रघु’ के बिना क्या ‘शरद’ की साझी विरासत परवान चढ़ेगी

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०- अरुण पटेल

पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता शरद यादव लगभग डेढ़ दर्जन विपक्षी दलों के साथ मिलकर साझी विरासत बचाने का जो अभियान छेड़े हुए हैं उसे बिना लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के संस्थापक और प्रखर समाजवादी नेता रघु ठाकुर के साथ आये बिना क्या परवान चढ़ाया जा सकेगा। केवल परवान चढऩे का ही सवाल नहीं बल्कि जिस विरासत को बचाने की कोशिश की जा रही है उस धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी मूल्यों के वाहक और उसके प्रति प्रतिबद्ध राजनेताओं में देश में एकमात्र प्रतिनिधि चेहरा रघु ठाकुर ही हैं। उन्होंने निजी स्वार्थ और सुख सुविधाओं के लिए कभी समाजवादी मूल्यों से समझौता नहीं किया। अपने सामथ्र्य-भर गरीब गुरबा जरूरतमंद एवं शोषित-पीडि़त मूक लोगों को वाणी देने का काम किया है। चूंकि शरद यादव और रघु ठाकुर मध्यप्रदेश के मूल निवासी हैं और दोनों का लक्ष्य भी लगभग एक ही है लेकिन राहें जुदा हो गयी हैं। किसी जमाने में यह जुगलजोड़ी देश में समाजवादी युवा शक्ति का पर्याय मानी जाती थी। आज भी रघु ठाकुर सक्रिय हैं और समाजवाद और लोगों की समस्याओं के लिए जमीनी स्तर पर पूरे देश में भ्रमण करते हुए जहां जरूरी होता है वहां जमकर शोषण, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आवाज भी बुलंद करते हैं। अनेक समाजवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की यह सोच है कि यदि यह जुगलजोड़ी फिर बन जाती है तो साझी विरासत बचाओ के शरद यादव के अभियान को सैद्धांतिक आधार पर भी प्रामाणिकता मिल जाएगी। अन्य जो गैर-कांग्रेसी लोग इस अभियान में जुड़े हुए हैं उनके सामने साख का संकट रहता है क्योंकि कभी न कभी किसी न किसी रूप में उन्होंने भाजपा के साथ या तो सत्ता में सहभागिता की है या सत्ता के पायदान तक उसे पहुंचाने में मददगार साबित हुए हैं।

रघु ठाकुर के बिना क्या संघर्ष को धार देते हुए प्रामाणिकता दी जा सकती है। यह सवाल इसलिए उठता है कि शरद यादव ने इंदौर में जो साझी विरासत का आयोजन किया था उसमें अपेक्षित भीड़ नहीं जुट पाई, हालात यह थे कि आधा हाल खाली था जो भरा नहीं जा सका। शरद यदि यह सोचते हैं कि कांग्रेस का साथ मिलने से भीड़ जुट जायेगी तो उनकी यह सोच कांग्रेस के ढांचे को देखकर तो सही हो सकती है लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं के आचार-व्यवहार को यदि देखा जाए तो उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। कांग्रेसी कार्यकर्ता भीड़ किसी दूसरे के लिए नहीं केवल अपने नेता के लिए जुटाते हैं। इंदौर के आयोजन में आनंद शर्मा के स्थान पर यदि कमलनाथ या ज्योतिरादित्य सिंधिया या दोनों आये होते तो इतनी भीड़ जुटती जिसकी कल्पना शायद शरद ने नहीं की होगी। चूंकि आनंद शर्मा का मध्यप्रदेश के कांग्रेसियों से कोई लेना-देना नहीं रहा है इसलिए उनके लिए भीड़ कौन जुटाता और जितने लोग आरंभ में आये थे, वह भीड़ ठीकठाक थी लेकिन दिग्विजय सिंह के भाषण देकर जाते ही लोगों की संख्या काफी कम हो गयी थी। इंदौर में हुए साझा विरासत बचाओ के आयोजन में जितने लोगों को बड़े-बड़े पार्टियों के चेहरे आगे कर जुटाया जा सका उससे अधिक लोग तो रघु ठाकुर के जहां भी आयोजन होते हैं वहां जुट जाते हैं। चूंकि दोनों नेता मध्यप्रदेश के हैं इसलिए साझा विरासत की सफलता या विफलता का असर बचे-खुचे समाजवादी आंदोलन पर पड़ सकता है। जिस प्रकार प्रतिबद्धता को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की साख पर सवालिया निशान लगा है उससे थोड़ा ही कम शरद यादव की साख को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं क्योंकि वे भी एनडीए में रहते हुए अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

