राहुल की चिंता मोदी-शाह या ….

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०-हरिशंकर व्यास
सोचें, राहुल गांधी का क्या लक्ष्य होना चाहिए? नरेन्द्र मोदी को हटाना या सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनवाना? अहमद पटेल का लक्ष्य मोदी को हराने का होगा या अपनी शुरूआती राजनीति के घरेलू सखा राजेश पायलेट के बेटे का राज्यारोहण? दिग्विजय सिंह को पहला लक्ष्य मोदी को लोकसभा चुनाव में हरवाना है या ज्योतिरादित्य को सीएम नहीं बनने देना? ये सवाल गंभीर हैं। और इससे अर्थ है कि राहुल गांधी से लेकर पूरी कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी-अमित शाह को हल्के में लिया हुआ है। तभी छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान में कांग्रेसियों ने पुराने ढर्रे में चुनाव लड़ा। अपना मानना है कि जनता की नाराजगी कांग्रेस को भले जीता दें लेकिन पांच महीने बाद के लोकसभा चुनाव में इन तीनों राज्यों में मोदी-शाह के लिए फिर हवा बनाने का मौका कांग्रेस ने बनवा डाला है। इन प्रदेशों के तमाम कांग्रेसी नेताओं सं यथा अशोक गहलोत, सचिन पायलट, अजयसिंह, कमलनाथ आदि से सवाल यही बनता है कि इन्होंने चुनाव अपनी राजनीति की चिंता में लड़ा या मोदी-शाह के खिलाफ आंधी निकालने की शिद्दत से लड़ा? जवाब है कि कांग्रेसियों ने २०१४ से पहले के ढर्रे में ही चुनाव लड़ा है। नेताओं ने दिगाम के आग्रह-पूर्वाग्रह में उम्मीदवार बनवाए और माहौल को भाजपा के खिलाफ सघन बनवाने के बजाय उसे हल्का बनवाया। पार्टी के पांवों में दस तरह से कुल्हाड़ी मारी। मुझे मध्यप्रदेश में, राजस्थान में उम्मीदवार तय होने से पहले ऐसी कई सीटें जानकारों ने पार्टी नेताओं ने गिनाई जिसमें कहना होता था कि यदि फलां हो तो कांग्रेस निश्चित जीतेगी लेकिन फला कांग्रेसी अपने फंला प_े को वहां टिकट दिवाएगा और कांग्रेस हारेगी। जैसे भोपाल के नरेला में अजय सिंह हर हाल में महेन्द्र सिंह को, कमलनाथ पन्नाघर में सम्मति सैनी को या दिग्विजय सिंह या ज्योतिरादित्य सिंधिया फलां-फलां सीट पर अपने फलां-फलां प_ों को जरूर टिकट दिलाएंगे। वही हुआ। उसी चक्कर में उम्मीदवारों की पहली लिस्ट के बाद कांग्रेस की आगे की सूचियों में प_ों को टिकटों की बंदरबांट हुई और कांग्रेस का माहौल बिगड़ा। जाहिर है उम्मीदवार चुनते वक्त दिल्ली में कांग्रेस के कथित दिग्गजों दिल-दिमाग में विधानसभा चुनावों से मोदी राज के खिलाफ जनता की आंधी निकलवाने का मकसद नहीं था बल्कि एक-दूसरे के समर्थक ज्यादा न जीते और अपने प_ों को टिकट मिले। राजस्थान में पुराने स्थापित नेताओं को काटने की इसलिए राजनीति हुई ताकि चुनाव बाद विधायक दल की बैठक में अशोक गहलोत का नहीं बल्कि सचिन पायलट का बहुमत बने। यह खेल राहुल गांधी की छत्रछाया में हुआ। तभी राहुल गांधी भले नरेन्द्र मोदी कोहराने का मकसद लिए हुए हो लेकिन ये नाबालिग सियासी सलाहकारों और पुराने मैनेजरों के उस चक्रव्यूह में जकड़े हुए हैं जिसमें छोटे-छोटे