वरीयता प्रियंका को राम को नहीं… ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
देश के गरीबों व असहायों को अपने हाल पर छोड़कर अब देश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के पूरे मनोयोग से लोकसभा चुनाव पर केन्द्रित हों गई है, अब वह देश के वोटर से चाहती है कि अगले तीन महीने वह अपनी निजी समस्याएँ भूल जाएं और भाजपा को फिर से सत्तारूढ़ कराने में जुट जाए, यही नहीं अब तो भाजपा व प्रधानमंत्री ने भगवान राम को भी भुला दिया है और अपना पूरा ध्यान कांग्रेस को नई-नवेली नेत्री प्रियंका गांधी को बदनाम करने पर केन्द्रित कर दिया है, भाजपा ने संघ व विश्व हिन्दू परिषद से भी यह कह दिया है कि वे राम मंदिर को भुलाकर भाजपा के नए चुनावी चक्रव्यूह में उसकी मदद करें और आश्चर्य यह कि भाजपा के कथित संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहनभागवत ने भाजपा व प्रधानमंत्री के आदेश को शिरोधार्य कर उसका पालन शुरू कर दिया है। आज पूरा देश सिर्फ एक सवाल देश के प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष से पूछ रहा है कि जिन कथित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा को घेरा जा रहा है, क्या ये भ्रष्टाचार के मामले वर्तमान केन्द्र सरकार के मौजूदा कार्यकाल के हैं? यदि ये दस-बीस साल पुराने हैं तो फिर इन पर जो कार्यवाही ऐन-चुनाव के पहले हो रही है, वह पिछले साढ़े चार साल में क्यों नहीं की गई? अभी प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने के बाद क्यों की गई? क्या प्रवर्तन निदेशायक को इन मामलों का पता नहीं था? केन्द्र में इस मामले में अचानक सक्रिय होने का एकमात्र कारण प्रियंका की मानसिक रूप से घेराबंदी हे, जिससे कि वे पूरे मनोयोग रूप से घेराबंदी है, जिससे कि वे पूरे मनोयोग से पूर्वी उत्तरप्रदेश की दी गई जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाएं। …और अब तो हाल ही के घटनाक्रमों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सिर्फ सीबीआई का तोता ही केन्द्र के पिंजरे में नहीं है, अब तो प्रवर्तन निदेशालय जैसे संवैधानिक संगठन भी केन्द्र सरकार के पिंजरे में कैद है और ये अपने आका प्रधानमंत्री के निर्देश पर काम पूर्वाग्रह आधारित कार्यवाही को अंजाम देने को मजबूर हैं, पश्चिम बंगाल के कोलकत्ता कमिश्नर वाली घटना ने यह उजागर कर दिया है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि भाजपाध्यक्ष व प्रधानमंत्री ने अब राम मंदिर के मुद्दे से किनारा कर प्रतिद्वन्द्वी दलों के नेताओं को लक्ष्य बनाकर चुनावी ‘प्लानÓ तैयार कर लिया है, और उसी मांग पर चलना भी शुरू कर दिया है, यद्यपि इस बीच प्रियंका गांधी का यह कहना भी महत्व रखता है कि ”पूरा विश्व जानता है कि यह सब क्यों किया जा रहा है” और वह अपने व्यक्तित्व के अनुकूल प्रतिदिन व्यक्तिगत गालियाँ सहकर भी पूरे मनोयोग से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, करीब-करीब यही स्थिति भाजपा के दूसरे लक्ष्य ममता बनर्जी की है, उसने जहां अपने प्रदेश में भाजपा की रैलियों व उनके नेताओं के उडऩ खटोलों के उतरने पर अपने राज्य में सख्त प्रतिबंध लगा दिया है, वहीं वे अगले सप्ताह दिल्ली आकर वहां भी ‘हल्ला बोल’ का आयोजन करने वाली हैं, जिसमें दो दर्जन से अधिक प्रमुख प्रतिपक्षी दल व उनके नेता शिरकत करने वाले हैं। मोदी-अमितशाह की सबसे अहम चिंता उत्तर प्रदेश की है, क्योंकि वे जानते हैं कि देश की सतता के सिंहासन तक पहुंचने का रास्ता उत्तरप्रदेश से ही गुजरता है और कांग्रेस ने अपनी पार्टी के दो युवा व चुम्बकीय चेहरा प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया कोउत्तर प्रदेश की कमान थमा दी है और इसी बात को लेकर सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री जी काफी चिंतित हैं, फिर इन दोनों युवा चेहरों के अलावा बुआ-भतीजे (माया-अखिलेश) का गठबंधन भी भाजपा के ‘अश्वमेघी यज्ञ’ के घोड़े की विजय यात्रा में बाधक बन सकता है, इसलिए अमित-मोदी की कई मोर्चों पर एक साथ निगरानी रखनी पड़ रही है। यद्यपि राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर अभी तक संघ प्रमुख, विहिप तथा उनके अनुषंगी संगठन मोदी-अमित के निर्देश व उनके तर्कों से सहमत नहीं हैं, क्योंकि इस मुद्दे पर प्रयाग कुम्भ में संतों के संगठन में फूट भी पड़ चुकी है और साधु-संतों के एक तबके ने २१ फरवरी को राम मंदिर के ेशिलान्यास की घोषणा भी कर दी है, जिसे कांग्रेस समर्थक बताया जा रहा है, किन्तु विहिप भी ऐसे मौके पर चुपचाप बैठकर तमाशा नहीं देखना चाहती, इसी मुद्दे पर प्रधानमंत्री को ‘अपनों’ के बीच नाराजी झेलनी पड़ रही है, अब जो भी हो प्रधानमंत्री को अपनों की नाराजगी और प्रतिपक्षी नेताओं की बदनामी तो झेलना ही होगी?
०-नया इंडिया के कालम ”चुनाव : 2019’से साभार)
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