जहां तक साझी विरासत का सवाल है क्या रघु ठाकुर उसका हिस्सा बनेंगे जिसका इंजन कांग्रेस हो, क्योंकि वे अभी तक कांग्रेस और भाजपा दोनों से समान दूरी की नीति पर चलते हुए केवल समाजवाद का अलख जगाते रहे हैं। यह सवाल पूछने पर कि क्या वे साझी विरासत बचाओ अभियान में भागीदार हो सकते हैं और क्या कांग्रेस इसमें आड़े नहीं आयेगी का उत्तर देते हुए रघु ठाकुर कहते हैं कि राजनीतिक छुआछूत में मेरा कोई विश्वास नहीं है और मैं केवल महात्मा गांधी को मानता हूं जो निरन्तर इंसान के बदलाव में विश्वास करते रहे। इस अभियान पर सवालिया निशान लगाते हुए इसे कारगर बनाने के संबंध में रघु की सोच साफ है और वे कहते हैं इतिहास के पत्थरों को तोड़कर साझी विरासत की जो कल्पना करते हैं वह विरासत ही नहीं हो सकती है। इस अभियान की प्रासंगिकता, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के लिए यह जरूरी है कि पहले साझी विरासत की परिभाषा की जाए। यह बात भी साफतौर पर रेखांकित की जाना चाहिए कि जब विरासत बचाने की बात कर रहे हैं तो क्या जो नेता आये हैं वे अपने वादों जैसे विचारधाराओं की प्रतिबद्धताओं, दलीय नेतृत्व की, राष्ट्रीय संस्कृति, इतिहास की या फिर समाज के बदलाव की किस विरासत को साझा करने और बचाने की बात करते हैं वह साफ-साफ नजर आना चाहिए। यह पहले होना चाहिए ताकि करने का जो ध्येय है उसको लेकर जनमानस के मन में किसी प्रकार का भ्रम न हो।

जहां तक शरद यादव और रघु ठाकुर की जुगलजोड़ी का सवाल है दोनों ने एक मित्र और विश्वसनीय सखा के रूप में छात्र राजनीति में प्रवेश किया था। वैसे यह अतीत का एक ऐसा पहलू है जिसे आज भले ही आसानी से स्वीकारने में शरद को झिझक महसूस हो लेकिन उस समय के हालातों को जो जानते हैं उन्हें भलीभांति मालूम है कि शरद यादव को तराशने, निखारने और सत्ता की सीढ़ी पर आगे बढ़ाने में रघु का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1974 में जब कांग्रेस काफी मजबूत पार्टी हुआ करती थी और जयप्रकाश के नेतृत्व में आंदोलन गति पकड़ रहा था उस दौरान जबलपुर में सेठ गोविंददास के निधन से लोकसभा के उपचुनाव के हालात पैदा हो गए थे। इसी दौरान जबकि उम्मीदवार का चयन लगभग अंतिम दौर में था, जबलपुर में मध्यप्रदेश युवा संघर्ष समिति के सम्मेलन को सम्बोधित करने तत्कालीन प्रखर समाजवादी नेता मधु लिमये जबलपुर आये थे। जबलपुर से उन्हें झांसी जाकर ट्रेन पकडऩा थी और रास्ते में रघु ठाकुर उनके साथ थे। झांसी आते-आते रास्ते में उन्होंने इस ढंग से पैरवी की कि अंतत: मधुजी भी कुछ अनमनेपन से शरद के नाम पर सहमत हो गए। उस समय शरद को लेकर जिस एक बात पर उन्हें शंका थी वह बाद में सही निकली। जबलपुर से जितने भी संभावित उम्मीदवार हो सकते थे उन सबके नामों पर एक-एक कर रास्ते में चर्चा हुई और अंतत: रघु ठाकुर अपनी बात मनवाने में सफल रहे। इस बीच में यह तय हो गया था कि हरि विष्णु कामत जनता उम्मीदवार के रूप में उपचुनाव में उतरेंगे। मधु लिमये ने दिल्ली में जार्ज फर्नांडीज और सुरेंद्र मोहन को तैयार कर अंतत: जनता उम्मीदवार शरद यादव को बनवाने में सफलता प्राप्त की। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में किसी न किसी बड़े समाजवादी नेता के सहारे शरद यादव आगे बढ़ते गए और अब विपक्ष की राजनीति में एक बड़ा चेहरा हैं। जहां तक रघु ठाकुर का सवाल है वे समाजवाद की मूलधारा से कभी नहीं हटे और अवसरवादी समझौता नहीं किया। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने उन्हें समय-समय पर अपने दल की टिकिट पर लडऩे का आफर दिया जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। सत्ता के स्थान पर संघर्ष और जनता की राजनीति ही करते रहे और जनता दल व समाजवादी पार्टी के वे राष्ट्रीय महासचिव भी रहे। जब उन्हें लगा कि समाजवादी पार्टी जातिवाद और मुलायम के परिवारवाद तक सिमटती जा रही है तो उन्होंने उत्तरप्रदेश में इस पार्टी की सरकार होते हुए भी पार्टी छोड़ दी और अपनी स्वयं की लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी बनाई। जनता दल के अलग-अलग धड़ों में जातिवाद और परिवारवाद बढऩे लगा तो उन्होंने अपनी राह अलग चुन ली। चूंकि अब साझी विरासत बचाने का अभियान चल रहा है और उसके अगुवा शरद यादव हैं यदि ये दोनों पुराने संगी-साथी मिल जाते हैं तो इस अभियान को अधिक प्रामाणिकता मिल जायेगी।
०- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।
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