संतों के कोप से बचने का रास्ता ढूंढ रहे शिवराज

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०- अरुण पटेल
मध्य प्रदेश में पांच साधु-सन्तों को आनन-फानन में राज्यमंत्री का दर्जा देकर शिवराज सिंह चौहान ने साधुओं को साधने की जो जुगत भिड़ाई थी वह कम्प्यूटर बाबा के नाराज होने, राज्यमंत्री का दर्जा वापस करने और शिवराज सरकार विरोधी उग्र तेवर दिखाने से उल्टी पड़ती नजर आ रही है। चुनाव सिर पर हैं और साधु-सन्तों में दो धड़े हो गए हैं। शिवराज को लेकर वे आमने-सामने हैं। एक धड़े ने तो कांग्रेस का साथ देने का इरादा भी जता दिया है। नर्मदा नदी में अवैध उत्खनन का मामला साधु-सन्त न उठायें इसलिए उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा देकर उनमें पनप रहे असंतोष को थामने की कोशिश सरकार ने की थी। कम्प्यूटर बाबा ने अब नये सिरे से इसी मुद्दे को जोरशोर से उठाना शुरु कर दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ भी यह भांपते हुए कि इसका राजनीतिक फायदा कैसे उठाया जाए बीच में कूद पड़े हैं और उन्होंने नर्मदा संरक्षण को लेकर नर्मदा सेवा यात्रा की हकीकत बताने के लिए साधु-सन्तों को एक खुला पत्र भी लिख दिया है। ऐसे हालातों में जबकि विधानसभा चुनाव के ऐन मौके पर साधु-सन्त शिवराज को लेकर दो खेमों में बंट गए हैं और कम्प्यूटर बाबा ने जब मोर्चा खोल दिया है तो देखने की बात यही होगी कि भाजपा और शिवराज अब नाराज साधु-सन्तों को कैसे मनाकर शान्त करते हैं, ताकि उनका असंतोष भाजपा की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित न कर पाये। ऐसे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हर हाल में संतो के कोप से बचने का रास्ता ढूंढने को मजबूर हो रहे हैं।

इसी साल कम्प्यूटर बाबा ने जब विद्रोही तेवर दिखाये तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बाबा की नाराजी दूर करने के लिए पांच सन्तों को राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया था। लेकिन अनायास ही अब इनमें से ही एक कम्प्यूटर बाबा ने खुलेआम बगावती तेवर दिखाते हुए राज्यमंत्री के दर्जे से न केवल इस्तीफा दिया बल्कि शिवराज को खुली चुनौती भी दे डाली। अब वे बाबाओं व सन्तों के समागम में मन की बात के जरिए शिवराज सरकार पर निशाना साधेंगे। यदि कम्प्यूटर बाबा को मनाने में भाजपा और शिवराज असफल रहते हैं तो फिर ग्वालियर में 30 अक्टूबर, खंडवा में 4 नवम्बर, रीवा में 11 नवम्बर और जबलपुर में 23 नवम्बर को सन्त समागम में मन की बात के जरिए नर्मदा में अवैध उत्खनन और गौरक्षा जैसे मामलों को कम्प्यूटर बाबा उठायेंगे। राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त सन्त नामदेव शास्त्री उर्फ कम्प्यूटर बाबा ने राज्य सरकार पर धर्म व सन्त समाज की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए पद त्याग किया था।

इसी वर्ष अप्रैल में कम्प्यूटर बाबा और एक दूसरे धर्म नेता पंडित योगेंद्र महन्त ने अवैध रेत उत्खनन और नर्मदा किनारे छ: करोड़ पौध रोपण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए नर्मदा यात्रा निकालने की धमकी दी थी, तब शिवराज ने उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा देकर सरकारी समिति का सदस्य बना दिया था ताकि वे नर्मदा की सुरक्षा के लिए उपाय बता सकें। वैसे कम्प्यूटर बाबा के मन में चुनाव लडऩे की इच्छा काफी समय से हिलोरें मार रही थी, लेकिन छ: माह बाद न केवल राज्यमंत्री पद से अचानक इस्तीफा देने व शिवराज सरकार को घेरने के लिए वे कई सवाल भी उठाने लगे। इस घटनाक्रम को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। उन्होंने भाजपा से चुनाव लडऩे की इच्छा भी जाहिर की थी, लेकिन भाजपा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। 2014 में कम्प्यूटर बाबा ने आम आदमी पार्टी और भाजपा से लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर की थी। कम्प्यूटर बाबा के धार्मिक रसूख को देखते ही भाजपा सरकार ने उसी दिन विशेष गौ मंत्रालय गठित करने की बात कही, जिस दिन उन्होंने इस्तीफा दिया था।

भाजपा राजनीति में साधु-सन्तों के महत्व और उनके प्रभाव का अपनी चुनावी संभावनाओं को चमकीला बनाने में पूरी तरह से सिद्धहस्त है, लेकिन ऐन चुनाव के पहले साधु-सन्तों में शिवराज को लेकर जो दो धड़े बन गए हैं, उसका भाजपा की चुनावी संभावनाओं पर कोई विपरीत असर न पड़े इसलिए भाजपा और सरकार कम्प्यूटर बाबा के कई समर्थकों को मनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। उसका प्रयास है कि साधु-सन्तों के माध्यम से कम्प्यूटर बाबा पर दबाव बनाकर उन्होंने जो विद्रोही तेवर अख्तियार किए गए हैं उन्हें शान्त किया जाए। भाजपा के विरोध में साधु-सन्तों का जो धड़ा उठ खड़ा हुआ है उसे कांग्रेस के पाले में लाने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने जरा भी देरी नहीं की। अब सत्ता के दावेदार दोनों दलों की कोशिश यह है कि चुनावी मैदान में अपने-अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए साधु-सन्तों का उपयोग किया जाये। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि साधु-सन्तों और मठाधीशों की दोनों दलों के नेताओं से बढ़ती गलबहियां क्या इस विधानसभा चुनाव में निर्णायक साबित होंगी और किसे सत्ता के पायदान तक पहुंचायेंगी तथा किसको सत्ता से वनवास का दंश झेलने को विवश करेंगी।

