नेता और रोबोट-नेता के मायने: एक ओर कुंआ, दूसरी ओर खाई

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०- उमेश त्रिवेदी
गुजरात विधानसभा चुनाव के दरम्यान जारी असहनीय जुमलेबाजी और लफ्फाजियों के बीच हिन्दुस्तान के लोग क्या इस खबर से सुकून महसूस करेंगे कि न्यूजीलैंड में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा रोबोट नेता विकसित कर लिया है, जो सक्रिय राजनीति में हिस्सेदारी करते हुए चुनाव लडऩे में सक्षम है? राजनीति में ‘आर्टीफीशियल-इंटेलीजैंस’ से लैस इस रोबोट नेता का आगमन सियासत में पारदर्शिता लाने की गरज से हुआ है। यह न्यूजीलैंड में 2020 में होने वाला चुनाव लडऩे की तैयारी में है। रोबोट नेता का नाम ‘सैम’ है और इसे निक गेरिट्सन नाम के उद्यमी ने विकसित किया है। फिलवक्त रोबोट के चुनाव लडऩे की परिकल्पना मशीनों में कैद है, क्योंकि अभी यह कानूनी रूप से संभव नहीं है। वैसे कोई एक महीने पहले सऊदी अरब में एक महिला रोबोट सैफिया को नागरिकता मिल चुकी है और सऊदी अरब में इस रोबोट-महिला को सामान्य महिलाओं से ज्यादा अधिकार हासिल हैं।

रोबोट नेता ‘सैम’ का यह तकनीकी परिचय है। राजनीति में रोबोट और रोबोट की राजनीति का यह काल्पनिक-परिदृश्य कई मायनों में दिलचस्प होगा। जैसे रोबोट नेता ‘सैम’ ने आवास, शिक्षा, आव्रजन नीतियों के अलावा स्थानीय मुद्दों से जुड़े सवालों के सटीक जवाब देने का सामथ्र्य हासिल कर लिया है, लेकिन यह साफ नहीं है कि राजनीति के दायरे मनुष्यता के जिन आयामों को समेटते हुए आगे बढ़ते हैं, उनसे जुड़े पहलुओं पर रोबोट-नेता कैसे गौर करेंगे? मानवीय करुणा और क्रोध की पेचीदा राजनीतिक धुरियों को कैसे एड्रेस करेंगे? भारत के संदर्भों में सोचे तो रोबोट हिन्दू-मुसलमानों के मसलों पर क्या और कैसे सोचेंगे? जातीय राजनीति में लालूप्रसाद यादव या मुलायम सिंह की चालों के जवाब कैसे देंगे? या उप्र के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की नियुक्ति में हिन्दुत्व का इंडेक्स कैसे नापेंगे? योगी आदित्यनाथ,लालू प्रसाद यादव या मुलायम सिंह से जुड़े सवाल प्रहसन करने के गरज से नहीं उठाए गए हैं। सवाल यह है कि मनुष्यता के कल्याण पर केन्द्रित राजनीति को यांत्रिक तरीके से संचालित करना क्या मुमकिन है? सामाजिक जीवन में राजनीति की महत्ता कमतर आंकना मुनासिब नहीं है। राजनीति समाज की दशा निर्धारित करती है और समाज राजनीति की दिशा निर्धारित करता है। दुनिया में गुरबत, गरीबी और गैर-बराबरी से जुड़े सवालों के समाधान राजनीति के जरिए ही सामने आते रहे हैं। यह सोचना जरा मुश्किल है कि राजनीति में रोबोट-नेता की एन्ट्री सार्वजनिक-जीवन के मशीनीकरण की नई आवधारणा को स्थापित करने की कोशिशों का सिलसिला मानवीय सभ्यता को किस छोर पर ले जाकर स्थापित करेगा?

दुनिया के वैज्ञानिक आर्टीफीशियल-इंटेलीजैंस के खतरों से बखूबी वाकिफ हैं। टर्मिनेटर, 2001: ए स्पेस ऑडिसी, मेट्रिक्स जैसी हॉलीवुड फिल्मों में आर्टीफीशियल-इंटेलीजैंस के आधार पर बने रोबोटों के खतरों को भलीभांति टटोला और प्रदर्शित किया गया है। फिल्मों में इन रोबोट का आर्टीफीशियल इंटेलीजैंस यानी मशीनी सोच इतना विकसित हो जाता है कि वो प्यार-रोमांस और खूबसूरती के पैमानों पर भावनात्मक रूप से उव्देलित करने फैसले लेने लगते हैं। लेकिन यह फिल्मी-ड्रामा अब वैज्ञानिक-खोजों में भी सामने आने लगा है। फिल्मों की दुनिया से अलग फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियो में आर्टीफीशियल-इंटेलीजैंस के खतरों को लेकर पक्ष-विपक्ष में जबरदस्त बहस जारी है। कई लोग इन मशीनों के खिलाफ खड़े होने लगे हैं। रोबोट राजनेता की खोज के संदर्भ में यह खबर गौरतबल है कि फेसबुक ने आर्टीफीशियल-इंटेलीजैंस के अनुसंधानों के कामों को बंद करने का फैसला कर लिया है। कारण यह बताया गया है कि इस रोबोट ने अंग्रेजी से अलग खुद अपनी एक भाषा का विकास कर लिया था, जिसके जरिए वो आपस में संदेशों का आदान-प्रदान करने लगे थे। रोबोट गढ़े गए कोड से अलग काम करने लगे था। दिलचस्प यह है कि रोबोटों ने सौदेबाजी की कला को भी विकसित कर लिया था। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों को सोचना होगा कि जो रोबोट बिजनेस की सौदेबाजी की कला विकसित कर सकते हैं, यदि वो राजनेताओं के छल-प्रपंचों की दुनिया में धमाल मचाने लगे तो क्या होगा? तानाशाह शासकों की तो एक उमर होती है, लेकिन तानाशाह रोबोट-नेताओं की उमर को कैसे फिक्स किया जाएगा? खतरे अनगिनत है, एक ओर कुंआ है, तो दूसरी ओर खाई है…।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।
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