सरकारी गलत नीतियों के चलते दस लाख युवा हर माह श्रम शक्ति में हो रहे हैं शामिल

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भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। देश में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया की बात करें तो दीर्घावधि कीढांचागत कमी का एक प्रमुख संकेतक यह भी है कि हम जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में रोजगार का विस्तार नहीं कर सकें। लगभग दस लाख युवा हरमाह श्रम शक्ति में शामिल होते हैं। एक अन्य परेशान करने वाली बात यह है कि वार्षिक वैश्विक दासता सूचकांक में भारत को निरंतर ऊँचास्थान मिलता रहा है। इस सूचकांक का प्रकाशन आस्ट्रेलिया कामानवधिकार समूह ‘वॉक फ्री फाउंडेशन करता है। लंबे समय से व्याप्त वैश्विक मंदी के चलते वैश्विक स्तरपर आधुनिक दासता में काफी इजाफा हुआ है। सन २०१३ में जहां कुल तीन करोड़ लोग इस दायरे में थे, वहीं २०१६ में यह संख्या बढ़कर ४.६ करोड़ होगई। तादाद के मामले में भारत लगातार अव्वल बना हुआ है। वर्ष २०१६ में देश में अनुमानत: १.८३ करोड़ लोग दासता के जाल में फंसे हुए थे। यह दुनिया भर के मिलेजुले आंकड़े के ४० फीसदी के बराबर था। वहीं वर्ष २०१३ में यह तादाद १.४० करोड़ थी। नीति निर्माता कह सकते हैं कि यह रैकिंग ठीक नहीं है क्योंकि देश की आबादी बहुत ज्यादा है। परंतु दो बातें हैं जो इस संदर्भ में कही जा सकती हैं। पहली बात, भारत ने आधुनिक दामों की तादाद में बहुत इजाफा किया है। चीन की आबादी हमसे अधिक है लेकिन इस मामले में वह दूसरे स्थान पर है। वर्ष २०१३ में उसके आधुनिक दासों की तादाद २९ लाख थी और २०१६ में यह बस ३३ लाख तक पहुंची। यानी महज तीन लाख का इजाफा। आर्थिक मंदी में धीमापन आने के बावजूद उसके सुधारों की मजबूती और गहराई को समझा जा सकता है। दूसरी बात, सर्वेक्षण का शायद, अधिक अहम पहलू यह है कि आबादी के प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो भारत चौथे नंबर पर है। हमारी आजादी के १.४ फीसदी लोग बेहद खराब हालात में काम कररहे हैं। जबकि चीन की बात करें तो वह इन्हीं शर्तों के तहत ४०वें स्थान पर है। जबकि, चीन के पास दुनिया की विशालतम आपूर्ति श्रृंखलाओं मेंसेएकहै। इस अपेक्षाकृत ज्यादा प्रासंगिक मानक पर भारत उत्तर कोरिया, उजबेकिस्तान, कंबोडिया और कतर के करीब है। इन देशों को सूचकांक के मानक पर क्रमश: पहला, दूसरा, तीसरा और पांचवां स्थान मिला है। यह सच है कि कि देश के प्रवासी बड़ी तादाद में विदेशों में काम कर रहे हैं और अगर उनको इस सूचकांक में शामिल किया जाए तो भारत इस सूची में भी अव्वल हो सकता है। केरल, उत्तरप्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं जहां से बहुत बड़ी तादाद में श्रमिक पश्चिम एशिया के उन देशों में जाते हैं जो दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार हैं। महज तीन साल में देश के ४० लाख लोगों का खराब श्रमिकों की श्रेणी में शामिल होना दोहरी चिंता का विषय है क्योंकि यह बढ़ोतरी देश के कानून प्रवर्तन संस्थानों की कमी की ओर भी इशारा करती है। शीर्ष पांच देशों में अपने साथियों के उलट भारत में इसके खिलाफ बकायदा कानून है। उजबेकिस्तान में तो सरकार समर्थित कार्यक्रम चल रहा है जहां बच्चों को सालाना कपास की खेती के काम में लगाया जाता है। जबकि भारत ने बंधुआ मजदूरी को सन १९७० के दशक में ही प्रतिबंधित कर दिया था। इसके बाद के सालों में भी उसने मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति और जबरन शादियों को रोकने के लिए कानून बनाए। इन नए जमाने के दासों में से अनेक महिलाएं और बच्चे भी हैं जो सबसे संवेदनशील तबका है। यूएनडीपी के अध्ययन के मुताबिक अगले ३५ सालों में भारत में रोजगार का बड़़ा संकट होगा। इस दौरान ऐसे जबरिया श्रमिकों की तादाद में और इजाफा होगा। भारत अब आर्थिक वृद्धि को लेकर नए प्रयोग करने की स्थिति में नहीं है।

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