कमलनाथ ने लिखी साधु-संतों को खुली पाती
साधु-सन्तों में दो घड़े होने व नर्मदा संरक्षण का मुद्दा गरमाने के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने साधु-सन्तों के नाम एक खुली पाती लिखकर नर्मदा घाटी से जुड़े मुद्दे उठाते हुए अपेक्षा की है कि साधु-सन्त इसका जवाब शिवराज से मांगें। इस पत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री की नर्मदा सेवा यात्रा की हकीकत भी बताई है और यह जानना चाहा है कि नर्मदा सेवा यात्रा से क्या नदी में अवैध उत्खनन रुक गया और क्या वह संरक्षित हो गई। अपने चिरपरिचित आरोप को भी कमलनाथ ने पत्र में दोहराया है कि शिवराज अपने पूरे 13 साल के कार्यकाल में झूठी घोषणाओं के माध्यम से प्रदेश की जनता के समक्ष झूठ परोसते हुए उसे गुमराह करते आये हैं। भोपाल में अभी हुए सन्त समागम में भी वे ऐसा करते हुए नजर आये। नर्मदा संरक्षण को लेकर भी बडे-बड़े दावे कर आये हैं जबकि वास्तविकता इसके उलट है। कमलनाथ ने लिखा है कि साधु-सन्त नर्मदा नदी की दुर्दशा का जो मुद्दा उठा रहे हैं वही हकीकत है और अवैध उत्खनन जारी है, इस स्थिति से साधु-सन्तों को कांग्रेस अवगत करायेगी और झूठ की पोल खोलेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि शिवराज की नर्मदा यात्रा सेवा यात्रा न होकर नर्मदा घोटाला यात्रा थी। 11 दिसम्बर 2016 को अमरकंटक से प्रारंभ हुई 148 दिन चली नमामि देवी नर्मदा यात्रा का समापन 15 मई 2017 को अमरकंटक में ही प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुआ और उसमें बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गयीं। इसी यात्रा के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तो सार्वजनिक मंच से कहा था कि नर्मदा के संरक्षण को लेकर जो बातें कही जा रही हैं यदि उन पर ही गंभीरता से अमल हो जाए तो नर्मदा बची रह सकती है। कमलनाथ ने अपने पत्र में जो 11 बिन्दु उठाये हैं उनमें उन बातों का भी उल्लेख है जिसमें सरकारी मद से नर्मदा की आरती सहित अन्य व्यवस्थाओं में भारी खर्च किया गया। यात्रा के दौरान 20 बड़ी घोषणाएं की गयीं और नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक को विश्?व का सबसे बड़ा खूबसूरत तीर्थस्थल बनाने का दावा भी किया गया था तथा नर्मदा तट के 18 शहरों में जल-उपचार संयंत्र स्थापित करने की घोषणा की गयी थी। इन सब पर अभी तक कितना खर्च हुआ है यह भी जानकारी देने के लिए कमलनाथ ने पत्र में लिखा है। उन्होंने साधु-सन्त समाज से आग्रह किया कि वह शिवराज से जवाब मांगे कि 17 माह की अवधि में कौन-कौन से कार्य किए गए और घोषणाओं पर कितना अमल हुआ। यह कमलनाथ का पहला पत्र है। साधु-सन्तों के नाम अपने दूसरे पत्र में वे प्रदेश में गौमाता की दुर्दशा सहित अन्य प्रश्?न भी उठायेंगे।

और यह भी
उधर छत्तीसगढ़ में जो तांत्रिक चौथी बार मुख्यमंत्री रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनाने के लिए विधानसभा परिसर के अन्दर नजर आये थे, अब उन्होंने कांग्रेस के विधायकों को तोडऩे के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करना प्रारंभ कर दिया है। भाजपा चुनावी समर में दलबदल का तड़का लगाने में महारत हासिल कर चुकी है, लेकिन कम्बल बाबा के आडियो के लीक होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने उनसे पल्ला झाड़ लिया है और कहा है कि भाजपा का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। कम्बल बाबा ने लुन्ड्रा के कांग्रेस विधायक चिन्तामणि महाराज को भाजपा में शामिल होने के लिए डेढ़ करोड़ रुपये नकद व मंत्री पद दिलाने तथा चुनाव में जिताने की गारंटी की पेशकश की थी। चिन्तामणि ने उस आडियो में इस पेशकश को ठुकरा दिया और कहा कि वे कांग्रेस में ही रहेंगे। कम्बल बाबा ने इस आडियो में यह भी दावा किया था कि कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रामदयाल उइके को उन्होंने ही 10 करोड़ रुपया और मंत्री पद की पेशकश कर भाजपा में शामिल कराया है। चिन्तामणि ने इस बात की पुष्टि आडियो के वायरल होने के बाद की है। अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में भाजपा को घेरने का एक हथियार कांग्रेस को मिल गया है।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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