‘लोकतंत्र वोटों की गिनती से कहीं ज्यादा”

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०-अमथ्र्य सेन
आम चुनावों के परिणाम जारी हो चुके हैं और इसके साथ ही चुनावी रोमांच का दौर भी लगभग खत्म हो चुका है। इन चुनावों से मिली सबक या सीख को पूरी स्पष्टता से उभरने में निश्चित तौर पर वक्त लगेगा। भारत को अंग्रेजों से विरासत में एक ऐसी चुनाव प्रणाली मिली है, जिसमें अधिकांश मत पाने वाले उम्मीदवार को विजेता माना जाता रहा है। यद्यपि उसके पास बहुसंख्यक मतदाताओं का समर्थन प्राप्त नहीं होता है। भाजपा ने भी हालिया आम चुनावों में अधिकांश सीटों जीतकर बहुमत प्राप्त किया है लेकिन उसे केवल ३७ फीसदी वोट हासिल हुए हैं। क्या विपक्षी दलों ने बहुमत और बहुलता के बीच अंतर की पर्याय रूप से सराहना की है? क्या भारतीय जनता पार्टी की सापेक्ष शक्ति को देखते हुए विपक्षी दलों के बीच अधिक गठब्ंधन होना चाहिए था? क्या कांग्रेस को अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों जैसे कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के साथ अधिक समन्वित तरीकेक से समझौते करना चाहिए थे? क्या दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच या महाराष्ट्र में कांग्रेस और प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के बीच गठबंधन होना चाहिए था? क्या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को बेगूसराय में युवा राष्ट्रीय नेता कन्हैया कुमार के लिएएक सीट देकर एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए था, तेजस्वी यादव को २९ साल के युवा नेतृत्व के लिए संभावित प्रतिद्वंद्वी होने की चिंता किए बिना, (ऐसा कथित आरोप और एक विचार है कि गठबंधन के नेतृत्व में भाजपा विरोधी वोट विभाजित करने का फैसाला किया गया)? इससे कम महत्वपूर्ण बात यह है कि वासतव में उभरे गठबंधन को एक सहमति की दृष्टि से काम करना चाहिए था और केवल इस तथ्य से संतुष्ट नहीं होना चाहिए कि गठबंधन की सभी पार्टियां भाजपा विरोधी हैं? मैंने कहीं और तर्क दिया है कि भाजपा के खिलाफ पार्टियां अपनी साझा नापसंदगी के लिए पर्याप्त मुखर थीं लेकिन भाजपा के परिप्रेक्ष्य में बुनियादी वैचारिक मतभेदों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। (विशेष रूप से एक धार्मिक पहचान के प्रभुत्व के पीछे का दर्शन-इस मामले में हिंदू पहचान) और देश भर में भारतीयों की आम पहचान की एकीकृत दृष्टि (धर्म केक बावजूद) के रूप में। वास्तविकता में गांधी-टैगोर-नेहरु का अखंड और शक्तिशाली भारत का दृष्टिकोण जिसने भारत को दशकों तक एकसाथ रखने में योगदान दिया, उस पर कम ध्यान दिया गया। एक सकारात्मक दृष्टि एक रचनात्मक और प्रेरक भूमिका निभा सकती है जो संभवत: तदर्थ समझौते की वजह से बातचीत से परे रही है, जिसे हेगेलियन भाषा में कहा जा सकता है, नकारात्मकता का निषेध। अब बात चुनावी विजेता की भाजपा की, जिसके पास २३ मई के चुनाव परिणामों से खुश होने केे लिए उत्कृष्ट आधार है। फिर भी, भाजपा नेतृत्व और विशेष रूप से इसके अत्याधिक प्रतिभाशाली और असाधारण रूप से महत्वाकांक्षी शीर्ष नेता, नरेंद्र मोदी के पास, बंपर जीत के लिए मिल रही वैश्विक प्रतिक्रियाओं से निराश होने का कारण भी है। दुनिया भर के न्यूज मीडिया (न्यूयॉर्क टाईम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल, द गार्जियन, ऑब्जर्वर, ले मोंडे, डाई जिट और हैर्टज से लेकर बीबीसी और सीएनएन) में बीजेपी की जीत हासिल करने के तरीके और साधन पर व्यापक आलोचना हुई है। इसमें भारतीय नागरिकों, विशेषकर मुसलमानों के समूहों से घृणा और असहिष्णुता की भावना को शामिल किया गया है, जिनके पास सम्मान के साथ व्यवहार करने का हर अधिकार है (जैसा कि गांधी-टैगोर की विचारधारा में निहित है)। चुनावों में सिर्फ जीत हासिल कर लेना मकसद नहीं होता। चुनाव के बाद विजेता को दुनिया में किस भाव से देखा जाता है, यह एक बड़ा सवाल है। भाजपा के एक शुभचिंतक के पास अपनी पसंदीा पार्टी के लिए सिर्फ एक जीत से अधिक इच्छा करने के कारण होंगे लेकिन बड़े पैमाने पर लोगों के बारे में क्या? भारत कई मायनों में एक सफल लोकतंत्र है, हाल ही में विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों को जनता ने समरूपता के आधार पर चुनाव सांसदों को उत्कृष्ट प्रतिष्ठा दी है। अगर भारत को अपनी पिछली प्रतिष्ठा को बनाए रखना है। एक बात और अहम है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनावों में सम्पत्ति का संग्रह २०१९ में स्पष्ट रूप से असाधारण रूप से असमान रहा है। भाजपा के पास कांग्रेस सहित अपने सभी प्रतिद्वंष्यिों की तुलना में चुनावी उपयोग के लिए कई गुना अधिक धन और संसाधन थे। ऐसी बड़ी असमानताओं को कम करने के लिए प्रभावी नियमों और विनियमों की सख्त आवश्यकता है। यह न केवल भारत की लोकतांत्रिक साख के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि विश्व स्तर ओर स्थानीय स्तर पर भी चुनावी विजेताओं की जीत के लिए निर्णायक हैं। भारत में नैतिक साहस वाले लोगों की कमी नहीं है। भले ही अन्याय का प्रतिरोध करना हो या आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों का विरोध-चुनाव प्रचार के दौरान यह स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। इसके अलावा अपराध की नई श्रेणियों का भी आविष्कार किया गया है, जैसे कि शहरी नक्सली (अर्बन नक्सली) के रूप में वर्णित किया जा रहा है, सरकार द्वारा निर्धारित बयानों के आधार पर इसे खतरनाक बता घरों में ही नजरबंद किया जा रहा है या इससे भी बदतर स्थिति में भेजा जा रहा है। ऐसे मामलों में भारतीय न्यायालयों ने अक्सर सरकार को रोकने केक लिए हस्तक्षेप किया है, लेकिन भारत में कानूनी प्रक्रियाओं की धीमी गति को देखते हुए, अदालती राहत मिलने में (जब भी मिला है) एक लंबा समय लगा है। अक्सर सत्तारूढ़ दल चुनाव जीतने के लिए इस तरह के दमन को गंभीरता से लेता है। विजयी पक्ष को यह विचार करना होगा कि वह किस प्रकार का शासन चलाना चाहता है- और इसे दुनिया भर में कैसे देखा जाता है। यह सराहना करना कठिन नहीं है कि लोकतंत्र वोटों की गिनती से ज्यादा मांग करता है।
०-सुबह सवेरे के कालम ”प्रसंगवश” से साभार)
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