सत्ता की धमक; डरा-सहमा चुनाव आयोग… ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अनुसार देश में चुनावों के दौर में चुनाव आयोग सरकार से भी सर्वोपरि व शक्तिमान होता है, फिर मौजूदा लोकसभा चुनावों के समय आमतौर पर यह महसूस क्यों किया जा रहा है कि भारतीय चुनाव आयोग डरा-सहमा और सरकार के अधीन कार्यरत है? इसी चुनाव आयोग का एक वह सुनहरा कार्यकाल था, जब टी.एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे और प्रदेश के मुख्यमंत्रीगण उनकी अटैची उठाए नजर आते थे। किन्तु आज तो स्थिति एकदम विपरीत है और चुनाव आयोग की नजर सत्तासीनों की भृकुटी पर रहती है जो उनके इशारे का इंतजार करती रहती है, क्या यह मौजूदा सरकार द्वारा संवैधानिक संगठनों पर कब्जे के प्रयासों का असर तो नहीं? मौजूदा लोकसभा चुनावों को लेकर चुनाव आयोग शुरू से ही संदेह के घेरे में है, चुनाव आयोग ने जो लोकसभा के चुनावों के लिए करीब दो पहीने लम्बा सात चरणों में मतदान का कार्यक्रम जारी किया, इसी फैसले को लेकर चुनाव आयोग पर कई तरह के आरोप लगाए गए यहां तक कहा गया क सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ पहुंचाने और उसकी सुविधानुसार इतना लम्बा चुनाव कार्यक्रम जारी किया गया। चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ ही आदश्र आचार संहिता लागू हो जाने से राज्य सरकारों के कई जनहितैषी कार्यक्रमों पर विराम लग गया और देश की जनता की सही समय पर सरकार की आर्थिक सहायताएँ नहीं मिल पाई। फिर इसके बाद चुनाव आयोग पर यह गंभीर आरोप लगाए जाने लगे कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में आयोग निष्पक्ष नहीं है, सत्तारूढ़ दल प्रमुख व सरकार के नेतृत्व में खिलाफ पहुंचने वाली शिकायतों को नजर अंदाज करने का गंभीर आरोप चुनाव आयेाग पर लगाया गया, जबकि प्रतिपक्ष का आरोप है कि प्रतिपक्षी दलों के लोगों के खिलाफ शिकायतें प्राप्त होने पर चुनाव आयोग तत्काल सक्रिय होकर कार्यवाही करता है, किंतु प्रधानमंत्री व भाजपाध्यक्ष की दर्जनों शिकायतें मिलने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं करता और जब सुप्रीम कोर्ट निर्देश देता है तब भी शिकायत निर्मूल घोषित कर देता है, चुनाव आयोग ने शिकायतें सही पाए जाने पर भी कोई सख्त कार्यवाही करने की अपेक्षा कुछ घण्टों के लिए प्रचार पर रोक ही लगाई। आखिर चुनाव आयोग स्वयं गंभीर आरोपों के घेरे में आ रहा है? ताजे घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल में हुई चुनावी हिंसा, आगजनी व ईश्वरचन्द्र विद्या सागर की प्रतिमा भंजन की घटनाओं में चुनाव आयोग ने सिर्फ सरकार के कुछ अफसरों को इधर से उधर कर दिया तथा पश्चिम बंगाल में मतदान पूर्व प्रचार बंद करने की अवधि में बीस घण्टे का फेरबदल कर दिया, भारत में अब तक हुए चुनावों के दौर में चुनाव आयोग ने अनुच्छेद-३२४ का उपयोग पहली बार किया, किंतु इस फैसले को लेकर भी यह फिर विवादों में आ गया, क्योंकि सार्वजनिक चुनाव प्रचार की सीमा सिर्फ बीस घण्टे पहले की गई अर्थात नियमानुसार चुनाव प्रचार १७ मई की शाम ५.०० बजे बंद होना था, उसके बजाए १६ मई की रात को १०.०० बजे सार्वजनिक प्रचार प्रतिबंधित किया गया, इस पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व कांग्रेस का आरोप है कि १६ मई कोक प्रधानमंत्री जी की दो रैलियों के आयोजनों को दृष्टिगत रखते हुए चुनाव आयोग ने यह समयसीमा निर्धारित की, वर्ना चुनाव आयोग १५ मई की रात से ही यह प्रतिबंध लागू कर सकता था, साथ ही चुनाव आयोग पर एक गंभीर आरोप यह भी लगाया कि सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष के तीखे तेवरों व आरोपों के बाद चुनाव आयोग सक्रिय हुआ और ये फोरे कदम उठाए, जबकि तोडफ़ोड़, आगजनी व हिंसक कार्यवाही करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं व उनके दलों के खिलाफ आयोग ने कोई सख्त कार्यवाही नहीं की? इस तरह कुल मिलाकर भारतीय चुनाव आयोग जितना इस बार आरोपों के कटघरे में खड़ा नजर आया, उतना इससे पहले कभी नजर नहीं आया, शायद इसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं- या तो मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने सुनहरे भविष्य की चिंता या फिर मौजूदा सरकार द्वारा संवैधानिक संगठनों को अपने कब्जे में करने का असर?
०-नया इंडिया के कालम ”सवाल पारदर्शिता का” से साभार)
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