स्वार्थ, जिला-प्रदेश स्तर की राजनीति में कांग्रेसी सांप-सीढ़ी का आपसी खेल खेलते हैं। राजस्थान घूमने के बाद बार-बार लगा कि यदि राहुलगांधी, अहमद पटेल को २०१९ में नरेन्द्र मोदी को हराने का लक्ष्य है तो इन्होंने कैसे पांच महीने पहले जन आक्रोश को ऐसे पंचर कराया! राहुल गांधी और अहमद पटेल को यदि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना भी है तो पहले चुनाव तो कम से कम प्रदेश की भावना के अनुसार लड़ते। कांग्रेसियों में झगड़ा नहीं बनवाते। हां, छह महीने पहले वसुंधरा राजे, मोदी राज के खिलाफ राजस्थान के उपचुनावों में भाजपा का सूपड़ा साफ था। तबके माहौल को तीन बातें अहम थी। शहर-गांव सब जगह माहौल बनाने वाले ब्राह्मण-बनिए भाजपा के खिलाफ हुए पड़े थे। ऐसे ही करणी सेना के राजपूत हो या जाट या मीणा और दलित बुरी तरह मोदी-शाह-राजे के राज से उखड़े हुए थे। इस बिगड़े सामाजिक समीकरण में तब अशोक गहलोत केक इर्द-गिर्द जनता केन्द्रित थी। उस नाते राहुल गांधी को दो टूक अंदाज में अशोक गहलोत को प्रोजेक्ट करना था। उपचुनाव के वक्त के माहौल का तीसरा तत्व था कांग्रेसियों की एकजुटा। तीनों, उपचुनावों को कांग्रेसियों (गहलोत, पायलट, सीपी जोशी, भंवर जितेंद्र सब) ने जुनून से लड़ा। मगर राहुल गांधी और उनकी नीयत टीम ने माहौल को सघन बनाने के बजाय माहौल बनाम सचिन पायलट की प्रतिस्पर्धा बनवाई। छह महीने बहस होने दी कि राहुल तो पायलट को उभारेंगे गहलोत को नहीं। शायद राहुल गांधी ने अध्यक्ष बनाते वक्त सचिन से मुख्यमंत्री बनाने का वायदा किया था तो वे कैसे गहलोत की कमान में राजस्थान में चुनाव लडऩे का माहौल बनने दें। इन बातों से प्रदेश पार्टी, जिला नेताओं में पायलट की डुगडुगी बनी। जबकि राजस्थान में कोई भी सर्वे करवा ले यह हकीकत है कि गुर्जर को लेकर आरक्षण के झगड़े के चलते जाट, मीणा सभी ओबीसी जातियां खुन्नस में हैं। ब्राह्मण, राजपूत, फारवर्ड हों या जाट, मीणा या दलित उससे सचिन पायलट ने अपनी गुर्जर नेताओं की घेरेबंदी से अपने को गुर्जर नेता बनाया हुआ है। तथ्य है कि गुर्जर से मीणा वोटों की खुन्नस का हिसाब लगा कर मोदी-शाह-राजे ने किरोाड़ीलाल मीणा को पार्टी में लाकर महत्व दिया। राजस्थान की इस सामाजिक हकीकत को समझने के बजाय राहुल गांधी ने न तो अशोक गहलोत को नेता प्रोजेक्ट किया और न ही जातियों की चिंता की। तभी भाजपा विरोधी सघन जन माहौल सामाजिक समीकरण में गड़बड़ाहट के चलते कांटे की लड़ाई में बदला । कांग्रेस में झगड़े हो गए। िजले में पुराने स्थापित नेता विधायक दल की बैठक् में वक्त क्योंकि अशोक गहलोत के समर्थक हो सकते हैं इसलिए सचिन पायलट ने सोच-समझकर उनकी काट के लिए जाट, ब्राह्मण, मीणा आदि जातियों में नए लोगों को बतौर समर्थक उम्मीदवार तैयार किया। गहलोत विरोधी नेताओं की गोलबंदी बनवाई जबकि अशोक गहलोत इस मुगालते में रहे कि वे दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय के चलते कमान में हैं तो राहुल गांधी, अहमद पटेल याकि