ये चुनाव पिछले चुनावों से अलग क्यों … ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
आज देश का हर मतदाता यह महसूस कर रहा है कि २०१९ के लोकसभा चुनाव पिछले चुनावों से काफी अलग है, आज वोट मांगने के लिए कोई भी दल या उसके नेता मतदाताओं के हित की बात क्यों नहीं कर रहा? साथ ही कोई भी दल व उसके नेता अपने दल के घोषणा-पत्र में समाहित मुद्दों पर बहस या चर्चा क्यों नहीं करता? साथ ही सत्तारूढ़ दल सेना के शौर्य को अपनी राजनीतिक ढाल क्यों बना रहा? फिर सबसे अहम और बड़ी बात इस चुनाव में यह देखी जा रही है कि राजनीतिक दल वोट हासिल करने के लिए प्रतिपक्षी दलों व उसके नेताओं पर निजी प्रहार कर रहे हैं, यहां तक कि दिवंगत शहीदों को भी वे नहीं बख्श रहे हेँ। इन्हीं कुछ दृष्टियों से २०१९ के चुनाव पिछले चुनावों से अलग नजर आ रहे हैं, क्योंकि इस बार ‘मतस्पर्धा।Ó के दौर में वे सब हीन हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जो इससे पहले कभी भी नहीं अपनाए गए। भारत की आजादी के बाद से अब तक के सढ़सठ वर्षों में जितने भी चुनाव हुए हैं वे सब राजनीतिक दलों के अपने सिद्धांतों के आधार पर हुए, यदि हम शुरू के तीन चुनाव को छोड़ भी दें तो उसके बाद हुए एक दर्जन चुनाव देश के मतदाताओं के कल्याण के मुद्दों पर चुनाव लड़े गए हर दल अपने तरीके कसे प्रलोभन की थाली परोसता था और उसी आधार पर मतदान होता और सरकारें बनती रही, ये प्रलोभन चुनावी घोषणा-पत्रों के माध्यम से दिए गए किंतु इस बार प्रमुख राजनीतिक दलों ने खासकर के सत्तारूढ़ दल ने तो अपना घोषणा-पत्र उसके सार्वजनिक विमोचन के बाद बस्ते में बांधकर रख दिया और सत्तारूढ़ दल जहां राष्ट्रवाद और सेना के शौर्य (स्ट्राइक्स) का मुद्दा बनाकर मत बटोरने का उपक्रम करने लगा तो प्रतिपक्षी दल सत्तारूढ़ दल की आलोचना अर्जित करने का प्रयास करने लगा। यद्यपि हर दल का नेता यह जानता है कि अब देश का मतदाता पांच दशक पूर्व वाला अनजान मतदाता नहीं रहा, किंतु फिर भी इन्होंने आम मतदाताओं को बुद्धू बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी फिर इस चुनाव में यह भी पहली बार ही देखने में आ रहा है कि सत्तारूढ़ दल अपनी सरकार की पांच साल की उपलब्धियों का बखान नहीं कर रहा और उसने अपनी सरकार की उपलब्धियों को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया। शायद इसीलिए क्योंकि मौजूदा सरकार की पांच साल की सत्ता की उपलब्धियां कम और बदनामी के कदम ज्यादा हैं, यदि सरकार अपनी चंद उपलब्धियां गिनाती है तो फिर जनता की सरकार के नोटबंदी, जीएसटी व जनता से जुड़े फैसलों के कारण पहुंची पीड़ा भी याद आएगी और इससे वोट हासिल करने के बजाए सत्तारूढ़ दल के हाथों से खिसक जाने की संभावना बढ़ जाएगी बस इन्हीं कारणों से उपलब्धियां सरकारी पीड़ादायक फैसलों में गुम हो गई। …और इसीलिए कभी सेना का शौर्य याद आता है तो कभी राष्ट्रवाद या प्रतिपक्षी नेताओं की खामियां। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह चुनाव ही पिछले चुनावों से अलग नहीं हैं, बल्कि हमारे मौज्ूदा प्रधानमंत्री जी भी पिछले प्रधानमंत्रयों से बहुत कुछ अलग हैं, प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह जी ने प्रधानमंत्री पद की गरिका को बनाए रखा, इनमें भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल हैं, किन्तु मौजूदा प्रधानमंत्री जी ने पद की गरिमा को अपनी निम्नस्तरीय वाणी, संवाद और अहम के द्वारा धूल धुसरित करके रख दिया। आज तक किसी भी पूर्व प्रधानमंत्री ने किसी भी शहीद को निशाना नहीं बनाया, किंतु मौजूदा प्रधानमंत्री ने संचार क्रांति के सहायक पूर्व प्रधानमंत्री शहीद राजीव गांधी को भ्रष्टाचारी कहकर पद की गरिमा को काफी चोट पहुंचाई, ऐसा करके प्रधानमंत्री जी ने अपने आपको शहीद करकरे की आलोचना करने वाली नादान प्रज्ञा ठाकुर की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। आज तो राजनीति में सिद्धांत, मयाछा जैसी कोई चीज नहीं रही है तो सिर्फ अधिक से अधिक मत प्राप्त करने की तकनीक, फिर वह चाहे वैध हो या अवैध … ?
०-नया इंडिया के कालम ”गहरे पानी पैठ” से साभार)
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