वक्त बदलाव का है तो फायदा किसका है?

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०-दिनेश गुप्ता
चुनावी राजनीति में अपने कार्यकर्ताओं की बगावत को कोई भी राजनीतिक दल नहीं रोक सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि उसे बगावत से होने वाले नुकसान को कम से कम कैसे किया है? भारतीय जनता पार्टी में यदि बगावत की वजह शिवराज सिंह चौहान हैं तो इलेक्शन मैनेजमेंट के गुरु भी यही हैं। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह कांग्रेस में ऐसे दो चेहरे हैं जो मैनेजमेंट में मास्टर माने जाते रहे हैं। लेकिन, कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में अपनी जुगाड़ बैठाने में मास्टर हैं। मैदानी मैनेजमेंट में शिवराज सिंह चौहान इससे कहीं आगे निकल चुके हैं। सत्ता का साथ होने से उनकी प्रबंधन क्षमता हजार गुना दिखाई देती है। कांग्रेस चुनाव में ऐसे कोई करंट या लहर पैदा नहीं कर सकी, जिसके दम पर सीधे-सीधे चुनाव नतीजों की घोषणा की जा सके। वक्त है बदलाव के नारे के चलते पहले वोटर के बीच से बदलना चाहिए, बदलना चाहिए की आवाज जरूर सुनाई दी। लेकिन चुने किसे? इस सवाल का जवाब तलाशने के बजाए सीधे इस निष्कर्ष पर पहुंचना आसान है कि हवा यदि बदलने की है तो इसका फायदा कांग्रेस को ही मिल रहा है। मध्यप्रदेश में दो दलीय व्यवस्था अभी भी कायम है। कोई तीसरा दल सरकार बनाने लायक ताकत पैदा नहीं कर पाया है। इस कारण एक से नाराजगी का अर्थ दूसरे को फायदे में दिखाई देता है। वोटर का छोटा सा असंतोष भी बड़े रूप में सामने आता है। जैसे कि बुधनी में देखा गया। चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पतनी श्रीमती साधना सिंह और पुत्र कार्तिकेय का विरोध करती जनता। इस तरह की घटनाओं ने कांग्रेस में उत्साह जरूर पेदा किया। प्रदेश में बदलाव की हवा को आंधद में बदलने की कोशिश भी हुई। लेकिन कांग्रेस का चुनाव प्रबंधन इतना लचर था कि वह कर्ज मुक्ति के अपने वादे को ज्यादा हवा नहीं दे पाया। दोनों ही दल नकारात्मक प्रचार के आधार पर सकारात्मक बदलाव की बात वोटर से कर रहे थे। शिवराज सिंह चौहान अंत तक यह नहींसमझ पाए कि हर मुद्दे से बड़ा उनका अपना व्यक्तित्व है। विज्ञापनों के जरिए ज्योतिरादित्य सिंधिया पर और चुनावी सभा में दिग्विजय सिंह पर हमला कर वे बदलाव की बयार को रोकने की कोशिश करते रहे। कांग्रेस बुधनी में ही बदलाव की वो हवा नहीं बना सकी जो शिवराज सिंह चौहान को खींचकर ला सकती। बुधनी, में किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा चर्चा में तो आया, लेकिन काफी देर में कांग्रेस उम्मीदवार अरुण यादव वहां सिर्फ विकास खोजते रहे। बुधनी के वोटर की जीविका भी कृषि पर आधारित है। कर्ज इस क्षेत्र के किसानों पर भी है। जीरो परसेंट के ऋण से ज्यादा अहम कर्ज माफी का मुद्दा है। क्षेत्र के किसानों के बीच यह चर्चा आम थी कि चुनाव में यदि कांग्रेस का एक बटन दबाने से दो लाख रुपए का कर्ज माफ होता है तो बटन दबाने में हर्ज क्या है। मंदसौर की मंडी में अपनी प्याज बेचने बैठे किसान भी कर्ज माफी का इंतजार कर रहे थे। शहर और गांव दोनों के लिए ही चुनाव के मुद्दे अलग-अलग देखे गए। पर जमीन पर खेती करने वाले किसान के लिए अपना घर चलाना मुश्किल होता है। मजदूरी कर काम चलाना पड़ता है। मजदूरी के लिए हर इलाके से लोग गांव छोड़कर चले जाते हैं। आदिवासी अंचलों में पलायन की समस्या ज्यादा है। दो-पांच एकड़ की जमीन होने के बाद भी आदिवासी किसान गांव छोड़कर जाता है। हर छोटा किसान कर्ज में फंसा हुआ है। उसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं इसे जांचने का कोई तंत्र नहीं है। आएगा सो पाएगा। सरकारी अफसर इसी नीति पर चलते हैं। शहरी क्षेत्रों में किसान की कर्ज माफी की चर्चा कम होती है। शहर के व्यापारी की सोच किसान से अलग है। उसकी समस्या मंडी शुल्क की थी। जो शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव के ठीक पहले घटा दी थी। व्यापारी को तकलीफ जीएसटी से है। समस्या भुगतान को लेकर भी आ रही है। मोदी सरकार ने दस हजार से ऊपर के नगद भुगतान पर पाबंदी लगाई है। इस कारण व्यापारी किसान कोक भुगतान के लिए टरकता रहता है। आचार संहिता के दौरान नगद रकम के साथ कई व्यापारी पकड़े गए। किसानों का भुगतान अटक गया। कुछ संवेदनशील कलेक्टरों ने मंडी व्यापारियों को कार्ड जारी कर इस समस्या का समाधान भी निकाला। लेकिन, किसान वह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि भुगतान की व्यवस्था में आएब दलाव से उसे दिक्कत हो रही है। उसे लगता है कि मंडी में फसल बेचने के बाद भी उसके भुगतान को जानबूझकर रोका गया है। इसका लाभ बिचौलियों और दलाल उठाते हैं। किसानों से भुगतान कराने के एवज में पैसे की मांग की जाती है। किसान कहता है कि सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ गया। वह इस हाथ दे, उस हाथ ले की व्यवस्था चाहता है।
०-सुबह सवेरे से साभार)
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