शिवराज सरकार में निगम मण्डलों में हुआ करोड़ों का घोटाला

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने भले ही २००३ के चुनावी घोषणा पत्र में इस प्रदेश की जनता को भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने का वायदा किया गया हो लेकिन भाजपा के द्वारा किये गये वायदे की झलक केवल जिन उमा भारती और बाबूलाल गौर के के शासनकाल में ही दिखी उमा के शासनकाल में तो यह स्थिति थी कि सरकारी कर्मचारी ही नहीं बल्कि भाजपा के कई नेताओं में इतनी दहशत थी कि वह अपना कारोबार और सम्पत्ति बेचकर भोपाल में रहने का मन बना रहे थे लेकिन पार्टी में उमा भारती के साथ तिरंगा मामले को लेकर पार्टी में एक ऐसी साजिश चली कि भ्रष्टाचार से परेशान भाजपा के केन्द्र के नेताओं से मिलकर उमा भारती को पार्टी से बाहर कर दिया उमा भारती के पद से हटते ही सत्ता पर काबित हुए शिवराज सरकार के कार्यकाल में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार की गंगोत्री बही और इस गंगोत्री में भाजपा के नेताओं ने अधिकारियों से सांठगांठ कर ऐसी डुबकी लगाई, इस डुबकी के चलते भाजपा के वह कार्यकर्ता जिनकी हैसियत टूटी साइकल तक की नहीं थी वह आलीशान भवनों और लग्जरी कारों में फर्राटे लेकर घूमते नजर आ रहे हैं। भाजपा नेताओं प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों में भ्रष्टाचार की लत लगने के पीछे भाजपा के नेता यह मानकर चल रहे हैं कि शिवराज सरकार के सत्ता पर काबिज होते ही उनकी धर्मपत्नी श्रीमती साधना सिंह ने अपनी पहचान छुपाकर डम्पर खरीदने के मामले से जो संदेश इस प्रदेश के भाजपा के नेताओं और अधिकारियों में गया उसी पहचान छुपाकर डम्पर के संदेश को शिवराज सरकार की नीति और नीयत मानकर इस तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये कि जहां जिसको मौका मिला वह भ्रष्टाचार करने से नहीं चूका फिर चाहे वह प्रशासन में बैठे अधिकारी हों या भाजपा के नेता और जनप्रतिनिधि सभी हर प्रकार के अवैध कारोबार में इस प्रकार से लिप्त हो गये कि उन्होंने जनता के हितों को दरकिनार कर दिया। यही वजह है कि शिवराज सरकार के १५६ माह के कार्यकाल में १५६ घोटालों को तो अंजाम दिया ही है तो शिवराज सरकार के जाते-जाते प्रदेश की राजनीति में भ्रष्टाचार का जो इतिहास लिखा गया वो शायद ही कभी किसी भी शासनकाल में हुआ हो, मजे की बात तो यह है कि इस तरह से भ्रष्टाचार के ऊपर से लेकर नीचे तक बह रही गंगोत्री के बाद अब शिवराज प्रदेश की जनता को जीरो टालरेंस का जुमला सुनाते रहे तो कभी मैं डंडा लेकर आया हूं किसी को नहीं बख्शूंगा जैसी नौटंकी भी करते रहे लेकिन इस सब नौटंकी के बावजूद भी भ्रष्टाचार शिवराज के मुखाग्रबिन्द से निकले जीरो टालरेंस के जुमले के बाद भी भ्रष्टाचार खत्म होने का नाम नहीं लिया बल्कि जहां जिस भाजपाई नेताओं, जनप्रतिनिधियों को जहां जिसको मौका मिला वह भ्रष्टाचार में लिप्त हो गया। फिर चाहे वह निगम मण्डलों से जुड़े जनप्रतिनिधियों सभी ने भ्रष्टाचार को जो ताण्डव तो किया उसके चलते सरकारी खजाने को चूना लगाने का दौर भी खूब चला। सार्वजनिक उपक्रमों की जिम्मेदारी संभालने वाले भाजपाई नेताओं की यह स्थिति रही कि वह भाजपा के बहुचर्चित नारे सबका विकास, सबके साथ को चरितार्थ करते हुए सबका तो नहीं अपना विकास करते रहे। शिवराज सरकार में सार्वजनिक उपक्रमों में हुए करोड़ों के घोटालों का खुलासा कल विधानसभा में पेश की गई कैग की रिपोर्ट में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई शिवराज सरकार के कार्यकाल के दौरान राज्य सरकार के ७२ सार्वजनिक उपक्रमों में से ३६ ने तो वर्ष १९९० से आडिट ही नहीं कराया गया, जबकि बीते तीन वर्षों में इन निगम-मंडलों ने सरकार को पांच हजार ६२५ हजार करोड़ की चापत लगाई है। साथ ही २५ सार्वजनिक उपक्रमों में वर्ष २०१६-१७ में उनके लाभांश का ३७.