संविधान पर यह सरकार का हमला नहीं तो क्या … ?

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०-विजय तिवारी
देश में विगत चार वर्षों से समाज को धर्मों के नाम पर विभाजित करने के संगठित प्रयासों से सरकार के विरोध को देशद्रोह की संज्ञा पुलिस द्वारा की गयी है वह वास्तव में अभिव्यक्ति पर हमला है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जिस प्रकार गाय के हत्या के नाम पर गौर रक्षकों ने मुसलमानों से मारपीट कर उनकी हत्या की है उसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने इन्हीं शब्दों में व्यक्त किया है। अभी दो दिन पूर्व न्यायाधीश सीकरी ने भी मीडिया द्वारा मामलों का ट्रायल किए जाने रपर क्षोभ व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि प्राथमिक अदालत के फैसले पर अपील में संशोधन किए जाने अथवा उसे निरष्ट किए जाने को लेकर जजों के व्यक्तिगत जीवन पर आक्षेप किए जाते हैं। भेद या एक वर्ग एक खास निर्णय नहीं होने पर हम लोगों की निष्ठा पर प्रश्न खड़े करते हैं। संभवत: मोदी सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उनके विश्व हिन्दू परिषद द्वारा जिस प्रकार उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति शासन के आदेश को निरस्त किया तब पहली बार भारतीय जनता पार्टी के लोगों ने मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ के विरुद्ध कांग्रेसी मानसिकता होने का आरोप लगाया था। जैसे न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति शासन को निरष्ट करने का कोई यह पहला मामला था। ज्ञात हो एनटी रामाराव की सरकार को हटाने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने यह किया था। तब भी अदालत ने उस आदेश की निष्प्रभावी करार दिया था। फलस्वरूप तत्कालीन राज्यपाल रामलाल को इस्तीफा देना पड़ा था। तब तो किसी ने न्यायालय के फैसले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश नहीं की थी। यह प्रथा विगत विगत चार वर्षों से ही उपजी है मोदी सरकार या संघ के किसी आदमी (संघ में सदस्यता नहीं शिष्यता होती है) पर कानून की कार्रवाई की जाती है तब केंद्रीय सरकार तक हिल जाती है। केरल के कुन्नूर में आपसी लड़ाई में एक स्वयंसेवक की हत्या हुई। कहा जाता है कि वह सीपीएम के एक कार्यकर्ता की हत्या के मामले में अभियुक्त से जवाब तलब किया था। इतनी फुर्ती उन्होंने बुलंदशहर में विश्व हिन्दू परिषद की भीड़ द्वारा एक इंस्पेक्टर की हत्या में नहीं दिखाई जबकि यह उनके गृह राज्य का मामला था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपने चुनावी मूड में गैर बीजेपी राज्य में कानून व्यवस्था को अराजकता ही बताते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनका पद सारे देश के राज्यों के लिए समान है। वे सिर्फ अपनी सरकार के निर्णयों को (भले ही वे अतिरंजित रूप में प्रस्तुत किए गए हों) ही विगत ६० वर्षों में स्वर्णिम काल बताते घूमते हैं। उनके इस प्रयास को और उनकी यात्राओं को (जो बताई जाती हैं सरकारी, भले ही उनमें चुनाव प्रचार हो) कितना उचित माना जाए, यह प्रश्न पाठकों पर छोड़ता हूं। बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस देसाई मेमोरियल भाषण माला में बोलते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ की व्यथा मुंबई के कार्टूनिस्ट को प्रधानमंत्री का काटून बनाने पर देशद्रोह का अभियुक्त बनाने और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के तीन छात्रों कन्हैयाकुमार, अनिर्बान भट्टाचार्य तथा उमर खालिद पर देशद्रोह का मुकदमा चलाये जाने से संभवत: उपजी होगी। हालांकि बाद में पहले मामले में मुकदमा वापस लेना पड़ा। जेएनयू के मामले में तीन वर्ष पूर्व हुई तीनों की गिरफ्तारी में पुलिस नब्बे दिन में चार्ज शीट दाखिल नहीं कर पाई इसलिए इन तीनों को उच्च न्यायालय में जमानत मिल गई। अब तीन साल बाद जब अदालत में चार्ज शीट दायर करने पटियाला कोर्ट पहुंची तब जज ने इस आरोप में सरकार की आवश्यक अनुमति के बारे में पूछा तब पता चला कि पूरा केस बिना सरकार की मंजूरी के किसी ऊपर वाले के कनिर्देश