भाजपा में चुनाव प्रबंधन का शंखनाद और असमंजस में कांग्रेस

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०- अरुण पटेल

वैसे तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हमेशा ही चुनावी मोड में रहते हैं लेकिन एक साल पूर्व ही उन्होंने मिशन 2018 के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह द्वारा दिए गए 200 पार के लक्ष्य को पूरा करने हेतु जावली की तर्ज पर भाजपा चुनाव प्रबंधन कार्यालय का उद्घाटन कर चुनावी प्रबंधन का शंखनाद कर दिया है। 2018 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में विजयी होने के लिए उन्होंने समर्पण, समन्वय और एकजुटता का विजयी मंत्र सुझाया। एक तरफ जहां भाजपा ने अभी से चुनावी रणनीति को कारगर ढंग से अमल में लाने और लगातार चौथी बार सरकार बनाने के लिए कमर कस ली है तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अभी इसी असमंजस में है कि उसका प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा। पिछले छह-सात माह से चेहरे को लेकर कयास लगाये जा रहे हैं लेकिन कांग्रेस आलाकमान अभी तक इस संबंध में कोई दोटूक फैसला नहीं कर पाया है। प्रदेश प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया के सामने पहली चुनौती यही होगी कि वे इस संबंध में दोटूक फैसला करायें।

वर्ष 2003 में कांग्रेस की एक दशक से जमी दिग्विजय सिंह की सरकार को सत्ता से उखाडऩे के लिए पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ. गौरीशंकर शेजवार के निवास पर जावली के नाम से चुनाव प्रबंधन की शुरुआत हुई थी और इसकी कमान स्व. अनिल माधव दवे के हाथों में थी। अब फिर 2018 में चौथी बार लगातार सत्तारूढ़ होने के लिए भाजपा के चुनाव प्रबंधन कार्यालय का 10 नवम्बर को विधिवत पूजा-अर्चना के साथ शिवराज ने शुभारंभ कर दिया है। हालांकि इसका नाम जावली नहीं है लेकिन जावली की तर्ज पर ही चुनाव प्रबंधन यहां से होगा। उस समय आक्रामक चुनाव प्रचार की शैली विकसित की गयी थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को मिस्टर बंटाढार के नाम से इस प्रकार अलंकृत कर दिया था कि इस शब्द ने लम्बे समय तक उनका पीछा नहीं छोड़ा। यह केन्द्र सभी अत्याधुनिक संचार संसाधनों से लैस होगा और प्रदेश के प्रत्येक मतदान केन्द्र का डाटा यहां जुटाया जाएगा एवं इसी कार्यालय से चुनाव प्रबंधन भी होगा। आखिर जावली क्या है यह सवाल कुछ लोगों के मन में उठ सकता है। जावली महाराष्ट्र की एक छोटी सी रियासत थी तथा इसके किले में मुगल शासक अफजल खान ने 10 नवम्बर 1659 को शिवाजी महाराज को अकेले में मिलने को बुलाया था। उसकी मंशा शिवाजी की हत्या करना था लेकिन शिवाजी ने उसे मार गिराया। इसी विजयगाथा की याद में भाजपा ने अपने चुनाव प्रबंधन कार्यालय के विधिवत उद्घाटन के लिए 10 नवम्बर की तारीख आनन फानन में तय की।

भाजपा किसी न किसी प्रतीक को लेकर अपने अभियानों की शुरुआत करती है इसलिए ही उसने 10 नवम्बर का दिन चुना और शिवराज ने इस अवसर पर कहा कि हमारे संकल्प व्यक्तिगत न होकर सामूहिक एवं राष्ट्र कल्याण के लिए होते हैं। हमारा कार्य दैवीय कार्य है। शुभ संकल्प होता है तो ईश्वर की कृपा बरसती है। हम सभी भारत माता को परम वैभव के शिखर पर पहुंचाने के लिए कार्य करते हैं। समन्वय, समर्पण, एकजुटता और सेवोन्मुखी रहकर जन-जन का आशीर्वाद अर्जित करते हैं और आगे भी करते रहेंगे। शिवराज का कहना था कि चुनाव प्रबंधन आज से ही शुरू हो गया है और हम तैयारियां शुरू कर रहे हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरे दिन ही चुनाव प्रबंधन कार्यालय में राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता, भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष बिजेश लूनावत तथा राजेंद्र सिंह राजपूत आदि ने बैठक की। यह बैठक औपचारिक रूप से पहली थी और इसमें व्यवस्थाओं पर चर्चा हुई कि किस-किस प्रकार की व्यवस्थाएं और किस प्रकार की आधुनिकतम संचार सुविधाओं से इसे लैस किया जायेगा। वैसे अनौपचारिक तौर पर पिछले एक माह से विचार-विमर्श होता रहा है लेकिन अब इस कार्यालय ने औपचारिक रूप से कार्य प्रारंभ कर दिया है। शिवराज ने कहा कि हमें आज इस बात का संकल्प लेना होगा कि हम और अच्छा मध्यप्रदेश तथा और अच्छा देश बनाने के लिए आपसी मतभेदों को भुलाकर एकजुटता से काम करते रहेंगे।

