साध्वी प्रज्ञा भाजपा को ले डूबेगी

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०-विवेक सक्सेना
जब मैंने पिछले दिनों आतंकी हमले में मारे गए एएसपी हेमंत करकरे के बारे में साध्वी प्रज्ञा के विचार सुने तो मुझे लगा कि उन्हें ‘लेडी दिग्विजय सिंह’ कहना बेहतर रहेगा क्योंकि वे पहले बोलती हैं व फिर उसके ाबरे में सोचती हैं। उनकी तुलना दिग्विजय सिंह से इसलिए कर रहा हूं क्योंकि वे न केवल उनके सामने भोपाल से चुनाव लड़ रही हैं बल्कि अक्सर वे उनकी तरह ही अत्यंत बेहूदे बयान देती हैं जोकि उनकी पार्टी को फायदा कम व नुकसान ज्यादा पहुंचाते हैं। साध्वी के इस बयान की आलोचना होने लगी तो राष्ट्रवाद पर एकाधिकार जताती आई भाजपा ने खुद को उनके इस बयान से अलग कर लिया तब उन्होंने कहा कि मेरा निजी बयान था इससे अगर विरोधियों को बल मिल रहा है तो मैं इसे वापस लेती हूं व माफी मांगती हूं। यह एक निजी पीड़ा थी। बात तब की है जब मैं जनसत्ता में था और एक पड़ोसी अंग्रेजी के अखबार की महिला पत्रकार के साथ अक्सर रिपोर्टिंग करने जाता था। वे थोड़ी तुनुक मिजाज की थी। एक बार वे कई दिनों तक दफ्तर नहीं आईं और जब मैंने उनकी जगह रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार से उनका हाल-चाल पूछा तो उसने छूटते ही मुझसे कहा तो आप ‘लेडी हनुमान’ के बारे में बात कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि आफिस के लोग उसकी ऊल-जलूल हरकतों के कारण उसे इस विश्लेषण से बुलाते हैं। यह घटना मुझे इसलिए याद आ गई कि जब मैंने पिछले दिनों आतंकी हमले में मारे गए एएसपी हेमंत करकरे के बारे में साध्वी के बारे में साध्वी प्रज्ञा के विचार सुने तो मुझे लगा कि उन्हें ‘लेडी दिग्विजय सिंह’ कहना बेहतर रहेगा क्योंकि वे पहले बोलती हैं व फिर उसके बारे में सोचती हैं। उनकी तुलना दिग्विजय सिंह से इसलिए कर रहा हूं क्योंकि वे न केवल उनके सामने भोपाल से चुनाव लड़ रही हैं बल्कि अक्सर वे उनकी तरह ही अत्यंत बेहूदे बयान देती है जोकि उनकी पार्टी को फायदा कम व नुकसान ज्यादा पहुंचाते हैं। जब दिल्ली के बाटला कांड में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के अफसर मोहन चंद्र शर्मा मारे गए थे तब दिग्विजय सिंह ने इस मामले पर संदेह जताया था। मुंबई आतंकी हमले में आतंकियों का हाथ होने पर शक जताया और जबरन दिवंगत करकरे का नाम बीच में घसीटा। एक बार तो एक भाजपा नेता ने कहा कि हम लोग सत्ता में आए तो उन्हें भारत रत्न देंगे क्योंकि वे कांग्रेस को कम से हमें ज्यादा फायदा पहुंचाने ाले नेता हैं। वैसे मेरी बाबा-बबियों (साध्वियों) के बारे में अच्छी राय नहीं है। ये लोग बोलते पहले हैं व सोचते बाद में है। अगर आप इतिहास पर नजर डालें तो हिंदू धर्म के ऋषि मुनियों की इस तरह की गई मूर्खताओं के दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे। वे तब भी समाज में असामान्य मानी जाने वाली हरकतें करते थे। रावण भी बाबा का रूप धर कर सीता को हरने के लिए आया था। भगवान राम ने अपने पैरों से अपने पति साधु के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार किया था। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर उर्फ प्रज्ञा सिंह कुशवाहा देश की एकमात्र ऐसी लोकसभा उम्मीदवार हैं जिन पर आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधियां रेाकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा चलने के बावजूद राष्ट्रीय सत्तारूढ़ दल भारत ने १७ अप्रैल २०१९ में दल में शामिल करने के साथ ही भोपाल से कांग्रेसी उम्मीदवार दिग्विजय सिंह के खिलाफ अपना उम्मीदवार बना दिया। प्रज्ञा सिंह ने अपनी मालेगांव आतंकी कांड में गिरफ्तारी के बाद की गई पूछताछ की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने