आखिर कब तक न्यायालय से भागते रहेंगे लालसिंह आर्य

0
289

०- अरुण पटेल
प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में लाख टके का यह सवाल उत्तर की तलाश में है कि आखिरकार कब तक सामान्य प्रशासन राज्यमंत्री लालसिंह आर्य भिण्ड के विशेष न्यायाधीश द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट के चलते न्यायालय से भागते रहेंगे और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कब नैतिक साहस दिखाते हुए उनसे त्यागपत्र लेंगे। लालसिंह आर्य के इस्तीफे की मांग को लेकर चौतरफा दबाव बढ़ रहा है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान पूरी तरह से आर्य के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। यहां तक कि वे आर्य के इस्तीफा न देने पर इस सीमा तक अड़े हैं कि न्यायालय को चुनौती देने से भी नहीं हिचकिचा रहे। भाजपा का एक धड़ा भी अंदर ही अंदर लालसिंह के इस्तीफे का दबाव बना रहा है जिसका तर्क यह है कि जब तत्कालीन मंत्री अनूप मिश्रा से एफआईआर होते ही शिवराज ने इस्तीफा मांग लिया था तब फिर वे लालसिंह से इस्तीफा लेने में क्यों हिचक रहे हैं।

भाजपा पर ऐसे मामलों में दोहरा मापदंड अपनाने का भी खुले तौर पर विपक्षी दल और अंदरखाने भाजपाई भी उंगली उठा रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष का आर्य से त्यागपत्र लेने में हिचक का एक कारण शायद यह है कि मुंगावली और कोलारस में उपचुनाव होना है और वहां दलित मतदाताओं की संख्या काफी है। शायद वे नहीं चाहते कि भाजपा पर दलित विरोधी होने का एक और आरोप लग जाये। मुंगावली में एक दलित प्राचार्य पर इसलिए कार्रवाई की गई थी कि उन्होंने कॉलेज के कार्यक्रम में क्षेत्रीय सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को बुला लिया था। इसके बाद सिंधिया ने एक बड़ा दलित सम्मेलन आयोजित कर भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया था। यह बात भी कही जा रही है कि जब भाजपा ने तिरंगा झंडा फहराने को लेकर एक मामले में समन जारी होने पर अपनी उस समय की एक शक्तिशाली जननेता जिसने 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को चमकदार जीत दिलाई थी, उन उमा भारती से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा ले लिया था तब यहां तो गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद इस्तीफा क्यों नहीं लिया जा रहा है। अनूप मिश्रा के मामले का भी उदाहरण दिया जा रहा है जो शिवराज सरकार में वरिष्ठ काबीना मंत्री थे। ग्वालियर में एक कॉलेज की जमीन को लेकर जब गोली चली थी और जिस दिन की यह घटना थी उस समय अनूप मिश्रा उज्जैन में एक बैठक ले रहे थे, लेकिन एफआईआर में उनका नाम आने पर इस्तीफा लिया गया था। हालांकि उस समय भी यह स्पष्ट था कि अनूप का नाम ग्वालियर जिले की अंदरूनी भाजपाई राजनीति के चलते जोड़ा गया था। अनूप मिश्रा एक शक्तिशाली राजनेता हैं, भाजपा में उन्होंने अपना कद बनाया था और दूसरे पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के भान्जे होते हुए भी उनसे इस्तीफा ले लिया गया था फिर आखिर लालसिंह आर्य के मामले में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान मुख्यमंत्री पर यह दबाव क्यों बना रहे हैं कि लालसिंह आर्य से इस्तीफा न लिया जाये।

