सामान्य वर्ग को आरक्षण देकर बीजेपी को सचमुच फायदा मिलेगा ?

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पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब १९९० में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण की नीति लागू की थी, जिसे हम सभी मंडल आयोग के तौर पर जानते हैं तब उनके इस कदम को मास्टरस्ट्रोक कहा गया था। क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल उनके इस कदम का खुलकर विरोध नहीं कर पाया था। मौजूदा दौर में जब बीजेपी ने जनरल कैटेगरी में आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लिए दस प्रतिशत आरक्षण लागू करने की बात कही है तो इसे भी २०१९ के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार का एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक बताया जा रहा है। वीपी सिंह के नेतृत्व वाली सरकार हालांकि अपने इस महत्वपूर्ण कदम के बाद महज एक साल ही सरकार में टिक पाई थी, उन्हें इस कदम का कोई बहुत अधिक लाभ नहीं मिल पाया था, लेकिन मंडल आयोग लागू करने का असर उत्तर भारत सहित पूरे देश की राजनीति पर पड़ा।
कितनी है सवर्णों की संख्या ?
इस बीच बीजेपी अभी से अपने इस कदम का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करती हुई दिख रही है। हालांकि उसे इसका बहुत अधिक फायदा मिलता हुआ नजर नहीं आता, इसके पीछे दो अहम कारण हैं। पहला तो देश में सवर्णों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है और दूसरा यह वर्ग पहले से ही बीजेपी का वोटर रहा है। उत्तर भारतीय राज्यों की राजनीति में सवर्ण जातियां अहम किरदार अदा करती हैं, जबकि इस बात का कोई अधिकारिक आंकड़ा अभी तक नहीं है कि अलग-अलग राज्यों में कितने प्रतिशत सवर्ण मौजूद हैं। अगर हम सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलेपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) के सर्वे की बात करें तो उसके अनुसार देश के अलग-अलग राज्यों में सवर्ण जातियों के लोगों की संख्या २० से ३० प्रतिशत के बीच है। हिंदी भाषी राज्यों की बात करें तो बिहार में १८ प्रतिशत, मध्यप्रदेश में २२ प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में २५ प्रतिशत, दिल्ली में ५० प्रतिशत, झारखंड में २० प्रतिशत, राजस्थान में २३ प्रतिशत, हरियाणा में ४० प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में १२ प्रतिशत सवर्ण जातियों के लोग हैं। इसके अलावा कुछ गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भी सवर्णों की संख्या ठीक समझी जाती है। जैसे असम में ३५ प्रतिशत, गुजरात में ३० प्रतिशत, कर्नाटक में १९ प्रतिशत, केरल में ३० प्रतिशत, महाराष्ट्र में ३० प्रतिशत, ओडिशा में २० प्रतिशत, तमिलनाडु में १० प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में ४८ प्रतिशत और पंजाब में ४८ प्रतिशत हैं। खैर जहां तक दूसरे दलों की बात की जाए तो वे भी इस प्रस्तावित बिल का विरोध नहीं करेंगे। लेकिन इन सब बातों से यह मान लेना कि बीजेपी को इसका बहुत अधिक फायदा मिल जाएगा, एक बड़ी भूल होगी। इसके पीछे सीधा सा कारण यह है कि जिन राज्यों में बीजेपी ने साल २०१४ में अच्छा प्रदर्शन किया था जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और कुछ अन्य रइनमें सवर्ण जातियां बीजेपी का मजबूत वोट बैंक रही हैं। सीएसडीएस का सर्वे बताता है कि हिंदी भाषी राज्यों में सवर्ण जातियों के वोटर्स ने तमाम चुनावों में बीजेपी को ही अपना मत दिया। इस कदम का बीजेपी को सिर्फ यह फायदा मिलेगा कि सवर्ण जातियों के वो वोटर बीजेपी से नाराज होकर उससे दूर जाने लगे थे वे वापस लौट आएंगे। हाल ही में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी को मिली हार के पीछे यह एक बड़ी वजह मानी गई थी कि इन राज्यों में सवर्णों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया था।
कितने सवर्णों को आरक्षण ?
प्रस्तावित बिल में आरक्षण के लिए जो मानक तय किए गए हैं उसका आधार इतना विस्तृत है कि उसमें सर्वण जातियों का एक बड़ा तबका समाहित हो जाएगा, अगर हम प्रस्तावित बिल के तय मानकों पर नजर डालें तो उसके अनुसार जिस परिवार की सालाना आय आठ लाख रुपए से कम होगी, या जिनके पास पाँच हेक्टेयर से कम कृषि योग्य जमीन होगी, या जिनके पास एक हजार वर्ग फुट से कम का मकान होगा या जिनके पास नगरपालिका में शामिल १०० गज से कम जमीन होगी या नगरपालिका में ना शामिल २०० गज से कम जमीन होगी, ये तमाम लोग आर्थिक आधार पर मिलने वाले आरक्षण के योग्य होंगे। इस तरह के सर्वण जातियों के लगभग ८८५ से ९० प्रतिशत लोग इस आरक्षण को प्राप्त करने के योगय हो जाएंगे। इन सबके बीच अगर उन राज्यों की बात की जाए जहां बीजेपी का बहुत अधिक जनाधार नहीं है जैसे केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना, यहां इस कदम का बहुत कम असर पड़ेगा। एक तरह से साफ है कि बीजेपी को इन राज्यों में तो अपने इस मास्टर स्ट्रोक का बहुत अधिक फायदा नहीं मिलने वाला। कुछ ओर राज्य भी हैं जहां साल २०१४ के चुनाव में बीजेपी बहुत अधिक मजबूत नहीं थी, जैसे पश्चिम बंगाल या ओडिशा। इन राज्यों में ऐसे संकेत मिले हैं कि बीजेपी का वोटबैंक कुछ हद तक बढ़ा है। लेकिन इसके पीछे सवर्ण जातियों का वोट नहीं है। इस वोट बैंक के बढऩे के पीछे असल में लोगों की सत्ताधारी दलों के प्रति नाराजगी है। हालांकि कुछ राज्यों में बीजेपी ने हिन्दू कार्ड के दम पर बहुत अहम बढ़त भी बनाई है, जिसमें असम एक बड़ा राज्य है। यह माना जा रहा है कि इन राज्यों में बीजेपी को २०१४ के मुकाबले २०१९ में अधिक वोट मिल सकते हैं, लेकिन इसके पीछे सवर्ण जातियों का वोट नहीं होगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बीजेपी सरकार का सवर्ण जातियों को आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला उसे बहुत अधिक राजनीतिक लाभ तो नहीं ेने वाला। बीजेपी को इससे अधिक फायदे की उम्मद नहीं करनी चाहिए।
०-संजय कुमार, निदेशक, सीएसडीएस (सुबह सवेरे के कालम ”प्रसंगवश” से साभार)
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