ये कैसा मोदी मंत्र; राह से भटका अर्थतंत्र … ?

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०-ओमप्रकाश मेहता
देश की मोदी सरकार द्वारा पिछले साढ़े चार साल से देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े लिए गए फैसलों के दूरगामी परिणाम अब सामने आने लगे हैं। आज जहां अपनी बदहाली पर आंसू बहाते हुए देश की बैंकों की ‘जननी’ रिजर्व बैंक ने परेशान होकर मोदी सरकार को खुलेआम नसीहतें देना शुरू कर दिया है, वहीं केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने भी बैंकिंग प्रणाली में सुधार की जरूरत जताई है। रिजर्व बैंक गवर्नर ने तो भुगतान प्रणाली के बदलने पर ही सरकार को चेतावनी दे दी है कि ‘भुगतान प्रणाली ऐसे बदलें कि देश का आर्थिक ढांचा ही हिल जाए? देश के विदेशी मुद्रा भण्डार में आई बड़ी गिरावट को लेकर भी अर्थशास्त्रियों ने चिंता जताते हुए कहा है कि रुपए को सम्हालने की रिजर्व बैंक की कोशिशों के बावजूद डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की गिरावट जारी है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार २००२ के बाद से यह रुपए की सबसे बड़ी गिरावट है।’ भारत में बैंकों के दुरावस्था को लेकर रिजर्व बैंक ने पहली बार इस तरह की नसीहत भरी चेतावनी सरकार को दी है। बैंक ने अपने चेतावनी नोट में कहा है कि सरकार की भुगतान व निपटान कानूनों में सुधार को लेकर गठित समिति की सिफारिशें देश की आर्थिक सेहत के लिए ठीक नहीं हैं। रिजर्व बैंक ने कहा कि भुगतान प्रणाली का नियमन केन्द्रीय बैंक के पास ही रहना चाहिये। गौरतलब है कि सरकार ने आर्थिक मामलों के सचिव की अध्यक्षता में भुगतान व निपटान प्रणाली (पीएसएस) कानून २००७ में संशोधनों को मूर्तरूप देने के लिए एक अंतर्मत्रालयीन समिति गठित की थी। शीर्ष बैंक ने अपने असहमति नोट में कहा है कि बदलाव ऐसा नहीं होना चाहिये कि इसमें मौजूदा ढांचा ही दिल जाए? पेमेंट नियमन बोर्ड पर बैंक का ही नियंत्रण होना चाहिए। गौरतलब है कि डिजिटल पेमेंट में बैंक के बीच लेन-देन होता है। यही कारण है कि रिजर्व बैंक पीआरबी को अपनी निगरानी में रखना चाहता है। रिजर्व बैंक का कहना है कि दुनियाभर में क्रेडिट व डेबिट काडर््स बैंक ही जारी करते हैं। ऐसे में इन पर दोहरे नियम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और गिरते रुपए के मद्देनजर महंगाई के और अधिक खतरे को स्वीकार किया है। समिति ने संकेत दिए हैं कि वह आने वाले महीनों में रेपो रेट में वृद्धि कर सकती है। समिति ने अक्टूबर में हुई अपनी मीटिंग में जारी मिनट्स के अनुसार समिति के अधिकांश सदस्यों ने महंगाई की बढ़ती आशंका को रेखांकित किया है। जहाँ तक देश में विदेशी मुद्रा के भण्डार में आई कमी का सवाल है, पिछले एक सप्ताह में ३७८ हजार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा में कमी आई। इसी तरह से देश के अर्थशास्त्रियों के साथ रिजर्व बैंक भी देश के कमजोर अर्थतंत्र को लेकर परेशान है। इधर केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने भी वर्तमान आर्थिक हालातों को लेकर काफी चिंता व्यक्त की है। आयोग की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि घोटालों की डूबत कर्ज से बचने के लिए बैंकिंग प्रणाली में बड़े सुधारों की सख्त जरूरत है। पंजाब नेशनल बैंक में १४३०० करोड़ के घोटाले के बारे में सतर्कता आयोग ने कहा है कि इसमें हीरा कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी की कम्पनियों को फर्जी तरीके से कर्ज दिया गया था। आयोग ने स्पष्ट कहा कि धोखाधड़ी के मामलों में छोटे कर्मियों पर ठीकरा फोडऩे के बजाए, हर स्तर पर जवाबदारी तय होना चाहिए। यह तो हुई देश के अर्थशास्त्रियों व देश की सबसे बड़ी बैंक के साथ सतर्कता आयोग की चिंता, किंतु यदि दैनंदिनी आर्थिक परेशानी से जूझ रहे आम आदमी से बात की जाए तो यह भी इस स्थिति के लिए मौजूदा केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों व सरकार द्वारा लिए गए फैसलों को इस दुरावस्था को दोषी मानता है। आम आदमी इस दुरावस्था के लिए सर्वप्रथम नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी को ही दोषी मानता है। देश के शिक्षित बेरोजगार भी अपनी स्वयं की दुरावस्था के लिए सरकार के इन फैसलों को दोषी मानते हैं। कुछ जागरूक नागरिक सरकार में या सरकार के पास कोई बड़ा आर्थिक विशेषज्ञ न होना भी इन फैसलों का कारण मानतेह हैं। वहीं सरकार से जुड़े आर्थिक विशेषज्ञ दबी जबान से इस दुरावस्था के लिए स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा आर्थिक तंत्र से जुड़े फैसले लेना बता रहे हैं। अब कारण जो भी हो किंतु आज हर विद्वान या अनपढ़़ देश ‘अर्थ’ के इस ‘अनर्थ” के लिए मौजूदा केन्द्र सरकार के अदूरदर्शी आर्थिक फैसलों को ही दोषी बता रहा है।
०-नया इंडिया के कालम ‘अर्थ’ का ‘अनर्थ” से साभार)
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