पगला रहे है विकास को पागल कहने वालेपगला रहे है विकास को पागल कहने वाले

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०- जयकृष्ण गौड़

चुनाव न केवल किसी दल या प्रत्याशी की जीत हार का निर्णय करता है बल्कि यह ऐसी प्रयोगशाला है, जिससे लोकतंत्र की दिशा और नेतृत्व की दृष्टि (विजन) का जायता लिया जा सकता है। जिस तरह मनुष्य और राष्ट्र की आत्म होती है उसी तरह लोकतंत्र की भी आत्मा होती है। लोकतंत्र का यदि मूल्यों से सरोकार नहीं रहा तो फिर लोकतंत्र किसी कि कठपुतली भी हो सकता है। इतिहास के पृष्ठ बताते  है कि जर्मन के हिटलर ने लोकतंत्र और संविधान को अपने कब्जे में लेकर तानाशाही स्थापित की, हम उसे तानाशाह के नाते ही जानते है। इसी तरह इंदिराजी ने भी अपने सत्ता मोह के कारण लोकतंत्र की आत्मा को मारकर तानाशाही स्थापित की थी। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र के मंथन से केवल अमृत ही निकलेगा, हलाहल भी निकलता है। भारत का डीएनए सदियों से सहिष्णु, सबको आत्मीय मानने का रहा है, इसलिए उसकी सहन शक्ति भी सबसे अधिक है। पाश्चात्य लोकतंत्र को आत्मसात करने में भारत को कठिनाई नहीं हुई, गत साठ वर्षों से भारत के राज्यों और केन्द्र का संचालन जनता के बहुमत से चुना नेतृत्व कर रहा है। प्रारंभ में बाहुबल, धनबल, जाती सम्प्रदाय की नीति के द्वारा चुनाव लड़े और जीते गये। यह मानना पूरी सच्चाई नहीं है कि चुनाव समग्र जनता का मत व्यक्त करता है, क्योंकि यह बहुमत का खेल है, अल्पमत की आवास को नकार दिया जाता है। चुनाव की प्रयोगशाला में जिस जातिवाद, सम्प्रदायवाद की रणनीति को सफल माना जाता था। कालेधन का घालमेल भी होता रहा। इससे ऐसा लगा कि लोकतंत्र जिस जनता के लिए है उनके कल्याण की बजाय जनता के मुँह का निवाला छीनने वाला नहीं बन जाय? जिस तरह प्रदूषण से दिल्ली सहित कई शहरों की सांसे फूलने लगी है, प्रदूषण दूर करने के लिए पानी के छिडक़ाव प्रकृति के संरक्षण के अभियान चलाये गये, उसी तरह 2014 में चुनावी रणनीति में भी क्रांतिकारी बदलाव हुआ, विकास के नाम पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। इस रणनीति में जोखिम यह थी कि सम्प्रदाय, जाती के ध्रुवीकरण की रणनीति विकास को कही परास्त नहीं कर दे, लेकिन विकास जीता और सम्प्रदाय और जाती के प्रेत पलायन करते दिखाई दिये। गुजरात से चला विकास का प्रवाह दिल्ली की सत्ता को प्रभावित करने लगा इसी बीच उत्तर प्रदेश, जो जातीय और परिवार की राजनीति का गढ़ माना जाता था, उसके क्षत्रप मुलायम, अखिलेश के किले भी विकास की राजनीति में ध्वस्त कर दिये। परिवार और जाती प्रभावित राजनीति के पाये हिलने से यह तो कहा जा सकता है कि जिन जातीय राजनीति और परिवार के प्रभाव में लोग मतदा करते थे, वे अब विकास के साथ खड़े दिखाई दिये। विकास ने जाती, सम्प्रदाय और परिवार की गंदगी को धो डाला। मायावती दलितों के मतों से चुनाव जीतती रही, अब वे भी राजनीति के जंगल में भटक रही है। भाजपा हर उपचुनाव और विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर रही है। दूसरी और कांग्रेस, क्षेत्रीय दल सपा, बसपा, राजद आदि पिछड़े, दलित, मुस्लिम आदि की भावना को उभारकर सत्ता सुख की तलाश कर रहे है। चुनाव न केवल किसी दल या प्रत्याशी की जीत हार का निर्णय करता है बल्कि यह