंसी है और मोहन प्रकाश स्वयं ऐसा व्यवहार करतेे थे जैसे वे मानों एक गुट विशेष के संरक्षक ही न हों बल्कि उसके लिए ढाल बनने की कोशिश भी करते थे। प्रभारी का दायित्व यह होना चाहिए कि वह सबको साथ लेकर चले और सबकी बात सुने। कार्यकर्ता को यह संतोष रहता है कि वह कम से कम अपनी बात नेता तक पहुंचा तो सका, जिसका अवसर उसे लम्बे समय बाद बावरिया के आने से मिला है। बावरिया के सामने पहली चुनौती यही है कि वे जल्द से जल्द तय करायें कि मिशन 2018 में कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और अरुण यादव की क्या भूमिका रहेगी। लम्बे समय से कांग्रेस की राजनीति में चर्चित रहे चेहरों के अलावा एक और चेहरा जो तेजी से उभर रहा है वह जीतू पटवारी का है। उन्होंने गुजरात में जो कर दिखाया उसके बाद उनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। युवा नेता के रूप में युवा कांग्रेस अध्यक्ष कुनाल चौधरी ने भी युवाओं के बीच अपनी पहचान बनाई है और विभिन्न समस्याओं को लेकर न केवल यात्राएं कीं बल्कि बड़े-बड़े सम्मेलन भी आयोजित किए। राहुल गांधी की नजर जिन कुछ अन्य युवा नेताओं पर है उनमें विधायक कमलेश्वर पटेल भी हैं जिन्हें अपनी टीम में शामिल कर राहुल ने छत्तीसगढ़ का सह-प्रभारी बनाया है। चुनावी मोड में आते हुए बावरिया तीन दिन तक अब वरिष्ठ अनुभवी नेताओं से जीत का मंत्र पूछेंगे और आगे की रणनीति बनायेंगे। इसमें वे सभी पूर्व सांसदों, पूर्व विधायकों, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व और वर्तमान पदाधिकारियों तथा जिलाध्यक्षों से भी उनके सुझाव जानेंगे और मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए क्या किया जाये, इस पर सुझाव लेंगे। इसका मकसद यह है कि जो कांग्रेसजन अपने आपको अभी तक उपेक्षित महसूस कर रहे थे उनकी पूछपरख कर उन्हें सक्रिय किया जाये और यह शिकायत दूर की जाए कि पार्टी में अब उन्हें कोई पूछता ही नहीं। बावरिया से इसलिए अधिक उम्मीदें हैं क्योंकि वे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के काफी नजदीक होने के कारण सब नेताओं को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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