चारों अंग मिलकर सपना साकार करें

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०-जयकृष्ण गौड़

26 नवम्बर का दिन इसलिए महत्व का है कि इसी दिन 68 वर्ष पूर्व संविधान की रचना पूरी हुई थी, यह भी सब जानते हैं संविधान की ड्राफ्ट समिति के प्रमुख बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर की पहचान संविधान निर्माता के नाते होती है। संविधान दिवस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि संविधान के तीनों अंग कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका समान है, इनके बीच नाजुक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है। इनकी स्वायतता का संरक्षण होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस अवसर पर कहा कि तीनों अंग को मिलकर न्यू इंडिया के सपने को साकार करना है। इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का कहना है कि मूल अधिकारों को लेकर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। ये मूलभूत अधिकार संविधान के बुनियादी मूल्य है। संविधान के मूल अधिकारों और मूल्यों के संरक्षण के सवाल पर अक्सर चर्चा होती है, यह भी सच्चाई है कि इन तीनों अंगों के बीच अपने अधिकारों को लेकर खींचतान भी होती है, कार्यपालिका और विधायिका न्यायालय के निर्णय पर यह भी टिप्पणी करती है कि यह हमारे अधिकारों को प्रभावित करने वाले निर्णय है, जबकि न्यायपालिका का मानना है कि यदि किसी निर्णय में मूल अधिकार प्रभावित होते हैं तो उसे संरक्षण प्रदान करना होता है।

न्यायालय के निर्णयों को क्रियान्वित कार्यपालिका करती है। कानून बनाने का अधिकार विधायिका को है। संविधान बनाने का अधिखार विधायिका को है। संविधान की भावना के अनुसार व्यवस्था का संचालन हो और तीनों अंग मिलकर महान भारत के सपने को पूरा करने में अपना योगदान दे। यही दृष्टि तीनों अंगों की रही तो फिर अधिकारों को लेकर कोई कठिनाई नहीं होगी। इस संदर्भ में ताजा संदर्भ है, तीन तलाक का मामला। भारत की करीब दस करोड़ मुस्लिम महिलाओं पर तीन तलाक की तलवार लटकती रहती है, कई का जीवन तीन तलाक बर्बाद कर चुका है। मुल्ला मौलवी इस अत्याचारी रिवाज को इस्लामी उसूल बताते रहे हैं, संविधान पीठ ने बहुमत के निर्णय से इसे असंवैधानिक करार दिया। अब विधायिका कानून बनाकर कार्यपालिका द्वारा तीन तलाक को दंडनीय अपराध के नाते रोकने की कार्यवाही सुनिश्चित करना है।

संविधान की प्रस्तावना ने में कहा गया है कि सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्य्िकत, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता-अखंडता सुनिश्चित करने, बंधुता बढ़ाने के लिए। यह संविधान का आदर्श दिशा निर्देश है। लेकिन राष्ट्र की एकता-अखंडता को चुनौती देने वाले तत्व भी देश में है। 26 नवम्बर का दिन हम संविधान दिवस के नाते मनाते हैं, इसी दिन अर्थात् 26/11 को मुंबई में आतंकी हमला हुआ और कई निर्दोष लोग मारे गए। 13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हमला हुआ। सुरक्षा कर्मियों की साहसिक कार्यवाही और बलिदान से राष्ट्रीय नेतृत्व की सुरक्षा हो सकती। जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर हमला, कालूचक कैटोमेंट में सैन्य परिवारों के तीस लोगों की सामूहिक हत्या, अमरनाथ यांत्रियों पर हमला, अक्षरधाम मंदिर में घुसकर 29 श्रद्धालुओं की हत्या। यह खूनी घटनाक्रम कमोवेश अब भी चल रहा है। सवाल लाशे गिनने का नहीं है, महत्व का सवाल यह है कि आतंकवाद के कारण नागरिकों का जीवन ही सुरक्षित नहीं तो फिर उनके संवैधानिक अधिकार का सवाल नहीं हो सकता। आतंकियों के संरक्षण प्रदान करते हैं, वे भी मानव जीवन के लिए खतरा पैदा करने में सहयोग देते हैं।

