भावांतर योजना- बाजार और सत्ता का मिला जुला खेल

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०-रघुठाकुर

म.प्र. के मुख्यमंत्री जी ने अपने स्वभाव व तरीके के अनुकूल खरीफ 2017 की फसलो के लिये भावांतर योजना लागू करने की घोषणा बगैर किसी गहरे विचार विमर्ष और तैयारी के कर दी। लम्बे समय से मुख्यमंत्री रहने की वजह से उनका पार्टी और सरकार में लगभग एकाधिकार जैसा हो गया है तथा उनकी राय के विपरीत कोई भी राय व्यक्त करने का साहस अमूमन कोई नही करता, क्योंकि उसे अपने पद या नौकरी जाने का खतरा होता है। कुछ पुराने लोग मंत्रीमंडल में थे जो कभी-कभी अपनी राय को भले ही वह मुख्यमंत्री के अनुकूल न हो व्यक्त करते थे परन्तु अब वो उस स्थिति में नही है।

पिछले दिनो भारत सरकार ने यह लक्ष्य तय किया था कि किसानो की आय को दो गुना किया जाये। हांलाकि सरकार के कृषि मंत्रालय ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये कोई कार्यक्रम नही दिया था। म.प्र. के मुख्यमंत्री जी में जो भी कमियॉ हो परन्तु वे दिल्ली का साथ साधने में सिद्वहस्त है और दिल्ली सरकार की जवान से निकले हुये शब्द को पकड़कर आगे प्रचारित करने में भी सिद्व हस्त है। दिल्ली में बैठे उनके दल के आलाकमान के लोग भी ऐसी चाटूकारिता से प्रसन्न रहते है, और भाजपा की राज्य और केन्द्र की सरकारे और पार्टी लगभग एक प्रकार से व्यक्ति केन्द्रित पार्टी बन गई है।

केन्द्र की मंशा के अनुरुप प्रदेश के मुख्यमंत्री ने किसानो की आय को दो गुना करने का लक्ष्य तय कर दिया और प्रचार माध्यम से उसका प्रचार भी शुरु हो गया। भावांतर योजना भी शायद इसी की एक कड़ी है। किसानो को खरीफ की फसलों का सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य मिल सके इसके नाम पर यह योजना तैयार की गई। हांलाकि कृषि उत्पादन के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य की पद्वति ही गलत है। कृषि भी अन्य उद्योग की तरह एक उद्योग है और अन्य उद्योगो को सरकारो ने अपने उत्पादन के दाम तय करने और बाजार में बेचने की छूट दी है, केवल वह किसान ही दु:खी इंसान है जो अपने उत्पादन के दाम तय नही करता। वह इसलिये भी नही कर पाता कि उसके पास बाजार नही है और अंतत: उसे अपने माल को बेचने के लिये बाजार और सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है। होना तो यह चाहिये था कि, सरकार, कृषि उपज के लाभप्रद मूल्य तय करती और डा. लोहिया की कल्पना के अनुसार फसल का लागत खर्च निकाल कर लागत से 50 प्रतिशत अधिक दाम तय करती। फिलहाल जो (एम.एस.पी) न्यूनतम समर्थन मूल्य की पद्वति लागू है वह अतार्किक और किसान विरोधी है। अगर सरकार ने बाजार की मंहगाई वृद्वि दर के अनुपात में ही कृषि फसलो के दाम बढ़ाये होते तब भी किसान को थोड़ी बहुत राहत होती परन्तु फिलहाल उसे एम.एस.पी की पद्वति भिखारी के कटोरे में डाली जाने वाली भीख जैसी है।

दूसरी तरफ फसलो के खरीदने और बेचने के बीच जो उतार चढ़ाव है वह लूट और भ्रष्टाचार की बड़ी कहानी है। अभी कुछ दिनो पहले म.प्र. में किसानो को अपनी प्याज को सड़को पर फैकना पड़ा। आरंम्भ में दो रुपये किलो के भाव से किसानो की प्याज लेना व्यापारियो ने शुरु किया जब लाचार होकर किसान ने प्याज फैकना शुरु किया तब दाम बढ़ाकर छ: रुपये हुये और फिर सरकार ने आठ रुपये किलो खरीदने की खुद घोषणा की। इस घोषणा के होने तक काफी पानी बह चुका था। फिर सरकार ने अचानक यह घोषणा की थी तथा खरीदी जाने वाली प्याज के सुरक्षित संग्रहण की कोई व्यवस्था नही थी इसलिये सरकार की खरीदी हुयी प्याज बड़ी मात्रा में सड़ गई। खुद सरकारी सूचना के अनूसार लगभग 60 करोड़ रुपये की प्याज इस प्रकार नष्ट हो गई। फसलो के उतार-चढ़ाव को लेकर डां. लोहिया ने एक वैज्ञानिक सिद्वांत बताया था कि दो फसलो की बीच का उतार-चढ़ाव 6 प्रतिशत से अधिक नही होना चाहिये। इसे भी सरकार ने नही माना और अब हालत यह है कि, जो प्याज तीन से छ: या आठ रुपये की दर से खरीदी गई थी, वह दिल्ली के बाजार में 50 से 60 रुपये किलो तक बिक रही है इतना ही नही पहले प्याज सड़ रही थी और अब सरकार प्याज आयात करने की तैयारी कर रही है।

