सपाक्स ने राजनीतिक दल क्यों बनाया

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०-गिरिजा शंकर
सपाक्स सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का संगठन था। वह अभी भी अस्तित्व में है, लेकिन सपाक्स के नाम से राजनीतिक दल क्यों बनाया गया और उसने सभी २३० विधानसभा सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान क्यों किया? राजनीतिक दल बनाने की घोषणा करते हुए उसके पदाधिकारियों ने इसके पीछे कोई तार्किक कारण दिया हो, मेरी जानकारी में नहीं है। मुझे लगता है कि उनके पास अपना नया राजनीतिक दल बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। एससी-एसटी अधिकारियों और कर्मचारियों का संगठन अजाक्स भी है। मैं समझता हूं कि यह संगठन काफी समय से अस्तित्व में है और इसे राजनीतिक कारणों से हर सरकारों का संरक्षण प्राप्त रहा है। हालांकि अजाक्स चुनावी राजनीति से हमेशा अलग ही रहा है। इसके समानांतर सपाक्स जैसा संगठन बनाने की पहल कभी नहीं हुई। सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण के सरकार के २००२ के आदेश को जब हाईकोट्र ने कुछ साल पहले निरस्त किया और इसे राज्य सरकार ने सुप्रीम कोट्र में चुनौती दी, तब सपासक्स नामक संगठन बनाने की सुगबुगाहट हुई। इसी दौरान अजाक्स के सम्मेलन में मुहावरे के तौर पर हो रही जब मुख्यमंंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कोई माई का लाल यह आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता, तब इसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई और सपाक्स का उदय हुआ। इसका स्वरूप पूरी तौर पर सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों तक सीमित था। इसकी संरचना अजाक्स को काउंटर करने के रूप में बनाई गई थी। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के इस संगठन को सरकार ने मान्यता नहीं दी या कहें मान्यता का मामला लम्बित रहा। अब तक भी मान्यता शायद उन्हें नहीं मिल पाई है। मान्यता भले ही न मिली हो लेकिन सपाक्स सक्रिय हो गया और सपाक्स-अजाक्स का विभाजन तेजी से उभरने लगा। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया, जिसमें एससी/एसटी एक्ट में कुछ संशोधनों की सिफारिश की गई थी। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले पर राजनीतिक इलाकों में बवाल मच गया और गैर भाजपाई दलों के साथ ही एनडीए के घटक दलों ने इसी एससी/एसटी वर्ग के खिलाफ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में विधेयक लाकर निरस्त करने की मांग की जाने लगी। केंद्र सरकार का भाजपा तो पहले से ही दलितों को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रही थी। भाजपा अध्यक्ष अमितशाह का समरसता अभियान इसी का हिसाब था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में विधेयक लाकर बदलने की सामान्य वर्ग में तीखी प्रतिक्रिया हुई। मध्यप्रदेश में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद दलितों द्वारा आयोजित बंद में हुई हिंसा में छ: लोगों मौत हुई थी। अब केन्द्र द्वारा विधेयक लाने पर सामान्य वर्ग ने भी बंद का आयोजन किया, जो हिंसक नहीं था। नौकरियों और पदोन्नति में आरक्षण को लेकर सामान्य वर्ग में नाराजगी दबी हुई थी, लेकिन हाईकोर्ट द्वारा प्रमोशन में आरक्षण को अवैध करार देने के बाद सरकार को उसके खिलाफ रुख तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद मेंउलट दिये जाने के बाद सामान्य वर्ग की नाराजी मुखर होकर उभरी। जिसका परिणाम था, सपाक्स का एक राजनीतिक दल के रूप में सामने आना और सभी २३० सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान करना। मुझे लगता है सपाक्स के पास अपना राजनीतिक दल खड़ा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि सभी राजनीतिक दल सुप्रीमकोर्ट के फैसले के खिलाफ थे और संसद में सर्वसम्मति से उस फैसले को बदलने वाला विधेयक पारित हुआ था। लिहाजा वे किसी राजनीकित दल के साथ जुड़ नहीं सकते थे, क्योंकि सभी उनके खिलाफ थे। ऐसे में केवल दो ही विकल्प थे। चुनाव का बहिष्कार या नोटा का प्रयोग और दूसरा अपना खुद का राजनीतिक संगठन खड़ा करना। सपाक्स ने दूसरा विकल्प चुना। विधानसभा चुनाव के दो माह पहले गठित हुए किसी भी नये राजनीतिक संगठन के लिये बड़ी चुनावी सफलता के तौर पर मैं नहीं देखता। विशुद्ध राजनीति करने के उद्देश्य से गठित डीएस-चार ‘या बामसेफÓ को बसपा बनाने में काशीराम जैसे नेता को बरसों लग गये थे। सपाक्स अपने को केवल सवर्णों का संगठन नहीं मातने हुए अल्पसंख्यकों और पिछड़ा वर्ग को भी इसमें शामिल बताता है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर उक्त दोनों वर्ग सपाक्स का अंग अभी नहीं बन पाये हैं। सपाक्स में यदि पिछड़ा वर्ग जुड़ जाता है, तो यह संगठन बड़ी ताकत बन जाता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। इसलिये ऐसा नहीं लगता कि यह संगठन विधानसभा चुनाव में कोई कमाल दिखा पाएगा। मुझे तो इस बात पर भी भरोसा नहीं है कि सपाक्स भाजपा या कांग्रेस को कोई बड़ा नुकसान पहुंचाने की स्थिति में आ जाएगा। हां, इसकी टिकट से चुनाव लडऩे वाले व्यक्तिगत प्रभाव वाले प्रत्याशी बेहतर स्थिति में हो सकते हैं, जैसे निर्दलीय प्रत्याशी उभरते हैं। भाजपा या कांग्रेस में टिकट से वंचित नेता सपाक्स से जुड़कर चुनाव लड़ सकते हैं।
०-लेखक वरिष्ठ पत्रकार व चुनाव विश्लेषक हैं)
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