उन्हें काफी यातनाएं दी। असहनीय गालियां दीं तो मैंने उनसे कहा तेरा सर्वनाशव हो। जिस दिन मैं गई थी उसका सूतक लग गया था। ठीक सवा महीने में जिस दिन उसका सूतक खत्म हुआ उसे आतंकियों ने मार दिया। वह मेरे श्राप से आतंकियों के शिकार बने। मालेगांव कांड को तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं पी. चिदंबरम ने हिंदू आतंकवाद का नाम दिया था। जबकि करकरे मुंबई आतंकी घटना में मारे गए थे व सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वीरता के लिए अशोक चक्र दिया था। जब दिग्विजय सिंह के करीब थे। जब साध्वी के इस बयान की आलोचना होने लगी तो राष्ट्रवाद पर एकाधिकार जताती आई भाजपा ने खुद को उनके इस बयान से अलग कर लिया तब उन्होंने कहा कि यह मेरा निजी बयान था इससे अगर विरोधियों को बल मिल रहा है तो मैं इसे वापस लेती हूँ न माफी मांगती हूँ। यह एक निजी पीड़ा थी। चुनाव आयोग ने इन्हें इस बयान के लिए नेाटिस भी भेजा है। अब जरा मालेगांव मामला जाना जाए। आज से करीब ११ साल पहले २० सितम्बर २००९ को महाराष्ट्र के शहर मालेगांव में शकील गुड्स ट्रांसपोर्ट कंपनी के सामने खड़ी एक एलएमएल फ्रीडम मोटर साईकिल में हुए बम विस्फोट से छ: लोग मारे गए थे व १०० से ज्यादा घायल हो गए थे। उस कांड की महाराष्ट्र एंटी टेरेरिस्ट स्क्वैड के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे ने जांच की थी जोकि बाद में मुंबई में लश्करे तैएबा के आतंकी हमले में अफजल कसाब के हाथों मारे गए थे। उन्होंने पता लगाया कि जिस मोटर साकिल में विस्फोट हुआ था वह प्रज्ञा ठाकुर की थी। जांचकर्ताओं ने इस सिलसिले में सेना के अधिकारी ले. जर्नल प्रसाद पुरोहित, रमेश उपाध्याय समेत कई लोगों को पकड़ा। इसमें हिंदू संगठन स्वाभिमान भारत के शामिल होने का नाम भी सामने आया। बाद में एटीएस ने २१ अप्रैल २०११ की मुंबई की मकोका अदालत में महाराष्ट्र संगठित गिरोह कानून अधिनियम के तहत साध्वी समेत १४ लोगों के खिलाफ अभियोग पत्र दाखिल किया। इस संबंध में स्वामी असीमानंद को भी गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप था कि अभियुक्तों ने मुसलमानों के जेहाद का बदला लेने के लिए यह किया था। बाद में केंद्र सरकार ने २०१० के समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद व अजमेर दरगाह कांड के आतंकी कांडों की जांच करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए को यह जांच भी सौंप दी। पुलिस का कहना था कि जिस मोटर साकिल में विस्फोट हुआ था यह साध्वी की थी। वह इस कांड में शामिल अभियुक्तों को अपनी मोटर साइकिल चलाने के लिए देती थी। जांच के दौरान २०१४ में सरकार बदल गई व मोदी सरकार सत्ता में आ गई। एनआईएस ने २०१६ में अदालत में दायर अपनी चार्जशीट में प्रज्ञप व कर्नल पुरोहित के खिलाफ लगाए गए आरोपों को हटा दिया। कहा कि वे काफी कमजोर व सतही थे। हालांकि उस समय एनआईए की स्पेशल पब्लिक प्रोसीट्यूटर रोहिणी संलियान ने यह खुलासा किया था कि एजेंसी द्वारा उस पर इस मामले में धीरे चलने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। एजेंसी ने कहा कि मोटर साइकिल भले ही साध्वी की थी मगर इस्तेमाल दो अन्य अभियुक्त कर रहे थे व वहीं मरम्मत का खर्च उठा रहे थे। यह मामला अभी चल ही रहा था कि भाजपा ने दिग्विजय सिंह के खिलाफ उन्हें अपना उम्मीदवार बना दिया। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए बाटला कांड का जिक्र करते हुए दिग्विजय सिंह व सोनिया गांधी पर सवाल उठाउ रहे हैं। जो हो कोई बाबा बाबियों से सामानय व्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकता है?
०-नया इंडिया के कालम ”रिपोर्टर डायरी” से साभार)
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