सुप्रीम कोर्ट की समझ में रिश्ते

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०-हरिशंकर व्यास
मैं न पुरातनपंथी हूं, न कर्मकांडी हूं और न हिंदुत्ववादी हूं। मगर हां, वह सनातनी हिंदू हूं, जिसकी सनातनी विरासत, संस्कार, मूल्य, ज्ञान में अपने आप मेरी यह अंतरदृष्टि बनी, यह अवचेतना बना कि रावण बुराई है। मांस-मदिरा और व्यभिचार पाप हैं। घर-परिवार, समाज याकि रिश्तों की परंपरागत बुनावट में जो चला आया है उसका निर्वहन जितना संभव हो होना चाहिए। मतलब अपने आपको जीने के तौर-तरीकों में ढालने के संस्कारगत, नैतिक आग्रह का वह परिवेश था, जो कानून, बाध्यता से नहीं विरासत से था। यहीं सभ्यताओं, कौम, धर्म और संस्कृति की वह घुट्टी है, जिससे व्यक्ति का व्यवहार बना ढला होता है। रिश्ते ओर उसके व्यवहार में ही फिर परस्पर विश्वास, आदर, सहयोग, साझेपद से निर्वहन है। यही नर-नारी, घर-परिवार और समाज की बुनियाद है। संदेह नहीं हर धर्म, कौम अपने भूभाग विशेष, काल विशेष के अनुसार कुछ फर्क लिए होता है। पुरुष-महिला, शादी, घर-परिवार के रिश्तों की बुनावट के प्राथमिक मकसद में समानता होते हुए भी यूरोप, जापान या सऊदी अरब में रिश्तों की तासहर का अलग-अलग होना स्वाभाविक है। अपना मानना है कि हिंदू और उसके जीने के तरीके में, उसके धर्म में क्योंकि आदि धर्म, अनादी काल से चली आई विरासत है इसलिए उसके निज नियम, कायदे व कानून यूरोप जैसे नहीं हो सकते हैं। अलग-अलग सभ्यताओं ने अपने अनुभव, विज्डम में रिश्तों की जो बुनावटबनाई उनकी अपनी खूबियां हैं। ऐसा वहां के परिवेश, भूगोल, धर्म की बदौलत भी है। तभी लाख टके का सवाल है कि हम भारतीय, भारत के हम हिंदू रिश्तों की अपनी बुनावट, अपने नैतिक आग्रहों में अपना विकास करें या पश्चिम में जो है उसे रोल मॉडल मानते हुए उसके चश्मों में देखते हुए वहां के ट्रेंड में अपने को ढालें, अपनी अगली नस्लें बनाएं? यह बहुत अहम मसला है। अपना मानना है कि भारत का आज नंबर एक संकट रिश्तों का टूटना-बिखरना है। घर-परिवार, समाज आज जिस तरह टूट बिखर रहे हैं यह अंतत: देश को, उसकी समाज रचना, उसके धर्म-उसके नैतिक बल को तोडऩे वाला होगा। इस स्थिति के कई जिम्मेवार कारण हैं। अपना मानना है कि रिश्तों का टूटना, बिखरना पश्चिम से आएं, आ रहे खांचों, टेपलेटों, जुमलों में अपने को ढालने के चलते भी है। आजाद भारत के ७० साला इतिहास की गजब विचारणीय बात है कि पंडित नेहरू की प्रगतिशीलता में भी मॉडल पश्चिमी था तो कथित तौर पर नेहरू के आडिया ऑफ इंडिया से अलग मोदी-शाह के आइिडिया ऑफ इंडिया में भी हिंदू को आधुनिक, प्रतिशील बनाने के फैसले भी पश्चिमी पैमाने में हुए हैं। पंडित नेहरू ने हिंदुओं की प्रगतिशीलता के लिए हिंदू नागरिक संहिता, विवाह कानून बनवाया। उस वक्त फिर भी एक विचारमना व्यक्ति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे, जिनहोंने