चुनाव समिति पुराने-अनुभवी लोगों को ही उम्मीदवार बनवाएगी। ऐसा नहीं हुआ। प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने राहुल गांधी-अहमद पटेल के साथ अपनी केमेस्ट्री में अपने तर्क से लिस्ट को आखिर तक लटकाए रखा। ऐन वक्त जब लिस्ट बनी तो रातोंरात जिलों में माहौल बगावती हुआ। और लड़ाई कांटे की हो गई। २०० सीटों वाली राजस्थान विधानसभा की सीट नंबरएक सादुलशहर से लेकर १९९ नंबर वाली खानपुर सीट सबमें कांग्रेस आज गड़बड़ाई हुई है। मैं पहले आंधी के अपने अनुमान में कांग्रेस को १५०-१७० सीटें मान रहा था वहीं अब खुद कांग्रेसी जैसे-तैसे जीत की उम्मीद में है। नंबर एक सीट पर बागी ओम विश्नोई, नंबर दो गंगानगर में भी कांग्रेस के दो बागी राजकुमार और जयदीप, नंबर तीन करणपुर में भी कांग्रेसी पृथ्वीपाल संधु बागी! ऐसे कोई ४५ बागी कांग्रेसी उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। एकतरफ ये ४५ बागी तो दूसरी ओर सचिन पायलट की लिस्ट से कोई ५२-५४ ऐसे नए उम्मीदवार हैं जिनके आगे भाजपा का पलड़ा भारी लग रहा है। खुद सचिन पायलट के अजमेर लोकसभा क्षेत्र में दूदू में रितेश बेरवा, किशनगढ़ में नंदराम ठक्कर, मसूदा में राकेश पारीक नाम के जो चेहरे उन्होंने उतारे हैं वे बागी कांग्रेसियों से भी फंसे हैं तो भाजपा के दवेनानी से लेकर अनिता चंदेल और नसीराबाद में रामस्वरूप लांबा का पुराना भरोसे लौट आया है। पहले इन सभी सीटों पर भाजपा का सूपड़ा साफ था। सो बागी उम्मीदवारों, कांग्रेस की अंदरूनी फुट, बिगड़ते जातीय समीकरण (इसके चलते बसपा, आरएलटीपी नाम की पार्टी भी कई जगह अच्छे वोट काटेगी) में सब गड्डमगड्ड है। सचिन पायलट ने अपने भरोसे की कसौटी पर जो नए चेहरेउतारे उन सीटों पर मुकाबला ज्यादा फंसा है। मतलब श्रीगंगानगर, रायसिंहनगर, पीलीबंगा, भादरा, रतनगढ़, खांडेला, नीम का थाना, विराटनगर, शाहपुरा, फुलेरा, दूदू, आमेर, विद्याधर नगर, नदबई, धौलपुर, राजाखेड़ा, करौली, सपोतरा, बांदीकुई, दौसा, गंगापुर, निवई, किशनगढ़, पुष्कर, अजमेर-उत्तर, अजमेर-दक्षिण, रसीराबाद, ब्यावर, मसूदा, लाडन, मेडता, परबतसर, बिलाड़ा, जालौर, भीनमाल, रानीवाड़ा, आंता, छाबड़ा, भीलवाड़ा जैसी सीटों में कांग्रेस ऐसे विकट मुकाबले में फंसी है कि उसकी चर्चाओं, नेरेटिव से ही पार्टी की हवा गड़बड़ा गई है। यह हकीकत निश्चित ही जयपुर में डेरा डाले अहमद पटेल, गुलामनबी आजाद और मुकुल वासनिक से लेकर राहुल गांधी और उनकी सलाहकार टम को अभी भी समझ आ रही होगी। कांग्रेस ने छह महीने में अपनी आंधी को पांवों पर कुल्हाड़ी मार कर जैसा सपाट और कांटे की लड़ाई में कनवर्ट करवाया है उससे यह खटका बना दिया है कि जनता को धक्का भले कांग्रेस को जीतवा दे लेकिन राहुल गांधी और उनकी टीम आगे और गलती करेगी। पांच महीने बाद के लोकसभा चुनाव में राजस्थान और उत्तरप्रदेश में ही भाजपा सर्वाधिक चैक बाउंस करेगी।
०-नया इंडिया के कालम ”अपन तो कहेंगे!’ से साभार)
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