ऐसी प्रयोगशाला है, जिससे लोकतंत्र की दिशा और नेतृत्व की दृष्टि (विजन) का जायता लिया जा सकता है। जिस तरह मनुष्य और राष्ट्र की आत्म होती है उसी तरह लोकतंत्र की भी आत्मा होती है। लोकतंत्र का यदि मूल्यों से सरोकार नहीं रहा तो फिर लोकतंत्र किसी कि कठपुतली भी हो सकता है। इतिहास के पृष्ठ बताते  है कि जर्मन के हिटलर ने लोकतंत्र और संविधान को अपने कब्जे में लेकर तानाशाही स्थापित की, हम उसे तानाशाह के नाते ही जानते है। इसी तरह इंदिराजी ने भी अपने सत्ता मोह के कारण लोकतंत्र की आत्मा को मारकर तानाशाही स्थापित की थी। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि लोकतंत्र के मंथन से केवल अमृत ही निकलेगा, हलाहल भी निकलता है। भारत का डीएनए सदियों से सहिष्णु, सबको आत्मीय मानने का रहा है, इसलिए उसकी सहन शक्ति भी सबसे अधिक है। पाश्चात्य लोकतंत्र को आत्मसात करने में भारत को कठिनाई नहीं हुई, गत साठ वर्षों से भारत के राज्यों और केन्द्र का संचालन जनता के बहुमत से चुना नेतृत्व कर रहा है। प्रारंभ में बाहुबल, धनबल, जाती सम्प्रदाय की नीति के द्वारा चुनाव लड़े और जीते गये। यह मानना पूरी सच्चाई नहीं है कि चुनाव समग्र जनता का मत व्यक्त करता है, क्योंकि यह बहुमत का खेल है, अल्पमत की आवास को नकार दिया जाता है। चुनाव की प्रयोगशाला में जिस जातिवाद, सम्प्रदायवाद की रणनीति को सफल माना जाता था। कालेधन का घालमेल भी होता रहा। इससे ऐसा लगा कि लोकतंत्र जिस जनता के लिए है उनके कल्याण की बजाय जनता के मुँह का निवाला छीनने वाला नहीं बन जाय? जिस तरह प्रदूषण से दिल्ली सहित कई शहरों की सांसे फूलने लगी है, प्रदूषण दूर करने के लिए पानी के छिडक़ाव प्रकृति के संरक्षण के अभियान चलाये गये, उसी तरह 2014 में चुनावी रणनीति में भी क्रांतिकारी बदलाव हुआ, विकास के नाम पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। इस रणनीति में जोखिम यह थी कि सम्प्रदाय, जाती के ध्रुवीकरण की रणनीति विकास को कही परास्त नहीं कर दे, लेकिन विकास जीता और सम्प्रदाय और जाती के प्रेत पलायन करते दिखाई दिये। गुजरात से चला विकास का प्रवाह दिल्ली की सत्ता को प्रभावित करने लगा इसी बीच उत्तर प्रदेश, जो जातीय और परिवार की राजनीति का गढ़ माना जाता था, उसके क्षत्रप मुलायम, अखिलेश के किले भी विकास की राजनीति में ध्वस्त कर दिये। परिवार और जाती प्रभावित राजनीति के पाये हिलने से यह तो कहा जा सकता है कि जिन जातीय राजनीति और परिवार के प्रभाव में लोग मतदा करते थे, वे अब विकास के साथ खड़े दिखाई दिये। विकास ने जाती, सम्प्रदाय और परिवार की गंदगी को धो डाला। मायावती दलितों के मतों से चुनाव जीतती रही, अब वे भी राजनीति के जंगल में भटक रही है। भाजपा हर उपचुनाव और विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर रही है। दूसरी और कांग्रेस, क्षेत्रीय दल सपा, बसपा, राजद आदि पिछड़े, दलित, मुस्लिम आदि की भावना को उभारकर सत्ता सुख की तलाश कर रहे है।

