सबका, साथ सबका विकास का नारे पर चल रही कमलनाथ सरकार

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। १५ वर्षों तक सत्ता का वनवास भोगने वाली कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने अपने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की माली हालत सुधारने के लिये लगता है भाजपा का सबका साथ, सबका विकास का नारा अंगीकृत कर ट्रांसफर उद्योग के नाम पर हर किसी की कमाई का जरिया खोज रखा है तभी तो सत्ता में काबिज होते ही भाजपा के शासन में १५ वर्षों तक रहे प्रशासनिक अधिकारियों को भाजपा की मानसिकता वााले अधिकारी मानकर प्रदेश के सारे कलेक्टरों का ट्रांसफर करने और उसमें संशोधन करने का भी जिस तरह का सिलसिला चला उससे तमाम शंकायें जन्म लेने लगी और लोग यह समझने लगे कि शायद शिवराज सरकार के १३ वर्षों तक जिस प्रकार सत्ता की अदृश्य देवी के वर्चस्व के चलते प्रदेश में वल्लभ भवन से लेकर मैदानी स्तर तक के जो अधिकारियों के फेरबदल का लेनदेन का दौर चला वही प्रथा कमलनाथ सरकार ने भी अपनाकर, लगता है कि शिवराज सरकार की वही प्रथा अपनाकर प्रशासनिक फेरबदल के नाम पर तबादला उद्योग की शुरुआत कर दी। मजे की बात यह है कि इस भारी फेरबदल के चलते जिस तरह का खेल अधिकारियों के तबादलों को लेकर चला वह भी कई तरह की शंकायें पैदा कर रही हैं और लोग इस नीति को लेनदेन के रूप में देख रहे हैं। सारे घर के बदल डालूं की तर्ज पर जिस तरह से कमलनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद आज ट्रांसफर हुआ और कल वापसी हुई परसों संशोधन का दौर जो चला उससे लोगों को यह लगने लगा कि यह सब खेल प्रशासनिक व्यवस्था सुधारने की आड़ में लेन-देन का खेल खेला जा रहा है और इसी खेल को आगे बढ़ाते हुए कमलनाथ मंत्रीमण्डल के कई मंत्री अपने नाते-रिश्तेदारों और बेटों व सत्ता के दलालों के साथ इस तरह भिड़ गए हैं कि कमलनाथ के कट्टर समर्थक सज्जन वर्मा के परिजनों ने तो राजधानी में एक होटल में विधिवत कमरे लेकर तबादला उद्योग के इस कारोबार में पद के अनुसार बोली लगाकर मनमाना पद चाहने का जो खेल खेला। उसके चलते लोक निर्माण विभाग में ईई के पद के तबादाले के लिये जो भाजपा सरकार में २५ लाख रुपये लगा करते थे अब वह कमलनाथ सरकार में बढ़कर ३५ से ४५ लाख तक पहुँच गये हैं। ऐसा नहीं कि इस खेल में सज्जन वर्मा के परिजन ही शामिल रहे, बल्कि राजधानी के मंत्री पीसी शर्मा के बेटे ने भी ट्रांसफर उद्योग में खूब हाथ साफ किए मजे की बात यह रही कि पहले दौर में चले इस ट्रांसफर उद्योग में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की कोई पूछ परख नहीं रही, हाँ केवल मंत्री के परिजनों और सत्ता के दलालों की अहम भूमिका रही तो इसी बीच काफी त्याग तपस्या और बलिदान के चलते बुंदेलखण्ड के निवाड़ी से विधायक बने बृजेन्द्र सिंह राठौर ने भी अपने पीए सिकरवार के माध्यम से आबकारी विभाग में जो वसूली का खेल खेला उसकी चर्चाएं आज भी विभाग में चटकारे लेकर चल रही हैं। तबादला उद्योग के इस गोरखधंधे में जहां