भाजपा के सामने इस समय चौथी बार सरकार बनाने को लेकर भले ही कोई बड़ी चुनौती न हो लेकिन 230 में से 200 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य पार करना सबसे बड़ी चुनौती है और यह लक्ष्य स्थानीय नेताओं ने नहीं राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तय किया है इसलिए आखिरी समय तक उनका यह दबाव रहेगा कि इस लक्ष्य को पूरा किया जाए। जहां तक जावली की तर्ज पर आक्रामक प्रचार-शैली अपनाने का सवाल है तो वह शायद इसलिए कारगर साबित नहीं होगी क्योंकि प्रदेश में लगभग पिछले डेढ़ दशक से भाजपा की ही सरकार है और उसमें भी एक दशक से अधिक समय से शिवराज ही मुख्यमंत्री हैं। केन्द्र में भी कांग्रेस की सरकार नहीं है और देश के ज्यादातर राज्य कांग्रेस से फिसल चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस को लेकर कोई आक्रामक प्रचार शैली का सहारा लिया जाएगा तो वह कितना कारगर होगा यह आने वाला समय ही बतायेगा। इस बार तो उसे अपनी व केन्द्र सरकार की उपलब्धियों को पूरी आक्रामक सकारात्मकता से प्रचारित करने की रणनीति अपनानी होगी और वह भी कुछ इस ढंग से कि विपक्ष आरोपों के जो प्रक्षेपास्त्र छोड़े वे निष्प्रभावी रहें।
बावरिया के सामने कांग्रेस को एकजुट करने की चुनौती

मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रभारी दीपक बावरिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कांग्रेसजनों को किस प्रकार एकजुट किया जाए और डेढ़ दशक से सत्ता से दूर रहने के कारण जो कांग्रेसजन घरों में बैठ गए हैं उन्हें कैसे सक्रिय किया जाए। वैसे उन्होंने बैठकों के मैराथन दौर चालू कर दिए हैं और जिलों में जाकर कांग्रेसजनों से सीधे मिल रहे हैं, उनसे सुझाव ले रहे हैं, उनकी बातों को सुन रहे हैं और सुझावों का दस्तावेजीकरण भी कर रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उन्होंने स्पष्ट हिदायत दी है कि अब किसी भी प्रादेशिक नेता के नाम से नारेबाजी न की जाए और केवल सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नाम से ही नारे लगाये जायें। इसके अलावा अन्य नारे लगाकर व्यवधान पैदा करना अनुशासनहीनता ही मानी जायेगी। पहली सबसे बड़ी चुनौती तो बावरिया के सामने यही है कि वे इस बात का जल्द से जल्द दोटूक फैसला कांग्रेस हाईकमान से करायें कि प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा तथा चुनाव प्रबंधन की कमान किसके हाथ में होगी एवं मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा। कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेता जो विकल्प के तौर पर उभर रहे हैं कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों ही यह कह चुके हैं कि कांग्रेस को वर्तमान स्थिति को देखते हुए अपनी पुरानी परम्परा से हटकर किसी एक चेहरे को बतौर मुख्यमंत्री पेश करना चाहिए। इनका सोचना है कि इससे कांग्रेस को अधिक फायदा होगा और मतदाता के सामने भी यह बात स्पष्ट होगी कि यदि वह कांग्रेस को वोट देता है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा। भाजपा की तरफ से तो शिवराज ही चेहरा होंगे। कांग्रेस की ओर से कौन चेहरा होगा, बावरिया को जल्द ही यह तय कराना चाहिए यदि कोई चेहरा नहीं होगा तो उसका भी ऐलान जितना जल्द संभव हो करवाना चाहिए।

बावरिया ने पिछले दो दिन तक अपने प्रवास के दौरान अलग-अलग बैठकों में कार्यकर्ताओं व नेताओं से जब कांग्रेस की मजबूती के लिए सुझाव मांगे उस दौरान कांग्रेस प्रवक्ता जे.पी. धनोपिया ने बावरिया को सुझाव दिया कि केंद्रीय फलक पर कांग्रेस में राजनीति करने वाले प्रदेश के चार-पांच ऐसे चेहरे हैं जिनके हजारों की संख्या में समर्थक हैं। इसलिए उन नेताओं को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में महीने में एक-एक दिन बैठाया जाए ताकि यहां चहल-पहल बनी रहे और कांग्रेस मजबूती से खड़ी हो रही है, यह संदेश भी जाए। इस प्रकार हर सप्ताह कांग्रेस का कोई न कोई बड़ा नेता प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में रहेगा तो उससे चहल-पहल भी बनी रहेगी और पार्टी मजबूत होगी। कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, सत्यव्रत चतुर्वेदी और विवेक तन्खा तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को प्रदेश कार्यालय में अलग-अलग दिन यदि बैठाया जाता है तो इससे कांग्रेस के पक्ष में सकारात्मक परिणाम सामने आयेंगे। अब देखने की बात यही होगी कि इस सुझाव पर किस सीमा तक अमल होता है।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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