शाह का मंत्री बनना मोदी के ‘केशरिया ब्लू-प्रिंट’ का हिस्सा

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०-उमेश त्रिवेदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूसरी पारी में कैबिनेट मंत्री के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की आमद सरकार के माध्यम से राजनीति में कट्टर और आका्रमक हिन्दुत्व के हस्तक्षेप की ओर इंगित कर रही है। इसके राजनीतिक मायने यह भी हैं कि भाजपा ने अगले बीस-तीस सालों के लिए अपना केशरिया ब्लू-प्रिंट तैयार कर लिया है। अमित शाह मोदी की तरह राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं। आठ-नौ सितम्बर, २०१८ के दिन दिल्ली के अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अमित शाह की यह गर्वोक्ति लोगों को आज भी याद है कि ‘अब आगामी पचास साल तक हमें कोर्ठ भी नहीं हरा सकता।Ó मोदी और अमित शाह इसी कार्य-योजना पर काम कर रहे हैं। २२ अक्टूबर १९६४ के दिन मुंबई में जन्मे अमित शाह की उम्र पचपन साल की है और दूसरी मर्तबा शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री अड़सठ साल के हो चुके हैं। भाजपा के राजनीतिक हलकों में यह फुसफुसाहट सुनाई पडऩे लगी है कि अमित शाह मोदी के राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं। संगठन में राजनैतिक-जुगलबंदी के बाद अमित शाह अब सरकारी-तंत्र के काम-काज का अनुभव अर्जित करना चाहते हैं। तीस मई को राष्ट्रपति भवन में आयोजित मोदी के शपथ-विधि समारोह के प्रोटोकॉल अमित शाह के राजनीतिक वर्चस्व और महत्व को काफी गाढ़े तरीकेक से रेखांकित कर रहे थे। यह भाजपा की राजनीतिक परम्पराओं के विपरीत है। वित्तमंत्री अरुण जेटली स्वाथ्य के कारण सीन से बाहर हो गए हैं और सुषमा स्वराज ने खुद ही चुनाव लडऩे से मना कर दिया था। जेटली-सुषमा की अनुपस्थिति में और राजनाथ-नितिन की उपस्थिति में अमित शाह सरकार में वरिष्ठता के प्रोटोकॉल लांघते हुए गृहमंत्री राजनाथ्थ सिंह के पड़ोस में तीसरे क्रम की कुर्सी पर विराजमान थे। नितिन गडकरी जैसे ‘पोलिटिकल-परर्फामरÓ को अमित शाह के बाद चौथे नम्बर की सीट आवंटित की गई थी। अमित शाह मोदी के बाद शपथ लेने वाले तीसरे मंत्री थे। मोदी और अमित शाह के बीच में जो समझ और समीकरण विराजमान हैं, उनके चलते इन दोनों नेताओं की कैमेस्ट्री को पार पाना संभव नहीं है। कैबिनेट के वरिष्ठा-क्रम में उलट-फेर अमित शाह के प्रति मोदी के गहरे रुझान का परिचायक है। दिचस्प यह है कि औपचारिकताओं के कवच में मोदी-शाह के बीच यह बंधुत्व (एफीनिटी) और बंधन (एफीलेशन) कभी नजर नहीं आता है। अमित शाह ने २०१४ और २०१९ में दो, बार लगातार मोदी की रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने का राजनीतिक करिश्मा किया है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र-सरकार की राजनीति कोर प्रशासन में शाह भी नए हैं। वो साल भर पहले राज्यसभा सदस्य बने थे और २०१९ में पहली मर्तबा लोकसभा का चुनाव लड़कर संसद में आए हैं। मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, उस वक्त वो भी पहली मर्तबा दिल्ली आए थे। पिछले पाँच सालों से राजनीति के हर जंग में अमित शाह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े हैं। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि राजनीतिक मसलों में मोदी सिर्फ अमित शाह के नजरिए से देखते हैं और समझते हैं। दोनों नेताओं के बीच विश्वास के सेतु काफी मजबूत हैं। लेकिन अमित शाह का राजनीतिक दामन साफ-सुथरा नहीं है। एबीपी के मामूली कार्यकर्ता के रूप में अपना सफर शुरू करने वाले अमित शाह का राजनीतिक-अतीत कई विवादों से घिरा है। सत्ता और सरकार की दबिश ने भले ही ऐसे सवालों को हाशिए पर डाल दिया हो, लेकिन ये आरोप परछाई की तरह अमित शाह के साथ चलते हैं। २००५ में उनका नाम सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी के साथ फर्जी एनकाउंटर में उछला था और जेल भी जाना पड़ा था। उस वक्त अमित शाह गुजरात के गृहमंत्री थे। इसी प्रकरण में २०१० से २०१२ के दरम्यान वो गुजरात में दाखिल नहीं हो सकते हैं। उन पर यह आरोप भी है कि मोदी-सरकार बनने के बाद उन्होंने अपने बेटे जय शाह की कम्पनी को अवांछनीय लाभ दिलाया है। सोहराबुद्दीन मसले में अमित शाह कोर्ट से छूट चुके हैं, लेकिन इस मामले में जस्टिस लोया की रहस्यात्मक मौत की मिस्ट्री उन पर चस्पा है। मोदी और शाह को नजदीक से जानने वालो भाजपाई कहते हैं कि ‘मोदी और शाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं वो दशकों साथ रहे हैं। वो एक जैसा सोचते हैं। परफेक्ट टीम की तरह काम करते हैं।वो एक दूसरे से भिन्न दृष्टिकोण रखते हुए दिख सकते हैं, लेकिन ऐसे में भी वो एक-दूसरे का काम पूरा करते हैं।’
०-सुबह सवेरे के कालम ”पहली बात” से साभार)
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