शिवराज की नीति से उपाध्यक्ष पद भी खोया भाजपा ने ?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। मध्यप्रदेश विधानसभा में यूँ तो अध्यक्ष पद हमेशा विपक्षी पार्टी को दिये जाने की सौजन्यतापूर्ण परम्परा अभी तक चली आ रही थी लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जो अभी तक मुख्यमंत्री होने का भ्रम पाले हुए हैं तभी तो सारे निर्णय बिना पार्टी के नेताओं के सलाह मश्विरा लिये जिस तरह की घोषणायें उन्होंने की उनकी इन घोषणाओं के चलते पार्टी की छवि जनता में ही नहीं बल्कि भाजपा के नेताओं में भी खराब हो रही है स्थिति यह है कि अब भाजपा के नेता यह कहते नजर आ रहे हैं कि यदि शिवराज उछल-कूद नहीं करते तो भाजपा के एक विधायक को विधानसभा में उपाध्यक्ष का पद मिल जाता लेकिन जिस प्रकार से उन्होंने नेता प्रतिपक्ष के मामले में उठा-पटक कर अपने चहेते पूर्व परिवहन मंत्री भूपेन्द्र सिंह को नेता प्रतिपक्ष बनाने की मंशा पाल रखी थी हालांकि उस मंशा को पार्टी ने पूरी नहीं होने दी। चूँकि शिवराज सिंह चौहान भले ही १३ वर्ष तक भाजपा में चली उठापटक की राजनीति के चलते भले ही उमा भारती को सत्ता से बेदखल करके १३ वर्षों तक मुख्यमंत्री के पद पर रहे हों लेकिन संसदीय ज्ञान जरा भी नहीं है उसी संसदीय ज्ञान के अभाव के चलते शिवराज सिंह की अधूरे ज्ञान के कारण भाजपा को अध्यक्ष की तो बात छोडि़ए उपाध्यक्ष पद पर एक नेता को चुने जाने का मौका भी शिवराज की सिंह की वजह से गंवाना पड़ा। विधानसभा नियम और प्रक्रिया के अनुसार सदन में अध्यक्ष पद के लिये भाजपा ने जो फार्म भरा वह दूसरे क्रम में जमा किया जबकि नियम यह है कि पहला प्रस्ताव आये उस पर विचार किया जाता है दूसरे आये प्र्रस्ताव पर यदि अध्यक्ष चाहे तो विचार कर सकता है और यदि वह चाहे तो नहीं? अध्यक्ष पद के फार्म को जमा करने के समय जो भाजपा ने शिवराज सिंह की उठापटक की राजनीति के चलते जो गलती की थी उससे सबक न लेते हुए वही गलती उपाध्यक्ष पद के फार्म जमा करने के दौरान अपनाई और उपाध्यक्ष पद के लिये जो फार्म जमा किया वह भी भाजपा ने दूसरे नम्बर पर जमा करने की भूल की, लेकिन मजे की बात यह है कि शिवराज की उठापटक और संसदीय ज्ञान न होने के चलते भाजपा को उपाध्यक्ष पद का फार्म भी दूसरे क्रम पर जमा होने के कारण गंवाना पड़ा। मजे की बात यह है कि जो शिवराज सिंह भले ही अपने शासनकाल में मुख्यमंत्री रहे हों लेकिन उन्हें संसदीय ज्ञान कतई नहीं है तो वहीं दूसरी ओर अपनी राजनीति और उठापटक के चलते वह हमेशा संसदीय ज्ञान के जानकार नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और पूर्व संसदीय कार्य मंत्री रहे डॉ. नरोत्तम मिश्रा की भी नहीं चलने दी, शिवराज की इसी उठापटक के कारण भाजपा को उपाध्यक्ष का पद गंवाना पड़ा। लेकिन फिर भी वह अब इस पद पर अपनी पार्टी का व्यक्ति के काबिज न होने के लिये उठापटक करते नजर आ रहे हैं और जनता में ही नहीं भाजपा नेताओं के साथ-साथ मीडिया में अपने संसदीय ज्ञान को छुपाकर यह आरोप लगाने में लगे हुए हैं कि कांग्रेस के नेताओं ने मन की जबकि विधि विशेषज्ञ की यदि बात मानें तो कौल सकदर के अनुसार चाहे अध्यक्ष का मामला हो या उपाध्यक्ष विधानसभा सचिवालय में जिसके द्वारा पहला फार्म जमा किया जाएगा उस पर ही विचार किया जाता है। मजे की बात यह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ-साथ भाजपा के प्रवक्ता जो निजी टीवी चैनलों पर अधूरे ज्ञान के चलते जो मुंहजोरी करते नजर आते हैं वह भी इस पद के उम्मीदवार को जातियों में बांटकर भ्रम फैलाने की कोशिश में लगे हुए हैं लेकिन उन्हें यह भी शिवराज की तरह यह नहीं मालूम कि विधानसभा में अध्यक्ष हो या उपाध्यक्ष या अन्य कई मुद्दे को लेकर जो भी पहले जमा होता है उस पर ही विचार करने की परम्परा है।

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