1998 से भी बदतर हो गई भाजपा की स्थिति

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। 1998 में जब वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों में प्रदेश संगठन की कमान थी उस समय के तत्कालीन नेताओं स्वर्गीय सुन्दरलाल पटवा, कैलाश सारंग, लखीराम अग्रवाल और विक्रम वर्मा जैसे तमाम भाजपा के नेता जो दिग्विजय सिंह के भरोसे प्रदेश में राजनीति कर रहे थे, यही वजह है कि उस समय भाजपा को भाजपा-डी यानि दिग्विजय सिंह के नाम से जाना जाता था उस समय नरेन्द्र मोदी प्रदेश के संगठन महामंत्री हुआ करते थे और प्रदेश के तत्कालीन नेता उनके साथ असहयोग कर रहे थे इस स्थिति के चलते प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल होने के बावजूद भी भाजपा १९९८ में सत्ता पर काबिज नहीं हो पाई थी हालांकि वर्तमान में उस समय के नेताओं में से कुछ ही नेता राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन इन नेताओं के पदचिन्हों पर चलकर विगत १५ वर्षों के भाजपा के शासनकाल में अपने पूर्व वरिष्ठ भाजपा नेताओं जिन्होंने पार्टी के निष्ठावान नेता होने के बावजूद भी कहीं स्टेशनरी घोटाला तो कहीं हेलीकाप्टर खरीदी की रकम में घोटाला जैसे मामलों को जन्म दिया शायद उन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर प्रदेश में भाजपा के सत्ता के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के १३ वर्षों के शासनकाल में भाजपा की जनसंघ के जमाने से भी बदतर स्थिति हो गई और उसे १५ वर्षों में प्रदेश में भाजपा की सत्ता होने के बावजूद भी आज लोकसभा चुनाव में खड़ा करने के लिये सशक्त उम्मीदवार नहीं मिल रहे हैं और जहां पार्टी ने उम्मीदवार घोषित किये हैं उनका विरोध हो रहा है। सत्ता के अहम में मदमस्त यह भाजपा नेता यह भी दावा किया करते थे कि कुत्ते के गले में यदि भाजपा का पट्टा डालकर खड़ा कर दो तो वह भी जीत जाएगा, लेकिन सत्ता से बेदखल होते ही उनका यह भ्रम भी चकनाचूर हो गया यही नहीं सत्ता के मद में भाजपा के नेता अपने क्षेत्र में बम्बईया फिल्मों के खलनायक की तरह एरियाबंदी भी करने में लगे रहते थे जिसकी बदौलत उनके क्षेत्र में कोई दूसरे जनप्रतिनिधि के जाने की जुर्रत नहीं होती थी। तो वहीं सत्ता के शपथ ग्रहण करने के कुछ ही दिनों बाद शिवराज की धर्मपत्नी साधना सिंह द्वारा अपनी पहचान छुपाकर डम्पर खरीदने के मामले का जो संदेश अपने पति के सत्ता के कार्यशैली का जो संदेश प्रदेश के भाजपा नेताओं और प्रदेश की नौकरशाही को दिया उसका ही यह परिणाम रहा कि अधिकांश योजनायें अच्छी होने के बावजूद भी कागजों के अलावा धरातल पर नजर नहीं आयीं तो जनसेवा का व्रत ले राजनीति करने वाले शिवराज सिंह चौहान और उनके सहपाठी जो उनके कार्यकाल में दो बार प्रदेशाध्यक्ष बने वह भी सत्ता के अहम और अपने पुत्र मोह में धृतराष्ट्र की भूमिका अदा की कि आज उस ग्वालियर चंबल क्षेत्र में जो कभी मालवा के बाद जनसंघ और भाजपा का गढ़ हुआ करता था उसमें भाजपा को इस तरह की पराजय का मुंह चखना पड़ा कि प्रदेश की सत्ता पर काबिज होते-होते इसी ग्वालियर-चंबल संभाग की बदौलत भाजपा सत्ता से वंचित रह गई। क्योंकि पुत्र मोह में फंसे नरेन्द्र सिंह तोमर ने अपने पुत्र विधायक ना बनाने से नाराज अपने पार्टी के उम्मीदवारों को हराने का काम किया, जिसकी बदौलत जयभान ङ्क्षसह पवैया, नारायण सिंह कुशवाह और मायासिंह के साथ-साथ कई भाजपा नेताओं को हार का स्वाद चखना पड़ा, कहने वाले तो यह भी कहने से नहीं चूक रहे हैं कि नरेन्द्र तोमर ने शिवराज के संकटमोचक रहे नरोत्तम को हरवाने का प्रयास किया लेकिन वह हांफते-हांफते विधानसभा में पहुंच गये, इसी तरह से अपनी कार्यशैली के चलते नरेन्द्र तोमर ने जहाँ भाजपा की ग्वालियर-चंबल संभाग में जो दुर्गति की उसके चलते ही अपने गृह क्षेत्र की विधानसभा में आने वाले गांवों में भाजपा को पर्याप्त वोट नहीं दिलवा पाए यही वजह है कि आज वह रणछोड़ बने घूम रहे हैं, लेकिन मजबूरी में अब उसी मुरैना से चुनावी समर में उतना पड़ रहा है जिससे वह रणछोड़ होने की स्थिति में थे। देखना अब यह है कि जिन भाजपा नेताओं को इन्होंने निपटवाया उनकी इस चुनाव में क्या भूमिका रहेगी। हालांकि वह डरते-डरते चुनावी समर में उतरे हैं लेकिन जिनके लिये