भांवातर योजना के नाम पर सरकार ने एक तरफ किसानो को संतुष्ट करने का और दूसरी तरफ अपने वोट के आधार व्यापारी वर्ग को फायदा पहॅुचाकर खुश करने का खेल खेला। भांवातर योजना के नाम पर सरकार ने कहा कि खरीफ की फसलो के एम.एस.पी से कम कीमत पर अगर व्यापारी खरीद करता है तो बकाया राशि का भुगतान सरकार अदा करेगी। प्रश्न यह है कि जब न्यूनतम समर्थन मूल्य स्वत: सरकार ने तय किया है तो व्यापारी को उससे कम पर खरीद करने की छूट क्यों हो? यह तो एक प्रकार से जनता के खजाने को लुटाकर बाजार का पेट भरने का खेल है। हालंाकि व्यापारी वर्ग की मुनाफा कमाने की असीम भूख इससे पूरी नही हुई और उन्होंने र्निधारित मूल्य दर से काफी कम पर खरीदना शुरु कर दिया। तब सरकार ने एक नया नियम बनाने का सिलसिला शुरु किया कि किसानो को अपनी फसलों का पंजीयन कराना होगा, तभी इस योजना का लाभ मिलेगा। बहुत सारे किसान मजदूर किसान है जो किराये पर जमीन लेकर खेती करते है। इनका तो पंजीयन संभव ही नही है। और लाखो की संख्या में ऐसे लोग जो भूमि हीन और मजदूर खेती करने वाले थे अपने आप इस योजना से बाहर हो गये। जब सरकार को ज्यादा आर्थिक बोझ बढ़ता महसूस हुआ तो सरकार ने किसानो की जमीन और फसल बोने की जांच का निर्देश दे दिया। जैसा कि प्याज की खरीदने के समय दिया गया था और अब किसानो को उन पटवारियों के हवाले कर दिया गया जो नाम के पटवारी है परन्तु वास्तव में करोड़पति जैसे है। फिर सरकार ने यह घोषणा की कि अगर किसानो को व्यापारी से तत्काल पैसा नही मिलता है तो कलेक्टर उन्हे दस हजार रुपये दे। फल स्वरुप व्यापारी ने किसानो को दाम देने के लिये और लम्बी-लम्बी पेशिया देना शुरु कर दिया। अब हालात यह है कि किसान मंड़ी में माल लेकर जाता है व्यापारी अपनी मर्जी के दाम लगाता है उसे थोड़ी बहुत रकम देता है और बकाया के लिये पर्ची पकड़ाता है यदि किसान व्यापारी के द्वारा निर्धारित मूल्य पर जो समर्थन मूल्य से काफी कम है बेचकर तत्काल पैसा चाहे तो व्यापारी उसे भी देने को तैयार नही है और अगर किसान कुछ ज्यादा देने का आग्रह करता है तो व्यापारी बोली बोलना बंद कर देते है, और मंड़ी छोड़कर चले जाते है। कृषि उपज मंडियो की भूमिका लगभग नगण्य हो गई है क्योंकि जब सारी चीजे सीधे मुख्यमंत्री और सरकार तय कर रही है तो मंड़ी के अधिकारियो की क्या विसात है? 13 नवम्बर को में ग्वालियर में था और मुझे धरने पर आकर किसानो ने बताया कि हमने उनके द्वारा ही तय किये गये मूल्य की राशि मॉगी तो व्यापारी मंड़ी छोड़कर चले गये। एक बार किसान गॉव से मंड़ी में माल लाने के बाद उसे वापिस तो नही ले जा सकता और तब किसानो ने इसको लेकर धरना प्रदर्शन किया तो पुलिस प्रशासन ने उनके साथ अभ्रद व्यवहार, झूमा-झटकी और मारपीट भी की। ऐसी घटनाये समूचे प्रदेश में घट रही है अभी और बढ़ेगी, क्योकि किसानो की बैचेनी बढ रही है और व्यापारी का लालच। सरकार की अदूरदर्शिता से इसे और हवा मिल रही है। आखिर सरकार से पूछा जाना चाहिये कि बाजार का यह स्वीकृत सिंद्वात है कि खरीददार पैसा देता है। अगर कल किसान उन्ही व्यापारियो के यहॉ से कृषि उपज खरीदे तो क्या सरकार यह भावांतर योजना व्यापारी पर लागू करेगी। परन्तु वहॉ उल्टा होगा। अगर किसान अपने मन से दाम तय करने लगे तो यही तंत्र उसे लूट और डकैती की धाराओं में उसे गिरफ्तार करेगा। कुल मिलाकर भांवातर योजना एक ऐसी भवर स्वत: सरकार ने तैयार की है कि जिसमें उसी को डूबना होगा। यह भी चर्चा है कि सरकार और व्यापारियो के बीच आगामी चुनाव में वोट और नोट का समझौता हो चुका है और इस समझौते की संतान भांवातर योजना है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य एक प्रकार से किसान को मिलने वाले न्यूनतम मूल्य की गारंटी थी और सरकार उसे यह मूल्य दिलाने की एजेन्सी। एम.एस.पी नही देना अपराध था परन्तु इस योजना के बाद एम.एस.पी का सिद्वान्त व उसकी पृष्ट भूमि ही समाप्त हो गई है और सरकार ने कम मूल्य देने के अपराध से बाजार से मुक्त कर दिया है।
०-लेखक वरिष्ठ राजनेता और समाजवादी चिंतक है।
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