कुछ पहलुओं पर धर्म, नैतिकता का हवाला देते हुए हिंदू जीवन को कचहरी के चककर लगाने के खतरे से आगाह किया था। लेकिन आज तो हालात और विकट हैं। नरेन्द्र मोदी के कथित हिंदू और संघ की सरकार के हाल देखिए कि शादी के संस्कार ने ‘लिव इन रिलेशनÓ का प्रतिस्थापन पाया। समलैंगिकता के रिश्ते मान्य हुए तो शादी की संस्था के बीच व्यभिचार को अवैध न माने जाने का यह फैसला भी आया, जिसमें यह चिंता नहीं है कि इससे घर-परिवार और रिश्तों की ईमानदारी, पवित्रता का आगे क्या बनेगा? नेहरू के राज में सरकार ने प्रगतिशीलता के पश्चिमी टैंपलेट चुने तो मोदी राज में सुप्रीम कोर्ट ने प्रगतिशीलता में पश्चिम के जुमले चुने, जिन्हें यदि सवा सौ करोड़ लोगों के परिवारों पर कैसे अपनाएं, तो जीवन नरक हो जाएगा। क्या सवा सौ करोड़ लोगों के परिवारों में ‘लिव इन रिलेशनशिप’, समलैंगिक आजादी, शादी बाद के दाम्पत्य जीवन में लैंगक समातनता के हवाले विवाहेत्तर सेक्स की छूट के बीज बोन वाजिब है? कोई माने या न माने, रिश्तों की बरबादी में आज भारत बुरी तरह खोखला है। इसके राजनीतिक, आर्थिक, कारोबारी मतलब, संदर्भ और मायने अलग हैं। फिलहाल मुद्दा घर-परिवार, शादी, सेक्स, रिश्तों में बरबादी का है। इसमें देश के एलिट वर्ग ने, एलिट समाज के नेरेटिव ने, फिल्म-सोशल मीडिया ओर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, विधायी कानूनों ने सामूहिक तोर पर आम हिंदू मानस पर अपने आग्रहों का अपनी प्रगतिशीलता का ऐसा हल्ला बोल प्रभाव छोड़ा है, जिसमें तलाकों की बाढ़ आई है। रिश्ते छोटे, शंकित, टूटे पड़े हैं। बड़े-बूढ़ों का मान-सम्मान खत्म है। जीना हराम है। हाई कोर्ट के रिटायर जज अदालत जा कर गुहार करते हैं कि मुझे मेरे बेटे से बचाओ। नैतिक दबाव से मुक्त सेक्स की भूख इस कदर यू ट्यूब व इंटरनेट पर फूट पड़ी है कि सभी तरह के रिश्तों को वासना की नजरों को देखा जा रहा है। चाहे तो इस सबकी प्रगति और प्रगतिशीलता कह सकते हैं। कह सकते हैं रिश्तों का टूटना, बिखरना भी आजादी है। स्त्री-पुरुष के रिश्तों में समानता, मेरी मर्जी में लेम्बियन या गे, हमारी मर्जी की लिव इन रिलेशन में रहें या शादी करकेक बाहर स्वच्छंदता से यौनाचार बनाएं वाली प्रतिशीलता का हल्ला कुल मिला कर तो पुराने रिश्तों की छुट्टी है। यहां अपनी दलील है कि यदि कानून, अदालत, भारत की एलिट (जिसमें लिव इन रिलेशन, समलैंगिकता, लैंङ्क्षगक समानता, व्यभिचार के अधिकार की जरूरत बनवाई) पश्चिम से खिली प्रगतिशीलता, स्वतंत्रता, स्वच्छंदता, अधिकार में भारत में रिश्तों की पुनव्र्यख्या करवा रहा है तो यह काम क्यों नहीं पश्चिमी पूर्णता के साथ सुप्रीम कोर्ट अपने फैसलों से करता है? तब ऐसा क्यों कि २८ सितम्बर २०१८ को पांच जजों की बेंच ने व्यभिचार को जुर्म नहीं माना तो यह भी कहा कि हां, इसके हवाले तलाक लिया जा सकता है! एक तरफ शादीशुदा पति-पत्नी