ज्योति’ की अटेर में और ‘कमल’ की बांधवगढ़ में होगी परीक्षा

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०- अरुण पटेल
मध्यप्रदेश में तीन दशक के बाद सत्ता में आने की जो रणनीति कांग्रेस आलाकमान बना रहा है उसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री द्वय कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को निश्चित जिम्मेदारियां देकर 2018 के विधानसभा चुनाव में शिवराज के सामने कड़ी चुनौती खड़ी करना शामिल है।  संभवत: भिण्ड जिले की अटेर और उमरिया जिले की बांधवगढ़ विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच आगामी विधानसभा चुनाव के पूर्व अंतिम शक्ति परीक्षण हैं। चूंकि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक जोरशोर से इस बात का सोशल मीडिया और कांग्रेसी हलकों में प्रचार कर रहे हैं कि ये कांग्रेस के लिए उम्मीदों से भरे चेहरे हैं। अटेर विधानसभा उपचुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया और बांधवगढ़ उपचुनाव में कमलनाथ की परीक्षा होना है। यदि ये इसमें सफल हो जाते हैं तो इनका दावा और मजबूत हो जाएगा। जहां तक बांधवगढ़ का सवाल है उस सीट पर यदि कांग्रेस कड़े संघर्ष की स्थिति पैदा कर देती है और भाजपा को नाकों चने चबाने को मजबूर कर देती है तो वह भी कमलनाथ के दावे को मजबूती प्रदान करेगा, क्योंकि यह एक ऐसी सीट है जिस पर भाजपा की मजबूत पकड़ है।

जहां तक अटेर उपचुनाव का सवाल है इस सीट पर कांग्रेस और भाजपा की लगभग बराबर की पकड़ रही है लेकिन जब-जब सत्यदेव कटारे मैदान में रहे तब-तब एक अपवाद को छोड़कर कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा। 2008 के विधानसभा चुनाव में वे भाजपा के अरविन्द भदौरिया से दो हजार से भी कम मतों के अंतर से चुनाव हार गये थे। हालांकि 2013 का चुनाव कटारे ने अरविन्द भदौरिया को 11 हजार 426 मतों के भारी अन्तर से पराजित कर इस सीट पर अपनी मजबूत पकड़ का फिर परिचय दिया था। 1990 से लेकर अभी तक जो 6 चुनाव हुए उनमें से तीन में उन्होंने सफलता हासिल की। इस सीट पर भदौरिया की तुलना में कटारे की पकड़ इस दृष्टि से मजबूत मानी जा सकती है कि उन्होंने जब भाजपा के पक्ष में लहर चल रही थी उस समय भदौरिया को भारी मतों से पराजित किया था। अब इस उपचुनाव में अरविन्द भदौरिया का मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में एक युवा, उत्साही और नये चेहरे हेमंत कटारे से हो रहा है जो कि अपने पिता के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में इस सीट से राज्य विधानसभा में प्रवेश करना चाह रहे हैं। हेमंत इस क्षेत्र के लिए कोई नया नाम नहीं है क्योंकि वे उनके पिताजी के क्षेत्र में पिछले तीन सालों से भी अधिक समय से सक्रिय हैं और वहां वे कार्यकर्ताओं और स्वर्गीय कटारे के बीच संपर्क का काम भी करते रहे हैं। कटारे के निधन के कारण जो सहानुभूूति की लहर चल रही है और जिस दबंगता से उन्होंने क्षेत्र के साथ ही राज्य विधानसभा में अपनी भूूमिका का निर्वहन किया था उसके चलते ही हेमंत इस सीट पर मजबूत टक्कर देने की स्थिति में आते नजर आ रहे हैं। वैसे भाजपा ने भी इस क्षेत्र में अपनी मैदानी जमावट कर रखी है और शिवराज सरकार के कई मंत्रियों, संगठन के पदाधिकारियों तथा विधायकों को वहां तैनात कर दिया गया है। ग्वालियर-चंबल संभाग ज्योतिरादित्य सिंधिया के असर वाला इलाका माना जाता है और सत्यदेव कटारे उनके काफी नजदीक रहे हैं और अब हेमंत की चुनावी नैया यदि पार हो जाती है तो सिंधिया का प्रभावी भूूमिका में आने का दावा और मजबूत हो जाएगा।

कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपे जाने के संकेत लम्बे समय से मिल रहे हैं। बांधवगढ़ उपचुनाव प्रदेश के आदिम जाति कल्याण मंत्री ज्ञान सिंह के लोकसभा उपचुनाव जीतने के कारण रिक्त हुए स्थान की पूर्ति के लिए हो रहा है। अविभाजित शहडोल जिले और वर्तमान उमरिया जिले में ज्ञान सिंह एक बड़ा आदिवासी चेहरा हैं जो 1977 से ही इस क्षेत्र में राजनीति करते रहे हैं। हालांकि बांधवगढ़ विधानसभा क्षेत्र 2008 में ही अस्तित्व में आया है और पिछले दोनों चुनाव ज्ञान सिंह ने यहां से भारी मतों से जीते थे। वे कई बार सांसद व विधायक रहे हैं इसलिए उनकी इस इलाके में मजबूत पकड़ है। उनके बेटे शिवनारायण सिंह इस क्षेत्र से उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवार हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस की सावित्री सिंह से हो रहा है। कमलनाथ का महाकौशल अंचल में प्रभाव होने का दावा किया जाता रहा है और अविभाजित शहडोल जिले में भी उनकी पकड़ रही है, उनके समर्थक दो विधायक भी वर्तमान में इस इलाके से हैं। चूंकि कमलनाथ को बागडोर सौंपने की बात चल रही है इसलिए इस उपचुनाव के नतीजे यह बतायेंगे कि इसका कितना फायदा कांग्रेस को मिलता है। कांग्रेस चुनाव नहीं भी जीतती है और जीत-हार का अन्तर यदि कम कर लेती है तो यह भी काफी होगा। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की सक्रियता का कितना फायदा कांग्रेस को मिला यह भी यहां के चुनाव नतीजे बतायेंगे।

जहां तक उपचुनाव के नतीजों का सवाल है इस परीक्षा में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ पास होते हैं या नहीं, इस पर यह कतई निर्भर नहीं है कि वे शिवराज के मुकाबले कांग्रेस की चुनावी वैतरणी पार कराने में मुख्य खेवनहार होंगे। यदि परीक्षा में पास होते हैं तो इसका मनोवैज्ञानिक असर होगा तथा कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हौसला बुलंद होगा। कांग्रेस के सामने विकल्प सीमित हैं और लगभग यह तय हो चुका है कि ये दोनों नेता ही प्रभावी भूूमिका में होंगे और अन्य बड़े नेताओं को भी सुनिश्िचित जिम्मेदारियां दी जायेंगी। कांग्रेस के लिए यदि अनुकूल नतीजे नहीं आते तो फिर इसकी गाज प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव पर गिर सकती है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है इस समय वह प्रदेश में शनै:-शनै: हाशिए पर खिसक रही है इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि पार्टी के अंदर जो बड़े नेता हैं वे सुविधा के राजमार्ग को त्याग कर संघर्ष की राजनीति को अंगीकार करें और पार्टी के लिए अपने छोटे-छोटे हितों की आहुति देने को तैयार रहें।

नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का दावा है कि उपचुनाव यदि ईमानदारी से होते हैं तो कांग्रेस को सफलता मिलेगी। कांग्रेस प्रत्याशी हेमंत कटारे को नामांकन दाखिल कराने जाते समय अजय सिंह ने कहा कि प्रदेश में अगर निष्पक्ष एवं स्वस्थ परम्परा से चुनाव होते हैं तो कांग्रेस दोनों उपचुनाव आसानी से जीत जायेगी। उन्होंने यह आशंका जाहिर की है कि अक्सर सरकार उपचुनावों में पूरी ताकत लगाकर जनादेश को चुराने का काम करती रही है लेकिन इस बार कांग्रेस सतर्क है और वह एक रणनीति के तहत चुनाव लड़ेगी, जिसका मकसद सरकारी हथकंडों की काट करना होगा। उनका दावा है कि उपचुनाव पूरी ताकत से लड़े जायेंगे। जहां तक जनादेश चुराने का सवाल है चुनाव आयोग ने यह निर्णय किया है कि अटेर और बांधवगढ़ उपचुनावों में वीवीपीएटी का उपयोग किया जायेगा। इस प्रक्रिया के तहत मतदान करते समय मतदाता को इस बात का अवसर प्राप्त होगा कि उसने ईवीएम के माध्यम से जो मतदान किया है वह सही है या नहीं। इसके लिए मतदाता को सात सेकेंड का समय मिलेगा, बाद में प्रिंटेड पेपर स्लिप रिकार्ड के तौर पर रखी जाएगी। यानी यदि कोई विवाद की स्थिति होती है या शंका जाहिर होती है तो इसको देखा जा सकता है। दोनों उपचुनावों में 830 वीवीपीएटी का उपयोग होगा। उल्लेखनीय है कि राज्यसभा में भी यही मांग की गयी है कि या तो इस प्रकार की पद्धति से चुनाव कराये जायें और यदि भारी धनराशि खर्च होने के कारण यह संभव न हो तो फिर मतपत्र के द्वारा मतदान की व्यवस्था कराई जाए। हालांकि प्रदेश कांग्रेस कमेटी इस बार अधिक मुस्तैद है और वह यह संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस पूरी एकजुटता से उपचुनाव लड़ रही है। उपचुनावों में प्रचार के लिए यह रणनीति बनी है कि कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांतिलाल भूूरिया, सुरेश पचौरी, विवेक तन्खा आदि को मैदान में उतारा जाए। जहां तक प्रदेश प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव का सवाल है वे तो सक्रिय रहेंगे ही क्योंकि नतीजे यदि प्रतिकूल आये तो इन दोनों पर हाईकमान की गाज गिर सकती है।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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