मंत्रियों ने तो जमकर कमाई की है तो वहीं उनके निजी स्टाफ ने भी इस बहती गंगा में हाथ धोकर कमाई करने का मौका नहीं छोड़ा, स्थिति यह रही कि मंत्री से पटे सौदे के अनुसार अधिकारी का स्थानान्तरण तो होता ही था तो जिस अधिकारी के हटाकर उस अधिकारी को रखा जाता उस अधिकारी से मंत्री के स्टाफ सौदा करते थे और उसे भी मनचाही जगह पर भेजने के नाम पर अपनी जेबें भरते थे इस खेल में मंत्री इसलिये निजी स्टाफ से कुछ नहीं बोल पाये कि उनके पास तो एक ही बहाना है कि आपके ही कहने पर उसको बदलने के खेल में मंत्री के साथ-साथ निजी स्टाफ ने भी जमकर कमाई की अब कमलनाथ सरकार ने पाँच जून से जो तबादला नीति लागू की है उसके चलते अब मंत्रियों के बंगले पर भी इस भीषण गर्मी में अपने मनचाही जगह पर पदस्थापना कराने वालों का मेला दिखाई देने लगा है और यहाँ इस मेले में मौजूद लोगों के हाथों में आवेदन लिये मंत्रियों के घर पर डेरा डाले बैठे हैं वो साथ में स्थानीय विधायक को लेकर प्रभारी मंत्री तक की सिफारिश आ रहे हैं, दूर-दराज से मंत्री और विधायकों से नाते-रिश्तेदारी निकाल रहे हैं और कौन किस मंत्री से सिफारिश करने पर उनका काम बन जायेगा, तो वहीं इन सबके चलते मंत्रियों के बंगलों पर मौजूद मंत्री और अधिकारियों व निजी स्टाफ के दलाल भी सक्रिय हैं जो मनचाही पदस्थापना पाने वाले लोगों से सौदा करने में लगे हुए हैं। मंत्रियों के बंगलों पर लगे मेले में महिला और पुरुष के साथ-साथ छोटे-छोटे बच्चे भी देखे जा रहे हैं। दरअसल मनचाहे तबादले की मंशा लिये किसी का ट्रांसफर हो गया है तो कोई करवाने की जुगाड़ में आया है तो कोई ट्रांसफर निरसत कराने के लिये ऐडिय़ां घिसते हुए दलालों की तलाश खोजने में लगा हुआ है, राज्य शासन द्वारा तबादले का यह मौसम पाँच जून से शुरू होकर १५ जुलाई तक चलेगा, नई नीति के तहत प्रभारी मंत्री और एक जिले से दूसरे जिले के तबादले का अधिकार विभागीय मंत्री को सौंपा गया है तबादला नीति के तहत तबादलों की संख्या हालांकि तय कर दी गई है देखना यह है कि यह नीति कितनी सार्थक होती है, राज्य सरकार ने तबादलों से प्रतिबंध हटाने के बाद सरकारी कर्मचारियों की भीड़ मंत्रियों के बंगलों पर देखी जा रही है, हालांकि सरकार ने लोगों को राजधानी आने से रोकने के लिये ऑनलाइन आवेदन देने की सुविधा दी है लेकिन लोग यह मानकर चल रहे हैं कि ऑनलाइन सुविधा बिना भजकलदारम् के सफल नहीं होगी, इसलिये वह राजधानी आकर मंत्री के बंगले पर मंत्री और उनके निजी स्टाफ से जुड़े लोगों से सम्पर्क बनाने में जुटे हुए हैं कुल मिलाकर इस तरह के गोरखधंधे के चलते लगता है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस तबादला उद्योग के जरिये सबका साथ, सबका विकास का नारा को लागू करते हुए १५ वर्षों से सत्ता का वनवास भोग रहे कांग्रेस के हर छोटे-बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के विकास के लिये यह नीति अपना रखी है और इसका सभी लाभ उठाने में लगे हुए हैं।

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