४९ करोड़ रुपए घोषित ही नहीं किया। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में जिन ३६ उपक्रमों द्वारा आडिट नहीं कराने का उल्लेख किया है, उसमें गबन और राशि का दुरुपयोग किए जाने की संभावना जताई है। भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक ने सार्वजनिक उपक्रमों की ३१ मार्च २०१७ की रिपोर्ट गुरुवार को विधानसभा के पटल पर रखी गई है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में अनेक गड़बडिय़ोंं की तरफ इंगित किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह स्पष्ट नहीं है कि किस आधार पर राज्य शासन ने ऐसे तीन कार्यशली उपक्रम जिनके वर्ष २०१४-१५ से २०१६-१७ के लेखे बकाया थे, को वर्ष २०१६-१७ के दौरान १२०.९३ करोड़ की बजटीय सहायता और एक अकार्यशील उपक्रम को ७५ लाख रुपए की वित्तीय सहायता मुहैया कराई गई। यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार मप्र राज्य के विभाजन के १७ वर्ष बाद भी ३६.९८ करोड़ की अंश पूंजी व ऋण वाली छह उपक्रमों की सम्पत्तियों और देनदारियों का विभाजन मप्र और छत्तीसगढ़ के बीच नहीं हुआ। साथ ही विद्युत वितरण कंपनियां उज्जव डिस्कॉम आश्वासन योजना (उदय) लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकी। ६२७० करोड़ की चपत लगी : कैग रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि वाणिज्य कर, उत्पाद शुल्क, वाहन कर, जलकर में घोटाले की बात सामने आई है। जिससे प्रदेश के खजाने पर ६२७० करोड़ की चपत लगी है। बिजली खरीदी सहित अन्य में ५६ करोड़ की हानि – कैग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ८.३९ करोड़ के स्वतंत्र अभियंता शुल्क न वसूले जाने और १२ रियायत ग्राहियों से देरी से हुई वसूली से चार करोड़ के ब्याज न लगाए जाने तथा महंगी बिजली की खरीदने की वजह से २७.६६ करोड़ का अतिरिक्त व्यय ६.७० करोड़ के दंडात्मक जल प्रभार का परिहार्य व्यय, जल प्रभार पर १.६६ करोड़ का परिहार्य व्यय और सक्रिय वित्तीय प्रबंधन की कमी से ९.७९ करोड़ की ब्याज आय की हानि हुई है। सरकार बकाया लाभांश जमा करने दे आदेश – सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार को लाभ अर्जित करने वाले उपक्रमों को लाभांश नीति लागू होने की दिनंाक जुलाई २००५ से बकाया राशि ४७४.४६ करोड़ को सरकारी खाते में जमा कराने के आदेश निगम-मंडलों को देना चाहिए। घाटे में चल रहे निगमों को बंद करे सरकार – सीएजी का मत है कि भारत सरकार द्वारा मप्र सड़क परिवहन निगम के पुर्नगठन की सलाह देने के दस वर्ष व्यतीत होने के बावजूद पुर्नगठन अभी तक नहीं किया गया है। मप्र सरकार अविलंब से समीक्षा करे कि क्या निगम का पुनर्गठन किया जा सकता है। साथ ही घाटे में चल रहे अक्रियाशील उपक्रमों के अस्तित्व में बने रहने के कारण सरकारी कोष को भारी नुकसान होता है, इसलिए घाटे में चल रहे उपक्रमों की कार्यपद्धति का परीक्षण कर उन्हें बंद कर देना चाहिए।

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