के लिए इधर-उधर सेक्स करना अपराध नहीं लेकिन दूसरी ओर उसे तलाक के लिए कारण मानना भला क्या बात हुई? जब जुर्म मानने वाली आईपीसी की धारा ४९७ और १९८ असंवैधानिक करार दी है तो पति-पत्नी के बीच क्यों यह बात तलाक का आधार बने कि किसने किससे अवैध सेक्स संबंध बनाए? यह फालतू बात है कि तलाक के लिए जब कोई जाएगा तो वह प्रुफ ले कर जाएगा कि मैंने पत्नी या पति को दूसरे से व्यवभिचार की अनुमति नहीं दी थी! जब व्यभिचार जुर्म ही नहीं हैं, वह पुरुष-स्त्री की आजादी का सहज सेक्स है तो परस्पर सहमति होने जैसी बात की भला क्या तुक? ऐसे ही एक तरफ हर बात में स्त्री-पुरुष की समानता की बात तो दूसरी और दहेज जैसे मामले में क्यों पुरुष को, घर वालों को सीधे गिरफ्तारी का कानून? लैंगिक समानता ही जब प्रगतिशीलता का दो टूक पैमाना तो क्यों यह सोचना कि महिला कमजोर होती है उसे विशेष संरक्षण मिले? उसकी शिकायत को तवज्जो मिले और पुरुष को सीधे जेल में डाला जाए? दरअसल यहसब जो है वह पश्चिमी देशों की प्रगतिशीलता की, उसके जुमलों, टैपलेट्स को जस का तस अपना कर अपने आपको प्रगतिशील, विद्वान बताने का शगल है। हम हिंदू बतौर समाज व धर्म क्योंकि लावारिस है और अपने धर्मगुरु हों या संगठनकर्ता जैसे संघ के मोहन भागवत भी जब बेसुध हैं, बिना विचार के हैं तो वे समलैंगिकता और व्यभिचार के फैसलों में क्या सोचेंगे? किसे फुरसत है इस चिंता की कि इस सबसे भारत में रिश्तों का नैतिक आधार, बल कितना चूर-चूर हो चुका है। सोचें, सुप्रीम कोर्ट में यह हिम्मत नहीं हुई जो नेताओं से दो-दो हाथ करते हुए उने अपराध को रोकने के लिए चुनावी कानून का बड़ा फतवा दे देता। उस पर फैसले का वक्त आया तो उस पर फतवे की हिम्मत नहीं लेकिन लावारिस हिंदू धर्म घर-परिवारों के रिश्तों में फैसला करना हुआ तो एक झटके में शादी में व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में बाहर कर दिया! क्या इस सब पर सोचा नहीं जाना चाहिए? क्या कहीं इस तरह की चिंता, चर्चा सुनाई दी? आजाद भारत के कानून ने सर्वप्रथम तलाक को आसान बनाया और घर-परिवार को अदालत की चौखट पर पहुंचा दिया। अब दाम्पत्य जीवन में व्यभिचार को मान्य बता जो पाप हुआ है उसका दुष्परिणाम इस बात के साथ हमेशा याद रखिएगा कि लम्हों नेखता की, सदियों से सज़ा पाई! इस सबमें फिर आगे का सवाल है कि विधायिका, सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू समाज, घर-परिवार के रिश्तों को तोडऩे के जितने फैसले किए हैं, जिन-जिन बातों में वह पंच बने हैं उनमें किन संदर्भों, किस हकीकत में फैसले हुए या होते हैं? क्या लावारिस हिंदू समाज के रिश्तों में नैतिक, सांस्कृतिक, डिवाइन, धर्म के बल और तर्कों को सुन, समझ कर सभी आधुनिक भारत ने विचार किया?
०-(नया इंडिया के कालम ”अपन तो कहेंगे!” से साभार)
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