जहां तक विपक्ष का सवाल है नेता प्रतिपक्ष अजय सिह ने गिरफ्तारी वारंट जारी होने के पूर्व ही जमानती वारंट को लेकर आर्य के इस्तीफे के लिए दबाव बनाना चालू कर दिया था। उन्होंने 30 नवम्बर को कांग्रेस विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ राज्यपाल ओ.पी. कोहली के नाम एक ज्ञापन उनके प्रमुख सचिव को सौंपते हुए आर्य को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग की थी। ज्ञापन में कहा गया था कि ग्वालियर उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अग्रिम जमानत देने की लालसिंह आर्य की याचिका खारिज कर दी जिससे स्पष्ट होता है कि उन्हें अदालत से जाटव हत्याकांड में कोई राहत नहीं मिली और वे एक फरार अभियोगी हैं इसलिए उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाए। ज्ञापन में उमा भारती और अनूप मिश्रा के इस्तीफों का भी उल्लेख किया गया था। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान जमानती वारंट जारी होने के बाद से ही आर्य के इस्तीफा न देने की बात कहते रहे हैं और गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद तो वे लगभग न्यायालय को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वारंट से क्या होता है अग्रिम जमानत का प्रावधान है, इसका मतलब यह है कि जमानत के लिए प्रयत्न करें और सामने न आयें। सवाल यह है कि कोई मंत्री पद पर रहते हुए भूमिगत कैसे रह सकता है जब तक कि प्रशासन और पुलिस ऐसा न चाहे। क्योंकि मंत्री का लोकेशन तो उसके साथ सुरक्षाकर्मी होने के कारण पता लगाना मुश्किल नहीं होता, बशर्ते कि राजधानी में मौजूद आला पुलिस अधिकारी इस काम को केवल भिण्ड पुलिस का मानकर अनदेखी न करें। ऐसे में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की सलाह कितनी नैतिक और कितनी कानूनी है इस पर ही स्वयं उन्होंने एक सवालिया निशान लगा दिया है। भाजपा अध्यक्ष के तर्क पर तंज कसते हुए नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा है कि आरोपी को बचाने के लिए नंदू भैया कानून की नई-नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं। राज्य में कानून क्या आम आदमी और मंत्री के लिए अलग-अलग है। पूर्व महाधिवक्ता और कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा का कहना है कि चौहान को कानून का ज्ञान नहीं है, होता तो वे ऐसा बयान ही नहीं देते। आरोपी की जमानत न होने तक तो वारंट लीगल होता है और उसका पालन तो करना ही होगा। अजय सिंह ने जो अलग-अलग कानून होने की बात कही है वैसी ही बात सुश्री उमा भारती तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के सामने खुलेआम कह चुकी हैं। उन्होंने यहां तक कहा था कि भाजपा में सांडों के लिए अलग और गायों के लिए अलग कानून होता है। यह बात उमा ने अपने स्वयं और इशारों ही इशारों में अरुण जेटली पर निशाना साधते हुए कही थी। इसके बाद उमा भारती को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।

लालसिंह का कहना है कि न वे फरार हैं, न प्रेशर बना रहे हैं केवल कानूनी जानकारों से सलाह ले रहे हैं, उसके बाद न्यायालय जायेंगे। कानून का पालन करना मेरे खून में है, न मैंने किसी पर दबाव डाला न मैं फरार चल रहा हूं। कांग्रेस द्वारा इस्तीफे की मांग पर उन्होंने दलित कार्ड को अपने सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करते हुए कहा कि कांग्रेस को एक बढ़ता हुआ दलित अच्छा नहीं लगता, इसके लिए उन्हें भगवान भी माफ नहीं करेगा। भिण्ड के विशेष न्यायाधीश योगेश कुमार गुप्ता की अदालत ने 5 दिसम्बर को गिरफ्तारी वारंट जारी करते हुए आदेश दिया था कि इसकी तामील स्वयं एसपी करायें या एसडीओ-पी स्तर के अधिकारी से करायें। एसडीओ-पी प्रवीण अस्थाना को वारंट तामील कराने की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने कहा है कि जब आर्य गोहद या ग्वालियर आयेंगे तब वारंट की तामील करायेंगे। आश्?चर्यजनक बात यह है कि गैर-जमानती वारंट जारी होने के बाद अगले दिन आर्य सचिवालय पहुंचे, कुछ अधिकारियों से मुलाकात की। इस प्रकार घूमने पर नंदू भैया से सवाल पूछा गया तो उनका कहना था कि वे मेरी पार्टी की सरकार के मंत्री हैं और किसी के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत होने से कोई अपराधी नहीं कहलाता, जब तक कि सजा न मिले। उनका कहना था कि सीबीआई यूपीए के शासनकाल में ही उन्हें क्लीनचिट दे चुकी है तो हमारी नजर में आर्य निर्दोष हैं। सत्ताधारी दल के अध्यक्ष के इस तर्क पर क्या कहा जाए, यदि उनकी नजर में पुलिस या सीबीआई किसी को क्लीनचिट दे देती है और वह निर्दोष मान लिया जाए तो फिर अदालतों की क्या जरूरत। कुल मिलाकर देखने की बात यही होगी कि लालसिंह आर्य पर ऐसे में हाथ कौन डालेगा जबकि वे सचिवालय में जाकर पुलिस महानिदेशक ॠषिकुमार शुक्ला और सीएम के ओएसडी तथा एडीजी आदर्श कटियार के साथ चुपचाप चर्चा भी करते हों।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
०००००००००

LEAVE A REPLY