उन्होंने कुआ खोदा उन नेताओं का भय उन्हें सता रहा है, मध्यप्रदेश भाजपा की इस स्थिति को देखकर अब भाजपा का निष्ठावान और देवदुर्लभ नेता और कार्यकर्ता जिन्हें शिवराज सिंह चोहान के कार्यकाल में सत्ता के दलालोंं और हर प्रकार के माफियाओं के सक्रिय होने के कारण असंतुष्ट होकर घर बैठ गए थे वह अब भाजपा की इस तरह की दुर्गति को देखकर काफी चिंतित हैं और वह यह कहने से परहजे नहीं कर रहे हैं कि एक ओर जहां नरेन्द्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का ढिंढोरा पीट रहे हैं तो दूसरी ओर आगे पाठ और पीछे सपाट की स्थिति भाजपा की बन गई जिसे आज लोकसभा चुनाव के लिये योग्य उम्मीदवार ढूंढने की स्थिति से गुजरना पड़ रहा है लेकिन इसी बीच भाजपा में एक नया चेहरा वीडी शर्मा के रूप में उभरा है जो मध्यप्रदेश की २९ लोकसभा में लंगोटा घुमाए भाजपा के नेताओं को चेलेंज देते फिर थे कि वह कहीं से भी चुनाव लडऩे को तैयार थे क्योंकि उनकी छवि अटल विहारी वाजपेयी, सुषमा स्वराज, लालकृष्ण आडवाणी से बेहतर है तभी तो चाहे मुरैना हो या भोपाल हर जगह से वीडी शर्मा के खड़े होने की चर्चा आम रही, यह अलग बात है कि पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, उमाशंकर गुप्ता और राजधानी के महापौर आलोक शर्मा सहित भाजपा के नेताओं से वीडी शर्मा के बारे में पूछा जाता था तो उनका यही जवाब रहता था कि ‘कौन है वीडी शर्मा हम नहीं जानते…?’ हालांकि वीडी शर्मा को शिवराज सिंह चौहान ने अनूप मिश्रा के खिलाफ मुरैना से उतारने के लिये तैयार किया था लेकिन अब वीडी शर्मा बाहरी प्रत्याशी के रूप में उमा भारती के पूर्व संसदीय क्षेत्र खजुराहो से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनावी समर में हैं जहां के मतदाताओं में उनकी कोई खास पकड़ नहीं है तो वही छतपुर की ‘मम्मी’ के नाम से प्रसिद्ध पूर्व मंत्री ललिता यादव और बुंदेलखण्ड के पन्ना की दीदी कुसुम मेहदेले की उपेक्षा कर वीडी शर्मा को चुनावी समर में उतारा है देखना अब यह है कि छतपुर की मम्मी और पन्ना दीदी का कितना स्नेह वीडी शर्मा को प्राप्त होता है? कुल मिलाकर भाजपा की वर्तमान इतनी दयनीय स्थिति के लिये कौन जिम्मेदार है, यह लाख टके का सवाल की खोज में भाजपा का एक वर्ग लगा हुआ है तो वहीं दूसरा वर्ग भाजपा की इस दुर्गति के लिये शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र तोमर जिन्होंने अपने पुत्र मोह के चलते भाजपा की ग्वालियर-चंबल संभाग में जो दुर्गति तो की है तो वहीं विधानसभा के एक अधिकारी के माध्यम से टिकट बेचने का गोरखधंधा भी खूब किये जाने की चर्चा है। तो वहीं शिवराज सिंह के शासनकाल में दरिद्र नारायण की सेवा के नाम पर सेवा का जो मेवा शिवराज सिंह और उनके परिजनों के साथ-साथ भाजपा के उन नेताओं जिनकी उमा भारती के शासनकाल में हैसियत टूटी साइकिल तक खरीदने की नहीं थी लेकिन शिवराज के शासनकाल में आलीशान भवनों और लग्जरी वाहनों में फर्राटे लेते नजर आये। तो वहीं शिवराज की बुढ़ापे की काशी नर्मदा को उनके परिजनों ने नर्मदा की मशीनों से उसकी छाती छलनी करने का जो काम किया उससे प्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी की जो दुर्दशा हुई है उसका प्रयाश्चित्त तो अब भाजपा को ही भोगना पड़ेगा, ऐसा लोग कहते नजर आ रहे हैं, तो वहीं भाजपा की इस तरह की दुर्गति के लिये लोग भाजपा की इस नई परम्परा बुजुर्गों का अपमान करने की एक नई परम्परा को भी बुजुर्गों का श्राप मान रहे हैं, बुजुर्गों के अपमान करने का दौर अकेले राष्ट्रीय स्तर के नेताओं द्वारा नहीं बल्कि शिवराज के कार्यकाल में खूब चला। तो वहीं ‘मैं हूं ना’ का अहम और पार्टी में ब्राह्मणों की उपेक्षा का अहम भी शिवराज और पार्टी को ले डूबा, देखना अब यह है कि इस लोकसभा चुनाव में देश के प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले शिवराज सिंह चौहान और उनकी मण्डली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दुबारा देश की सत्ता पर काबिज करने के लिये कितना योगदान दे पाएगी या फिर १९९८ के दौर में प्रदेश के संगठन मंत्री के नाते मोदी के साथ जो प्रदेश भाजपा के नेताओं ने किया वही दौर पुन: दोहराया जायेगा।

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