सिख-दंगों पर ताजा बहस क्या ‘टाइम’ की उपाधि की पुष्टि है?

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०-उमेश त्रिवेदी
फिलवक्त, जबकि बजरिए मीडिया, भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी अकादी दल वोटों की फसल पकाने के लिए १९८४ के सिख-दंगों की राख में नफरत के अंगारे तलाश रहे हैं, अमेरिका की अंतर्राष्टीय पत्रिका टाइम के मुख-पृष्ठ पर ‘इंडियाज डिवाइडर इन चीफ’ याने ‘भारत का प्रमुख विभाजनकारी’ के अवतार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर लोकसभा चुनाव की तासीर को ज्यादा तीखा और तल्ख बना रही है। लोकसभा चुनाव के अंतिम दौर में ‘भारत के प्रमुख विभाजनकारी’ के रूप में मोदी का तल्ख व्यक्तित्व और उसकी मीमासाएं भाजपा के सामने सवालों का नया पिटारा बनकर खड़ी हैं, जिनका जवाब देना मुश्किल है। वैसे भी वर्तमान चुनाव के विमर्श में जनता से जुड़े मुद्दे लगभग नदारद हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं चुनाव की दास्तान की दहशतगर्दी के दरवाजों पर ले जाकर खड़ा कर दिया है। २०१९ के चुनाव में पैंतीस साल बाद राजीव गांधी के बहाने १९८४ के सिख-दंगों का उल्लेख नफरत की चिंगारियों को हवा देने का ताजा उदाहरण है, जो राजीव गांधी की शहदात को भी दुत्कारते हुए धर्म के नाम पर वोट बटोरने की कोशिशों को बयां करता है। विवाद में राजीव गांधी की शहादत को दरकिनार करके छींटाकशी के प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण हैं। सिख दंगों के नाम पर राजीव गांधी को कठघरे में खड़ा करके धर्म की धुरी पर वोट बटोरने की कोशिशें टाइम मैगजीन के कथानक में ‘विभाजक’ की प्रवृत्तियों को पुष्ट करती है। टाइम मैगजीन ने २० मई के संस्करण में नरेन्द्र मोदी पर केन्द्रित कहाने को अपनी लीड-स्टोरी बनाया है। टाइम मैगजीन ने अपने कवर पर नरेन्द्र मोदी को इंडियाज डिवाइडर इन चीफ उपाधि से रेखांकित किया है। इस लीड-स्टोरी का शीर्षक है- ‘केन द वल्र्डस लार्जेस्ट डेमोक्रेसी एन्डघोर अनॉदर फाइव इयर्स ऑफ मोदी-गर्वनमेंट? मौजूदा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में यह सवाल बड़ा है कि क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मोदी-सरकार को पांच साल और झेल सकता है? बहरहाल, यह सवाल सिर्फ टाइम मैगनीज की कवर-स्टोरी में ही उभर वार सामने नहीं आ रहा है। भारत के बौद्धिक-समाज की चिंताओं के केन्द्र में भी यही सवाल उमड़ता-घुमड़ता रहता है। न्यायापालिका, विधायिका और कार्यपालिका की स्वतंत्रता पर कुठराघात करने के आरोपों से मोदी मुक्त नहीं है। वर्तमान लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग की निष्पक्षता भी कटघरे में खड़ी है। टाइम की लीड-स्टोरी लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में मोदी-सरकार के पिछले पांच सालों के कामकाज की समीक्षा है। इसमें भाजपा के हेट-कैम्पेन की घातक प्रवृत्तियों का लेखा-जोखा भी है। लंदन के पत्रकार आतिश तासीर ने लिखा है कि मोदी के राज में जहां सांप्रदायिक सद्भाव हाशिये पर खड़ा है, वहीं कट्टरवादी तबकों को जबरदस्त रणनीतिक संरक्षण मिल रहा है। इसमें नेहरु के समाजवाद और भारत की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी के ज्यादातर भाषणों में पंडित जवाहरलाल नेहरु टारगेट पर रहते हैं। लेख में १९८४ के सिख-दंगों और २००२ के गुजरात दंगों का उल्लेख भी किया गया है। यहां टिप्पणी गौरतलब है कि ‘सिख दंगों में कांग्रेस भी गुनाहगार है, लेकिन फिर भी उसने इन दंगों के दौरान उन्मादी भीड़ से खुद को अलग रखा, लेकिन नरेन्द्र मोदी २००२ के दंगों के दौरान अपनी चुप्पी से उन्मादी भीड़ के दोस्त साबित हुए।’ उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में लिंचिंग और गाय के नाम पर होने वाली हिंसा ने मुसलमानों में आतंक पैदा किया। बहरहाल, लोकतंत्र के तानेबाने को ध्वस्त करने के आरोपों के बीच टाइम के दूसरे लेख में मोदी के आर्थिक सुधारों की तारीफ है, लेकिन यह भी कहा गया है कि आर्थिक-चमत्कारों के वायदे पूरे देश में वो असफल रहे हैं। देश में सांप्रदायिक नफरत और सियासी-तंगदिली के अफसानों के बीच कनाड़ा के युवा प्रधानमंत्री जस्टिन टु्रडो का प्रसंग गौरतलब है। २०१५ के उत्तराद्र्ध में जस्टिन टु्रडो ने कैबिनेट में भारतीय मूल के तीन सिखों को मंत्री बनाया था। ‘इस्लामिक-फोबिया’ से भयाक्रांत कनाडा में कट्टरपंथ के हिमायतियों को जवाब देते हुए टु्रडो ने एक बहुलतावादी कैबिनेट का गठन किया था। जब एक पत्रकार ने उनसे सवाल किया कि आपने कैबिनेट की संरचना में नस्लीय और जातीय समानता पर इतना जोर क्यों दिया है, तो इस भारी भरकम राजनीतिक सवाल का उन्होंने संक्षिप्त जवाब दिया था – ”बिकॉज, इट इज २०१५’ टु्रडो के इस ‘वन-लाइनर’ में भारतीय राजनीति के कई सवालों के व्यापक और स्वाभाविक उत्तर छिपे हैं। देश के वर्तमान कर्णधारों को सोचना होगा कि ‘समय के चीथड़ों को छोड़कर देश को आगे बढ़ाना होगा… गड़े मुर्दे उखाडऩे से सुगंध नहीं, सड़ांध फैलती है। मुर्दों की मिजाजपुर्सी से समाज कभी भी दुरुस्त नहीं रहता है।’ टु्रडो के ‘वन-लाइनर’ के निहितार्थी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी समझना होगा।
०-सुबह सवेरे के कालम ”पहली बात” से साभार)
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