सारंग के गौर व सरताज को दी गई नसीहत के बाद राजनीति गरमाई?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। भाजपा के बरिष्ठ नेता कैलाश सारंग ने प्रदेश के उन पार्टी के टिकट वितरण से नाराज नेताओं को नसीहत देने बाले बयान के बाद भाजपा की राजनीति गरमाने लगी है और पार्टी के नेता और कार्यकर्ता यह कहते नजर आ रहे हैं कि सारंग गौर व सरताज सिंह सहित इन तमाम टिकट से बंचित हुए नेताओं को यह उपदेश देने के पहले इस बात पर तो मंथन, चिंतन कर लेते कि उन्होंने अपने पुत्र को तो विधायक और राज्यमंत्री बनाने के पूर्व भी यह मनन किया था कि पार्टी ने उन्हें भी गौर, सरताज या कैलाश विजयबर्गीय की तरह बहुत कुछ दिया? मगर इन सभी नेताओं ने पार्टी के लिये पूरी ईमानदारी,निष्टा से सर्मपित होकर काम भी किया है। तो वहीं पूर्व मंत्री सरताज सिंह ने तो उस समय जब कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जिनकी देश में गरीबों के मसीहा के नाम छबि के कारण स्व, अर्जुन सिंह के खिलाफ चुनाव में लडऩे को तैयार नहीं होता था उस समय सरताज ने स्व, अर्जुन सिंह के खिलाफ चुनाव में उतरे ही नहीं थे, बल्कि उन्हें पराजय का स्वाद जख्खाकर पार्टी का परचम उस समय फहराया का काम किया था जब भाजपा के तत्कालीन नेता अर्जुन सिंह से गलबहियां कर सत्ता का स्वाद चखने तो लगे हुए थे। उस दौर में क्या भाजपा में कैलाश सारंग सहित सक्रिय कोई अन्य नेता अर्जुन सिंह के खिलाफ चुनावी में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था ?क्या सरताज सिंह के इस योगदान का यही परिणाम उन्हें मिल रहा है? इन भाजपाई नेताओं का यह भी कहना है कि सरताज सिंह और बाबूलाल गौर सहित पार्टी के अनेकों नेताओं की निष्ठा पर सबाल खड़े करने बाले नेताओं को पहल अपने गरेबान झांक लेना चाहिए कि इन नेताओं ने स्टेशनरी या हैलीकॉप्टर जैसे कारनामें का अंजाम नहीं दिया? पार्टी में सारंग के बयान को लेकर तरह -तरह की चर्चाएं लोग चटखारे करते नजर आ रहे हैं।

यह भाजपा के नेताओं पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं का ध्यान इस पार्टी के पितृपुरुष स्व, कुषाभाऊ ठाकरे के दौर में संयुक्त मध्यप्रदेश में भाजपा के नेताओं द्वारा उस समय इन्हीं नेताओं की कार्यशैली के चलते ही इसी प्रदेश में इस तरह के नारे ‘ठाकरे जी के तीन नाम, पटवा, सारंग और लख्खीराम’ लगाने को तत्कालीन भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं को मजबूर होना पडा था उसके पीछे कुछ तो कारण होगें?

इस पर भाजपा के नेताओं को बिचार करना चाहिए साथ ही 1998 में मध्यप्रदेश के संगठन मंत्री रहे नरेन्द्र मोदी भी अच्छी तरह से जानते हैं।

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