संविधान में समानता ही बात मूल पाठ में है, फिर जम्मू-कश्मीर के लिए अलग व्यवस्था और अधिकार क्यों? अस्थाई अनुच्छेद 370 क्या समानता के अधिकार पर अतिक्रमण नहीं है? 35(ए) को आपातकाल में लागू किया गया। देश की एकता-अखंडता को प्रभावित करने वाले प्रावधान को क्यों नहीं हटाए जाते। सुप्रीम कोर्ट इस बारे में कोई स्पष्ट फैसला क्यों नहीं कर सकता? मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का कथन है कि उम्मीद की जाती है कि सरकारी संस्थाएं मौलिक अधिकार में अतिक्रमण नहीं करेगी। पर जब अतिक्रमण होता है तो लोगों के साथ खड़े न्यायपालिका का दायित्व है। इस कथन से पैदा हुआ सवाल यह है कि जब राजीव गांधी सरकार के समय शाहबानों मामले में न्यायालय ने शाहबानों के समर्थन में निर्णय दिया, तो राजीव सरकार ने विधेयक लाकर उस निर्णय को ही बदल दिया? इस सवाल का उत्तर संवैधानिक व्यवस्था से भी नहीं मिल सकता है कि समानता के अधिकार क्या धर्म के अनुसार अलग-अलग कानून से प्रभावित नहीं होते? मुस्लिमों के लिए अलग पर्सनल कानून है, हिन्दू, ईसाईयों के लिए अलग कानून है, फिर कानून के सामने सब एक है, यह केवल औपचारिक विचार है?

संविधान के अनुसार ही 25-26 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए आपातकाल लागू कर दिया। इंदिराजी ने 25-26 जून की आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली एहमद से आपातकाल की अधिसूचना पर हस्ताक्षर करा लिए, न केवल संविधान के प्रावधान के अनुरूप लोकतंत्र का गला घोटा गया, बल्कि महामहिम राष्ट्रपति जो संविधान का ट्रस्टी होता है, उसने भी आँख मीचकर लोकतंत्र की आत्मा को लहूलुहान करने वाली अधिसूचना पर हस्ताक्षर कर दिए। उस समय न्यायपालिका को कार्यपालिका ने बंधक बना लिया था, विधायिका का बहुमत भी इंदिराजी की तानाशाही का समर्थन हो गया। तीनों अंग और महामहिम ने मिलकर तानाशाही की इबारत लिखी। जर्मन के हिटलर ने भी संविधान के अन्तर्गत ही अपनी महत्वकांक्षा के अनुरूप तानाशाही लागू की थी। न्यायपालिका द्वारा लोगों के साथ खड़े होने की बात होती है तो फिर लोगों की भावना के साथ जुड़े मामलों पर निर्णय देने में न्यायालय को वर्षों क्यों लग जाते हैं। देरी से न्याय मिलने से न्याय की प्रासंगिकता की समाप्त हो जाती है। रामजन्म भूमि पर मामला भारत के सौ करोड़ हिन्दुओं की भावना से जुड़ा मामला है, चार दशक बाद भी इस पर निर्णय नहीं हुआ। ऐसा क्यों है? इसका चिंतन न्यायपालिका को करना है। भारत में विविधता है, लेकिन विविधता आपस में दीवार नहीं खड़ी कर दे? इसका ध्यान तीनों अंगों को रखना चाहिए।

चाहे कोई महामहिम के पद पर हो या किसी के पास कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के अधिकार हो, ये संवैधानिक व्यवस्थाएं भारत के लिए है, इसलिए व्यवस्थाओं की दृष्टि में राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का दायित्व संवैधानिक स्तम्भों का अधिक है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न्यू इंडिया के लक्ष्य को पूरा करने की बात कही है। इसके लिए एक समान दृष्टि चाहिए। सपने साकार संकल्प और समर्पित भावना से होते हैं। वर्तमान में ऐसा चौथा स्तम्भ भी है, जिसकी स्पष्ट चर्चा संविधान में नहीं है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की चर्चा है। मीडिया राष्ट्रीय जीवन का प्रभावी और शक्तिशाली अंग है, राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में मीडिया को भी अपने दायित्व का निर्वाह करना होगा। इस बारे में भी ध्यान देना होगा कि मीडिया में मूल्यों से भटकाव की स्थिति नहीं बने। बुराईयों को दूर करने में मीडिया की भूमिका का महत्व अधिक है, लेकिन जिन बुराईयों से लोग त्रस्त है, उनको रोकने की बजाय उनको आगे बढ़ाने में मीडिया को भी माध्यम बनाया जाता है। राजनीति में जातिवाद, वंशवाद की विकृति के फैलाव की चर्चा मीडिया में अधिक होती है। राजनीति के भटकाव को रोकने का दायित्व नेतृत्व और जनता का है।
०-लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक है।
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