हाल ही में छोटे राज्य हिमाचल का चुनाव पूरा हुआ, गुजरात बड़ा राज्य है, वहां के चुनाव पर पूरे देश का ध्यान केन्द्रित है गुजरात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का गृह राज्य है। गुजरात विकास मॉडल को लेकर भाजपा लोगों का ध्यान केन्द्रित करती है। गुजरात में दो दलीय धु्रवीकरण होने से कांग्रेस न इस चुनाव को अपने अस्तित्व का सवाल बना लिया है, कांग्रेस की विडम्बना यह है कि उसी जाती केन्द्रित रणनीति से कांग्रेस चुनाव लड़ रही है, जिस बुराई को जनता नकार रही है। चूंकि वहां बयालिस सीटों पर पटेल प्रभावी है, इसलिए पटेलों को भाजपा के विरोध में करने की कांग्रेस जी तोड़ कोशिश कर रही है। पटेलों के आरक्षण के लिए हार्दिक ने संघर्ष किया था। अब कांग्रेस हार्दिक के बीच आरक्षण के बारे में सौदेबाजी चल रही है। इस बारे में समझना होगा कि जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर है, उनको आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। गुजरात के पटेल या पाटीदार समाज के लोग केवल सम्पन्न है बल्कि उनके उद्योग धंधे और विदेशों में कारोबार है, कई पटेल तो हीरे के व्यापारी है, विदेशों में बसे पटेल भी भारत के उद्योग धंधे मं निवेश कर रहे है। इतने समृद्ध समुदाय को आरक्षण देने का औचित्य क्या है? क्या आरक्षण राजनैतिक सौदेबाजी माध्यम बनाना चाहिए? जो समुदाय गरीबी में जीवन बिता रहे है, उनके आरक्षण पर यह डाका भी होगा। कांग्रेस के लिए गुजरात चुनाव अस्तित्व के सवाल के साथ राहुल गांधी के भी भविष्य का सवाल है। इसलिए राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस आक्रामक रवैये के साथ चुनाव लड़ रही है। नोटबंदी, जीएसटी को मुद्दा बनाकर भाजपा पर प्रहार कर रही है, कभी कहा जाता है कि विकास पगला रहा है, गब्बर सिंह आदि शब्दों से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश होती है हालात यह है कि प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं के चरित्र हनन कोशिश में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। विकास तो पागल नहीं हुआ लेकिन कांग्रेस नेतृत्व पगला रहा है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस मर्यादा के कपड़े उतारकर लोगों के सामने नंगा नाच कर रहे है। कांग्रेस का नेतृत्व इस सच्चाई को भी समझना नहीं चाहता की सभी समुदायों में जो युवा है वे जाती, सम्प्रदाय और व्यक्ति परिवार के वर्चस्व को नहीं मानते, उनके लिए केवल विकास है। विकास से ही देश और युवाओं का भविष्य ऊँचाई छू सकता है। शायद कांग्रेस को यह भ्रम है कि जाती केन्द्रित राजनीति से उसकी नैया पार हो सकती है। कांग्रेस सबसे पुराने पार्टी होने के बाद भी भटकाव की स्थिति में है, उसे सत्ता के गलियारे में पहुंचने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है, कई कुए खाई उसके रास्ते में अवरोध बने हुए है। कांग्रेस का वैचारिक आधार न केवल डगमगा रहा बल्कि उसकी वैचारिक आत्मा कही ओर चली गई। बिना आत्मा के कांग्रेस फडफड़़ा रही है। उसका स्तर इतना घटिया हो गया कि राहुल गांधी जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने वालों के बीच जाकर उनका समर्थन करते है। उनके नेता दिग्विजय सिंह, चिदंबरम, सुशील कुमार शिन्दे ने मुस्लिमों को प्रभावित करने के लिए हिन्दू आतंकवाद का शब्द गढ़ा और झूठ का जाल बिछा कर हिन्दू साध्वी प्रज्ञा सिंह, संत असीमानंद, सेना के अधिकारी कर्नल पुरोहित, मेजर उपाध्याय को फंसाया इन्हे जेल में डालकर मालेगांव मामले में लगातार नौ वर्षों तक पाशविक यातनाएं दी। झूठे गवाह तैयार किये गये इस साजिश की पोल खुल गई है, अब