शाह ने लगाई आडवाणी युग की समाप्ति पर मुहर ?

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०-अवधेश पुरोहित
भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। जिन लालकृष्ण आडवाणी की मेहनत और रणनीति के चलते वह भारतीय जनता पार्टी कभी दो लोकसभा सीटों पर आकर सिमट गई भाजपा ने स्व अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केन्द्र की सत्ता पर काबिज हुई। उन्हीं लालकृष्ण आडवाणी के कारण गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार वाजपेयी के कोप भाजन का शिकार होते – होते बची? उन्हीं आडवाणी की आज यह स्थिति होगी इस तरह की कल्पना शायद ही भाजपा के नेताओं से लेकर वह छोटे बडे कार्यकर्ताओं ने नहीं सोचा होगा कि जिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेतुके बयानों के झांसे में आकर इस गंगा जमुनी संस्कृति बाले भारत को आने बाले लोकसभा चुनाव के बाद गृह युद्ध की ओर ढकेलने की तैयारी करने में लगे हुए हैं। उन्हें इस बात का भी आभास नहीं कि अभी तो लोकसभा चुनाव के पूर्व भाजपा के लौहपुरुष आडवाणी को परंपरा वाली सीट गांधीनगर से उनको लोकतंत्र में चुनाव लडऩे के अधिकार छीनकर स्वंय की आडवाणी के स्थान पर अपको उम्मीदवार घोषित कर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह संदेश दे डाला कि भाजपा में अब लालकृष्ण आडवाणी युग समाप्त हो गया? और नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के युग की शुरुआत भी गांधीनगर लोकसभा सीट पर शाह की उम्मीदवारी की घोषणा के साथ – साथ यह भी संदेश देने की कोशिश मोदी और शाह ने अप्रत्यक्ष तौर पर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को दे दिया कि अब आडवाणी के बाद यदि उनके वह समर्थकों द्वारा नरेंद्र मोदी की जब 2014 के लोकसभा चुनाव के समय प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी के दौरान आडवाणी का साथ दे मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उम्मीदवार बनाने की असफल कोशिश की थी। अब उनकी आडवाणी जैसी स्थिति कब पैदा हो सकती है। इसका एहसान उन्हें हो जाना चाहिए? वैसे भाजपा में इस समय छोटे-बड़े नेताओं अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी की दहशत इस कदर हावी है कि विपक्षियों की तरह है कि उनमें इन नेताओं के खिलाफ कुछ भी बोलने की हिम्मत नही है। हलाकी प्रदेश में सम्पन्न विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान और उनकी मण्डली जिस में मोदी के मंत्रिमंडल के सदस्य नरेन्द्र तोमर भी शामिल थे ने प्रदेश में चुनाव के एसी बाट लगाई कि शाह को अपने राजधानी भोपाल के प्रथम प्रयास में पधारे तब राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत से अमित शाह ने उस समय प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव किसी व्यक्ति विशेष के नेतृत्व में नहीं संगठन के नेतृत्व में लगने का फऱमान जारी कर डाला। लेकिन शाह के उस बयान देने के बाद शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र तोमर सहित उनकी मण्डली ने ऐसी हवा निकाली की आखिर में अमित शाह जिनके बारे में यह चर्चा आम है उनसे कुछ भी कहलो मगर उनकी झोली में जीत आना चाहिए? शिवराज सिंह और नरेन्द्र तोमर की इस जोडी ने विधानसभा चुनाव के दौरान मिलकर जिस तरह से चुनावी रणनीति तैयार की उसमें तोमर ने अपनी 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव के समय अपने चहते विधानसभा में पदस्थ अधिकारी के माध्यम से टिकटों की बिक्री का खेल भी जमकर खेला तो वही जिन विधायकों ने शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल में हर तरह अवैध कारोबार की परंपरा शुरूआत हुई थी इन सभी को पुन:समर में उतारने का निर्णय क्यों और किस नीति के तहत लिया इस सवाल का जबाव आज तक भाजपा का हर छोटा बडा नेता और कार्यकर्ता खोजने में लगा हुया है। तो पार्टी के नेताओं में यह चर्चाओं का दौर भी जारी है कि विधायकों को पुन: चुनावी समर में उतारने में भी अच्छा खासा खेल खेला गया? मजे की बात तो यह है कि अमित शाह ने अब जब नरेंद्र तोमर और उनसे जुड़े नेताओं ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी के प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा के समय लालकृष्ण आडवाणी ने किन नेताओं की शह पर मोदी के सामने शिवराज सिंह चौहान के नाम कौन लाया था उन नेताओं मैं कौन कौन शामिल था । जिसकी खबरें उन दिनों के समाचार – पत्रों की सुर्खिओं में रही हैं? अब जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकतंत्र की परंपराओं के अनुसार अपनी परंपरा वाली सीट से उनकी विदाई कर आपने आपको आडवाणी का संसदीय क्षेत्र गांधीनगर से उम्मीदवारी घोषित कर मोदी और शाह की टीम ने आडवाणी को बिदाई दे मुगलों, राजा महाराजों की सत्ता हथियाने और सत्ता से बेदखल करने की परंपरा का उस भाजपा में शुरुआत कर दिया जो पार्टी अपने आप को अन्य पार्टियों से चाल, चरित्र और चेहरे के मामले में सर्वश्रेष्ठ होने का ढिंढोरा पिटा करती थी उसी पार्टी के मुखिया अमित शाह ने लालकृष्ण आडवाणी से सहिमति तक लेना उचित नहीं समझा। यह घटना से अनेकों सवाल तो उठ ही रही हैं कि अब आडवाणी के उन नेताओं का क्या होगा जिन्होंने 2014 के लोकसभा के पूर्व क्या क्या खेल खेले उनमें नरेन्द्र तोमर की भूमिका भी अहंम रही है? देखना यह है आडवाणी की तरह उन सभी नेताओं ने 2014 में मोदी के खिलाफ साथ देकर उनकी राह में रोडे खडे किए। वैसे इन नेताओं की यह स्थिति है कि वह न तो पार्टी में अपनी साख बना पाए और न ही अपने संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं में दोहरी नीति अपना कर उनमें खास नहीं बना सके यही वजह है कि आज मोदी और शाह के साथ आडवाणी और शिवराज का साथ देने वाले नरेंद्र तोमर आज एक अदद सुरक्षित लोकसभा सीट की तलाश में दर दर भटक रहें हैं? फिर भी यह सवाल उठ ही रहा कि सत्ता के अहंम में आम कार्यकर्ताओं की अपेक्षा करने वाले तोमर के झांसे में किस लोकसभा का एकदिन का राजा (मतदाता) पहले मुरैना अब ग्वालियर की जनता को गुमराह कर अब कहां किस लोकसभा क्षेत्र की जनता गुमराह करने में कामयाबी हासिल करते हैं यह भविष्य बताएगा या आडवाणी की तरह इनका हाल कब और किस तरह से तो नहीं होगा क्योंकि तोमर भी शिवराज को मोदी के साथ – साथ प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने में शामिल थे ?

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