संभव नहीं है सवालों पर सीलिंग, सरोकारों का सीमांकन

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०-उमेश त्रिवेदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जबरदस्त जीत के बाद देश में उस वैचारिक-विमर्श को घेरने के सघन प्रयास शुरू हो गए हैं, जो जनता के सरोकारों से जुड़े सवालों को उत्प्रेरित करते हैं अथवा सैद्धांतिक-अहमियतों को बयां करते हैं। यह दौर अवाम की बुनियादी जरूरतों की पड़ताल करने वाले सवालों को खौफजदा करने की कोशिश का दौर है। देश में लोकसभा चुनाव के दरम्यान लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर जो चिंताएं सामने आ रही थीं अथवा समाज में बेचैनी का जो आलम महसूस हो रहा था, वो नदारद सा है या चुनावी सफलताओं के मंगल-गानों की ओट में चला गया है। फिर भी सवाल अभी जिंदा है। सवालों का जिंदा होना ही किसी लोकतंत्र के जिंदा होने की निशानी है, सवालों का सत्ता के सामने बने रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी है। इसीलिए सवालों को न तो मारना चाहिए और ना मरने देना चाहिए। वैसे भी सवावलों के मारने की चाहे जितनी कोशिशें की जाएं, लोकतंत्र में सवाल कभी मरते नहीं हैं… सवाल कभी गुमते नहीं हैं…. सवाल कभी लावारिस नहीं होते हैं… सवाल कभी गुस्साते नहीं हैं… सवाल कभी गिड़गिड़ाते नहीं हैं… सवालों की तासीर एक होती है, कभी बदलती नहीं है… सवाल हमेशा जिंदा रहते हैं। इसलिए वो सभी सवाल पूरी शिद्दत से लोगों के जहन में जमा हैं, जो चुनाव के दरम्यान लोगों ने पूछे थे। सवालों को खामोश करने के मायने यह नहीं है कि देश-काल और परिस्थितियों के अनुसार वो नए पैरहन अथवा नई शब्दावली में कभी भी सत्ता के रूबरू खड़े नहीं होंगे। लोकतंत्र में मिलने वाले किसी भी जनादेश का यह मतलब नहीं होता है कि जीतने वाले उन सवालों के उत्तरदायित्व से मुक्त हो गए हैं, जो जनता की जरूरतों से जुड़े हैं। लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की प्रचंड विजय के बाद यह मान लेना मुनासिब नहीं होगा कि लोगों में असंतोष नाम की कोई चीज नहीं बची है। अथवा रफाल का मामला रफा-दफा हो चुका है। इसे भी दुष्प्रचार मानकर खारिज करना संभव नहीं है कि देश में बेरोजगारी की समस्या का समाधान हो चुका है। देश के किसानों में कोई नाराजगी नहीं है या गांव खेती-किसानी की समस्याओं से उबर चुके हैं। साफ-साफ दिख रहा है कि युवाओं के पास रोजगार नहीं है। किसानों को उनकी उपज का समुचित और लाभदायक मूल्य नहीं मिल रहा है। किसानी महंगी होती जा रही है और खेती की उपज मिट्टी मोल बिकने को मजबूर है। महिलाओं के हालात वैसे ही हैं जैसे पहले थे। वंचित तबकों की समस्याओं को पहले की तरह ही अनसुना और अनदेखा किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों को लेकर कटाक्ष और कटुता का नया दौर शुरू हो चुका है और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का पुराना खेल यथावत चल रहा है। आतंकवाद के मसले निपटने का काम अभी भी बाकी है। कतिपय राजनेता मानते हैं कि भाजपा की प्रचंड विजय के बाद ये सभी सवाल गैर-मौजूदं हो गए हैं। सत्ताधीशों के सामने इन्हें उठाना लकीरें पीटने जैसा निरर्थक मसला है। अपनी महाविजय के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कथन गौरतलब है कि देश के राजनीतिक-पंडित और जानकार लोग इस चुनाव में जनता का मर्म समझने में नाकाम रहे हैं। वो आगे नसीहत देते हैं कि अब उन्हें अपने सोचने के तौर-तरीकों को बदलना होगा। यहां मोदी का इशारा उन लोगों की ओर था, जो उनसे असहमत थे अथवा सरकार के कार्य-क्लापों पर सवाल खड़े करते थे। जाहिर है कि प्रधानमंत्री के इस कथन मेूं अन्तर्निहित राजनीति का कूट-तत्व और कटाक्ष जहां विमर्श के दायरों और दिशाओं को अपनी ओर मोडऩे की खूबसूरत शाब्दिक रणनीतिक कवायद है, वहीं एक सत्तारोही विजेता के मिजाज का दिग्दर्शन भी है। यह गर्वीलापन लोकतांत्रिक विमर्श के दायरों को सीमित करता है और टोकता भी है। सवालों पर सीलिंग और सरोकारों का सीमांकन संविधान की आत्मा को आहत करने वाला है। यह कभी भी नए भारत की परिकल्पनाओं का हिस्सा नहीं हो सकता। देश-काल और परिस्थितियेां का वैचारिक-रूपांतरिण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसीलिए समयानुसार विमर्श के तरीके स्वत: बदलते रहते हैं और अभिव्यक्तियों का नवाचार होता रहता है। लोकसभा चुनाव में भाजपा की महा-विजय के प्रमुख उत्पादक के रूप में उत्पन्न राष्ट्रवाद की प्रखरता लोकतंत्र की नई इबारत गढ़ रही है। लोकतंत्र में मूर्त राजनीति और अमूर्त राजनीत की भंगिकामाओं के रेखांकन आसान नहीं है, क्योंकि वर्तमान राजनीति आशंकाओं की उन परिस्थितियों का निराकरण नहीं कर पा रही है, जो विभेद पैदा करती है।
०-सुबह सवेरे के कालम ”पहली बात” से साभार)
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