तो सवाल यह है कि नौ वर्षों तक जेल में डालकर जो यातनाएं दी गई, इसके दोषियों को सजा कौन दें। निर्दोषों को फंसाने की साजिश से जिस पार्टी का राजनैतिक कर्मकांड चलता है, उसका कोई भविष्य नहीं हो सकता। कांग्रेस बियाबानी के जंगल में भटक रही है। झूठ, साजिश, जाती, परिवार की राजनीति की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। वैसे भी कांग्रेस के पुराने पाप उसके सिर पर चढकऱ चीख रहे है। कांग्रेस के पास एक भी नेता ऐसा नहीं है, जो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के सामने टिक सके। नरेन्द्र मोदी की साढ़े तीन वर्ष की भाजपा सरकार ने साहसिक निर्णयों के साथ ईमानदारी का वातावरण निर्मित किया है। देश की सीमाएं इतनी सुरक्षित है कि कोई भी सीमा की लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर सकता। घुसपैठिये और आतंकी आल आऊट हो रहे है। दुनिया यह मानने लगी है कि भारत एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति है। सुपरपावर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नरेन्द्र मोदी को अपना सच्चा दोस्त बताते है। एशिया यात्रा के दौरान वियतनाम पहुंचे ट्रम्प ने भारत के शानदार विकास के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी तारीफ की है। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी ने भारत के लोगों को एक कद दिया है। ट्रम्प ने एशिया पैसिफिक इकोनोमिक्स कार्पोरेशन (एपेक) सम्मेलन से इतर सीईओ की बैठक में कहा कि भारत आजादी की 70वीं वर्षगाठ मना रहा है। वह एक अरब से अधिक आबादी वाला देश है, वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत की विकास यात्रा कई लोगों को प्रभावित कर रही है। इजराइल के सैन्य अभ्यास भारतीय वायुसेना के लडाकू विमान शामिल हो रहे है। वायु, जल, थल सेनाएं आज दुनियां की किसी चुनौती का सामना करने में सक्षम है। दूर तक मार करने वाली अग्नि-4 जैसी मिसाइलों का निर्माण भारत में हो रहा है।

यह सब देखकर राहुल गांधी पगला रहे है। इसलिए वे विकास की सच्चाई को स्वीकार नहीं करते और विकास को पागल करार दे रहे है। कांग्रेस का नेतृत्व न विकास के प्रति ईमानदार है और न देश के प्रति। चिदंबरम जैसा वरिष्ठ नेता कश्मीर की आजादी की मांग करने वालों की आवाज की आवाज में आवाज मिलाते है। मणिशंकर अय्यर अलगाववादी गद्दारों के घर जाकर दावत उड़ाते है। नरेन्द्र मोदी को टारगेट करने से सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। कांग्रेस के लिए नेक सलाह यह हो सकती है कि यदि उसको अपना भविष्य सुरक्षित रखना है तो उसे अपने चिंतन की दिशा बदलनी होगी। मोदी सरकार के कामकाज हो या उसका मीडिया के प्रचार का तरीका हो, उसकी नकल राजनीति से परहेज कर उसे अपना रास्ता बनाना होगा। नकारात्मक राजनीति को युवा भारत पसंद नहीं करना। विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस है, इसलिए उसे यह मानकर चलना होगा कि आलोचना में सुधार की दृष्टि हो। हुल्लड़ी और झूठ की राजनीति से लोग घृणा करने लगे है। वैसे भी कांग्रेस के लिए अभी दिल्ली दूर है। नकारात्मक हथकंड़ों से चुनाव जीतने का समय नहीं रहा।

०-लेखक – वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक है।
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