राष्ट्रभक्ति किसी की भी बपौती नहीं… ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
पिछले कुछ सालों से हर क्षेत्र में राजनीति ने प्रवेश कर लिया, सिर्फ राष्ट्रभक्ति ही शेष रह गई थी, उसमें भी अब राजनीति अपना दखल दिखाने लगी है। हाल ही में मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने जहां तेरह वर्ष से माह के प्रथम दिन सचिवालय के सामने सामूहिक रूप से गाए जाने वाले ‘वन्दे मातरम’ गान पर प्रतिबंध लगा दिया वहीं गुजरात की भाजपा सरकार ने स्वयं के स्कूलों में छात्रों की हाजरी के समय ‘उपस्थित’ ‘जी सर’ या ‘यस सर’ कह कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पर प्रतिबंध लगाकर उसकी जगह ‘जय हिन्दी’ या ‘जय भारत’ बोलने के निर्देश जारी किये हैं, अर्थात अब राष्ट्रभक्ति किस लहजे में प्रस्तुत की जाए, इसका निर्देश भी सत्तारूढ़ दल अपनी सरकारों के माध्यम से देंगे और उनका आपको पालन करना ही होगा, वरना…! यद्यपि अभी तक देश में यही माना जाता रहा है कि राष्ट्रभक्ति किसी दल या समूह विशेष की बपौती नहीं है, किन्तु मध्यप्रदेश की कांग्रेस और गुजरात की भाजपा सरकार ने इस वास्तविकता को झुठला दिया है। पिछले सत्तर सालों से कांग्रेस यही कह रही है कि देश को आजादी उसी ने दिलाई और राष्ट्रपिता ने इसी दृष्टि से आजादी के बाद कांग्रेस दल को विघटित करने की सलाह भी दी थी किंतु पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस ने राष्ट्रपति काउतना परिचय नहीं दिया, जितना भाजपा दम भर रही है। उसने हिन्दुत्व को राष्ट्रभक्ति से जोड़कर अपना नया नारा तैयार किया और उसी को हर जगह दुहरा रही है, यही नहीं इस नारे को साम्प्रदायिकता से जोड़कर अब यहां तक कहा जाने लगा कि ‘अगर भारत में रहना है तो, भारत माता की जय’ कहना ही होगा। मूल रूप से आज के राजनीतिक माहौल को देखकरयह कहा जाए कि आज की राजनीति ने राष्ट्रभक्ति का चोला ओढ़ कर अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने का संकल्प ले लिया है तो कतई गलत नहीं होगा ओर आज की तो वास्तविकता भी यही है। अब सत्ता प्राप्ति का मकसद जनसेवा या जन कल्याण खत्म हो गया है, इसकी जगह अब स्वार्थ सिद्धि और अपने राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति और सत्ता में दीर्घजीवी होना हो गया है। उसके ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों की हाल ही में गइित सरकारें हैं, अब अपनी सरकार बनते ही सत्तारूढ़ दल का पहला काम पूर्व सरकार के फैसलों को बदलना होता है, फिर वे चाहे जन-कल्याण या राष्ट्रभक्ति की दृष्टि से सही हो या गलत? आज की सरकारों को ‘विकास’ सिर्फ नारे तक सीमित होकर रह गया है, चुनावी वादे या घोषणा-पत्र अब ‘जुमले’ बनकर रह गए हैं औरअ ाम वोटर की आकांक्षाएं सिर्फ कल्पना या ‘मुंगेरीलाल के सपने’ बनकर रह गई है। क्या हमारे उन लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों या आजादी की बलिदेवी पर शहीद होने वाले वास्तविक राष्ट्रभक्तों ने कभी ऐसी कल्पना की थी कि महज सत्तर सालों में देश की ऐसी कायापलट की थी कि महज सत्तर सालों मतें देश की ऐसी काायापलट हो जाएगी? क्या हमारे राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान लिखने वाले राष्ट्रीय कवियों ने यह सोचा था कि उनकी रचनाएं राजनीति में बंटकर रह जाएंगी और उन पर प्रतिबंध लग जाएगा? लेकिन यह सब हमारे सामने है। अब राजनीति लोकसेवा या जन-कल्याण का माध्यम नहीं रही अब यह सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बन कर रह गई, या फिर पूर्वाग्रह आधारित बदले की राजनीति का सूत्र बन गई है? और यही सत्ता प्राप्ति के बाद प्राथमिकता के बिन्दु बन गए हैं। अब सवाल यह कि हमारे आधुनिक भाग्यविधाताओं की इस आत्मघाती और विनाशाकारी सोच को बौन बदले? इसका जवाब सिर्फ और सिर्फ देश का आम मतदाता हैं, जिसे समयानुसार जागरुक होकर स्थिति परिस्थिति में बदलाव लाने के ठोस कदम उठाना पड़ेंगे। हमारे संविधान और लोकतंत्र पद्धति के तहत आम वोटर को सौंप गए अहम उत्तरदायित्व का निर्वहन सही पद्धति से उसे करना होगा, या यों कहें स्वार्थ सिद्धि में लिप्त हमारे इन आधुनिक भाग्य विधाताओं को माकूल सबक सिखाना होगा। वह भी समय रहते, वर्ना न सिर्फ हमारे देश बल्कि पूरे जनजीवन की व्यवस्थाएं तहस-नहस हो जाएगी और उसके जिम्मेदार ये राजनीतिक भाग्यविधाता नहीं हमारे देश का आम मतदाता भी होगा। इसलिए राष्ट्रधर्म को राजनीति से बाहर रखना ही होगा।
०-नया इंडिया के कालम ”राष्ट्रभक्ति विरुद्ध राजनीति” से साभार)
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