सरकारी तोता बनाम सीबीआई जांच और परिणाम

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०-विजय तिवारी
नीयत और नाकामी के बाद भी अदालत ने अफसरों के विरुद्ध कार्रवाई का कोई आदेश नहीं दिया क्यों? आम तौर पर देश के महत्वपूर्ण आपराधिक मामले इस जांच एजेंसी को सौंपी जाते हैं। इस उम्मीद के साथ कि यह स्थानीय पुलिस और राज्य की सीआईडी से बेहतर तरीके से जांच करके दोषियों को दंड दिलाने में सफल होगी परंतु अभी हाल में जिस प्रकार सीबीआई संगठन में आपस में जूतम-पैजार हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष गया, उससे यह बात साफ हो जाती है कि यह सरकार का तोला नहीं, वरन टामी है जिसका इस्तेमाल सरकार अपने विरोधियों या आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए करती है। मनमोहन सिंह सरकार के समय टेलीफोन स्पेक्ट्रम बेचने के समय विरोधी दलों ने इसमें भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था। यहां तक कि तत्कालीन लेखा महापरीक्षक ने भी अपने अनुमान में अरबों रुपये का घाटा होने का दावा किया था परंतु जब वह मामला दिल्ली की सबीआई की स्पेशल कोर्ट केक जज ओपी सैनी के सामने लाया गया तब उन्होंने अपने फैसले में अभियुक्त ए राजा, कोनिमोझी आदि को सम्मान बरी कर दिया। तब पहली बार लगा कि राजनीतिक रूप से लगाए गए आरोपों और लेखा परीक्षक जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोग सेवानिवृत्त होने के बाद अपने भविष्य के लिए कैसे-कैसे दावे करते हैं। जिन्होंने अरबों रुपये की हेराफेरी का अनुमान लगाया था यह अदालत में कानून और दस्तावेजों के अभाव में कितना लाचार निकला। आज वे क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की एक समिति के अध्यक्ष बन बैठे हैं? इस आलेख का कारण गुजरात के सोहराबुद्दीन हत्या मामले से उपजा है जिसमें महाराष्ट्र की स्पेशल कोर्ट ने फैसले में कहा था कि सीबीआई की जांच नेताओं को फंसाना था। जज एसजे शर्मा ने ३५० पेज के अपने फैसले ंमेंसभी २२ आरोपियों को बरी कर दिया यानि २जी स्पेक्ट्रम की पुनरावर्ति हुई। जबकि दोनों मामले राजनीतिक व्यक्तियों से संबंधित थे। २जी मामले में तो सीबीर्आ अदालत ने यहां तक कहा था कि हफ्तों अदालत में बैठे इंतजार करते रहे कि सीबीआई कोई सबूत या दस्तावेज पेश करेगी, परंतु वे सिर्फ कुछ लोगों के कथन तक ही सीमित रही। वित्तीय गड़बड़ी से संबंधित कोई डॉक्यूमेंट अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके अभाव में सभी आरोपियों को बरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इस मामले (सोहराबुद्दीन) में भी अदालत ने एजेंसी की जांच की प्रक्रिया को खारिज किया है। अभी सीबीआई पूर्व वित्त मंत्री चिदम्बरम की जांच कर रही है। अक्सर खबर आती है कि उन्हें जांच के लिए मुख्यालय में बुलाया गया और घंटों पूछताछ की गई। फिर उनकी गिरफ्तारी की अर्जी पर चिदम्बरम को जमानत मिलती है। पिता-पुत्र दोनों को पूछताछ के नाम पर खबर का मुद्दा बनाया जा रहा है। अब आरोप लगाकर अदालत में चार्जशीट के नाम पर आरोपों की फेहरिस्त दाखिल की गई है। इसके विपरीत भी एक चर्चित मामला है हैदराबाद की मक्का मस्जिद ब्लास्ट का जिसमें एनआईए स्पेशल कोर्ट के जज रवींद्र रेड्डी ने पांच अल्पसंख्यकों को सजा सुनाई थी। इस मामले का खास पहलू यह रहा कि रेड्डी फैसला सुनने के तुरंत बाद अवकाश पर चले गए। फिर तीन दिन बाद खबर आई कि उन्होंने उच्च न्यायालय को अपना त्याग पत्र भेज दिया। उसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ले ली। एक और जांच एजेंसी की कार्रवाई और उसकी जांच की ईमानदारी और नीयत पर सवाल खड़े हुए हैं। फिलहाल तो सीबीआई संगठन में सुरक्षा सलाहकार डोवाल साहब के हस्तक्षेप के सार्वजनिक खुलासे के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय ने कोई टिप्पणी नहीं की, यही आश्चर्य की बात है। दूसरा जब जज सैनी ने साफ-साफ कहा कि अभियोजन पक्ष ने कोई सबूत पेश नहीं किया तब लगता है यूपीए सरकार में दाखिल मुकदमे की जांच एनडीए सरकार में भी लाचार रही। दूसरी ओर जज एसजे शर्मा की टिप्पणी कि सीबीआई का मकसद नेताओं को फंसाना था, बहुत गंभीर है। यह देश की इस जांच एजेंसी की प्रतिष्ठा पर बदनुमा धब्बा है। वैसे सीबीआई की जांच की प्रक्रिया पर दाग-धब्बे तो ेपहले से भी हैं जिसमें एक तोते वाला भी है।
०-नया इंडिया के कालम ”आईना” से साभार)
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