पर ही अंजाम दिया गया है। स्त्री-पुरुष समानता का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सबरीमाला में सिर्फ एक वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर निषेध क्यों? धार्मिक अधिकार तो दोनों के बराबर हैं। अगर किसी महिला को उसके अधिकारों से वंचित किया जाता है तो यह संविधान के अनुच्छेद १४ और १५ का उल्लंघन है। यहां यह याद रखने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश दिए जाने के फैसले का कुछ दक्षिण पंथी संगठनों और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि अदालतों को भी धार्मिक रिवाजों में दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यह करोड़ों लोगों की मनोनीत सरकार के मध्य का सवाल है। अब सबरीमाला देवस्थानम द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश को स्वीकार करने पर अमित शाह क्या बोलेंगे? कर्नाटक और महाराष्ट्र में कलबुरगी और गौरी लंकेश की हत्या के पीछे गोवा की सनातन संस्था का हाथ होने का शक पर भी जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने और लिखने वालों की आवाज को दबा देना संविधान का अपमान है। बदलते समय में हमारे मूल्यों में बदलाव आएगा जो सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर होगा। मोदी और बंगाल सरकार के मध्य चल रही रस्साकशी में सीबीआई की कारस्तानी का जवाब वहां की पुलिस और सुप्रीम कोट्र के फैसलों से मिल रहा है:- (१) जिस सारदा चिटफंड घोटालेक के लिए कलकत्ता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार और कुनाल घोष से तीन दिन से शिलांग में सवाल-जवाब किए जा रहे हैं, उसमें सीबीआई ने दो लोगों मोहता और एमपाी सिंह को हिरासत में लिया हुआ है। सिंह को २४० करोड़ की सम्पत्ति को भी कुर्क कर लिया है। हालांकि अभी ऐसे कोई आदेश अदालत से नहीं हुए हैं। इसी मामले में पूर्व आईपीएस अफसर भारती घोष ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी कि उन्हें दुश्मनी के कारण मामता सरकार फंसा रही है। इसलिए न्याय हित में इस मामले की जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट खुद करे। उनकी इस प्रार्थना को प्रधान न्यायाधीश गोगोई की बेंच ने ठुकरा दिया। भारती ने सप्ताह भर पूर्व ही भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता दिल्ली में ली थी। (२) बॉम्बे हाईकोर्ट ने कर्नल पुरोहित की याचिका को खारिज कर दिया है। गौरतलब है कि वे मालेगांव बमकांड में मुख्य आरोपी हैं। मोदी सरकार ने उन पर इतने गंभीर आपराधिक मुकदमे के बावजूद उन्हें सेना में वापस भेज दिया था। उन्होंने अदालत से प्रार्थना की थी कि पुलिस द्वारा उनके विरुद्ध दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दे। जिस पर अदालत ने कोई राहत नहीं दी और उच्च न्यायालय में अपील दाखिल करने पर भी रोक लगा दी। (३) तृणमूल कांग्रेस के सांसद रहे मुकुल रॉय, जो सारदा चिट फंड घोटाले में एक अभियुक्त हैं और जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के सदस्य भी हैं उनसे सीबीआई द्वारा पूछताछ नहीं किए जाने पर कई बार सवाल उठाए गए परंतु सीबीआई ने इसे रुटीन बताया। लेकिन वहीं बंगला पुलिस ने अब उन्हें तृणमूल विधायक बिस्वास की हत्या में अभियुक्त बनाया है। अब सीबीआई की गिरफ्त से तो भाजपा में जाने से बेचे थे पर बंगाल पुलिस से कैसे बचेंगे? (४) भारतीय जनता पार्टी को कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता सरकार के आदेश के विरुद्ध याचिका पर नसीहत देते हुए कहा है कि सरकार ने छात्रों की परीक्षा के कारण फरवरी से मार्च के माह में लाउड स्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा रखा है जो बच्चों के जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बीजेपी की इस दलील को नामंजूर कर दिया कि इस प्रतिबंध से लोकसभा चुनावों पर बहुत असर पड़ेगा। अदालत ने कहा कि चुनाव प्रचार से ज्यादा महत्वपूर्ण परीक्षाएं हैं और बीजेपी को एक और पराजय का सामना करना पड़ा।
०-नया इंडिया के कालम ”आईना” से साभार)
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