सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद चुनाव आयोग की आंखें खुलीं

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०-उमेश त्रिवेदी
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद आखिरकार चुनाव आयोग को आचार-संहिता के उल्लंघन के मुद्दे पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा-सुप्रीमो मायावती, सपा नेता आज़म खान और केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी के खिलाफ कार्रवाई को विश होना पड़ा है। हेट-स्पीच के कारण योगी आदित्यनाथ और आज़म खान पर ७२ घंटे और मायावती व मेनका गांधी पर ४८ घंटे तक चुनाव अभियान में शिरकत करने पर रोक लगा दी गई है। रोक मंगलवार, १६ अप्रैल कीसुबह से ही प्रभावशील होगी। नतीजतन वे नेता १८ अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान के लिए प्रचार नहीं कर सकेेंगे। आयोग ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद उठाया है। इसके पहले आयोग की निष्पक्षता संदेहों के काले घेरे में थीं। लोग खुद को असहाय महसूस कर रहे थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित अनेक नेताओं के खिलाफ शिकायतें आयोग के समक्ष विचाराधीन हैं। नमो टीवी का प्रसारण, मोदी की बॉयोपिक, चुनाव अभियान में सेना के नाम का उपयोग, राष्ट्रवाद के नाम पर सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की शिकायतों पर समाधानकारक कार्रवाई का लोगों को इंतजार है। योगी आदित्यनाथ और मायावती पर सांकेतिक कार्रवाई की हवाओं में विभिन्न दलों की उन शिकायतों के पन्ने भी फडफ़ड़ाने लगे हैं, जो चुनाव आयोग के दफ्तर में इरादतन लंबित पड़ी है। नियम-प्रक्रियाओं की दलीलों के बीच मरणासन्न हालात में हिचकोल खा रही ये शिकायतें फिर जिंदा होने लगी हैं। आयोग की इरादतन अनदेखी का खुलासा तो सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान हुआ कि आयोग क्यों और किस प्रकार शिकायतों पर कुंडली मार कर बैठा है? एक एनआरआई की याचिका में मांग की गई है कि सामाजिक और सांप्रदायिक वैमनस्य को नियंत्रित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की देखरेख में चुनाव-प्रक्रिया पर नजर रखी जाए। आयोग की नीयत में खोट यूं झलकता है कि मायावती ने सात अप्रैल को देवबंद, सहारनपुर में मुस्लिम-उन्माद और योगी ने नौ अप्रैल याने एक सप्ताह के भीतर ही अली-बजरंग बली के नाम पर राजनीतिक-माहौल को सांप्रदायिकता की चिंगारियों में लपेटने की कोशिश की थी। दोनों मसलों में शिकायतें दर्ज होने के सात-आठ दिन बाद तक आयोग कानून-प्रक्रिया के जंगलों में चैन की बंसी बजा रहा था। आयोग बेचारगी की खोल में हेट-स्पीच और आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों को कानून-प्रक्रियाओं के जरिए तितर-बितर रहा था। दोनों मामलों में कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से जवाब-तलब किया था। आयोग का कहना था कि उसकी शक्तियां बहुत सीमित हैं। ऐसे मामलों में हम सिर्फ नोटिस जारी करके जवाब मांग सकते हैं। यदि बार-बार उल्लंघन हो तो शिकायत दर्ज करा सकते हैं। हमें किसी पार्टी की पहचान रद्द करने या उम्मीदवार को अयोग्य ठहराने के अधिकार नहीं है। सांप्रदायिक और धार्मिक बयानबाजी के संदर्भ में सवाल-जवाब पर आयोग का कहना था कि अनुच्छेद ३२४ के तहत आयोग के पास कई सारी शक्तियां हैं। मायावती और योगी पर कार्रवाई की तत्परता का सबब यह है कि सुप्रीम कोर्ट मंगलवार से आयोग की उन शक्तियों की समीक्षा करने वाला है, जो निष्पक्ष चुनाव के संचालन के लिए उसे संविधान में मिली है। कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि समीक्षा के दौरान आयोग का वरिष्ठ प्रतिनिधि मौजूद रहे। चुनाव आयोग इसके पहले भी देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराता रहा है। नब्बे के दशक में टीएन शेषन ने चुनाव आयुक्त बनने के बाद यह स्थापित कर दिया था कि आयोग यदि चाहे तो निष्पक्ष चुनाव कराने से उसे कोई नहीं रोक सकता है। उनके प्रयासों ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को नए आयाम दिए थे। आयोग की प्राथमिकता और विश्वसनीयता सवालों के दायरे के बाहर होने लगी थी। टीएन शेषन के ज्यादातर उत्तराधिकारियों नेउनकी परम्पराओं को आगे रखते हुए,आयोग की निष्पक्षता को कायम रखने के प्रयास किए, लेकिन मोदी-सरकार के कार्यकाल में एक मर्तबा फिर चुनाव आयोग की कार्य-प्रणाली जनता की अदालत के कटघरे में है। खुद प्रधानमंत्री ऐसे भाषण देने से बाज नहीं आ रहे हैं, जिनकी बुनियाद में उन्माद और नफरत नजर आ रही है। वैसे भी किसी भी चुनाव में नफरत भड़काने के मामले से भाजपा का ट्रेक-रिकार्ड अव्वल रहा है। पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज के तत्वावधान में एक टीम ने मई २०१४ से मार्च २०१८ के दरम्यान चुनाव से संबंधित १०० नफरत भरे भाषणों की एक रिपोर्ट तैयार की थी। इसके आंकड़ों के विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया कि सबसे ज्यादा ४६ नफरत बुझे भाषण भाजपा नेताओं ने दिए। इन नेताओं ने नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, गिरिराज सिंह, योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज जैसे नेताओं के नाम सबसे ऊपर हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खाते में ११ भाषण दर्ज हैं। समाजवादी और बसपा के लालू यादव की टीम भी इन मामलों में पीछे नहीं है, लेकिन भाजपा सबसे आगे है।
०-सुबह सवेरे के कालम ”पहली बात” से साभार)
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