ये कुछ और नहीं, सीधे-सीधे गुलामी है!

0
49

०-रविश कुमार
कई बैंक के अधिकारी-क्लर्क मुझे लिख रहे हैं कि बैंक की तरफ से उन्हें शेयर लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कोई अपनी मर्जी से शेयर नहीं ले रहा है लेकिन हर कसी पर उससे बड़े अफसर के जरिए फोन कर दबाव डाला जा रहा है थ्क वो शेयर खरीदे। बैंक मैनेजरेां के बारे में यह तय करें कि आप दो लाख रुपये के शेयर खरीदें और वो भी बैंक के तो यह कुछ और है। बल्कि कुछ और नहीं सीधे सीधे गुलामी है। यह मुमकिन होता हुआ देख पा रहा हूं कि इतने बड़े तबके को गुलाम बनाया जा सकता है। एक बैंक की बात नहीं है। कई बैंकों के लोगों ने मुझे लिखा है। मैंने दो बैंकों के आदेश आज पढ़ डाले। आंतरिक पत्र हैं। नाम नहीं दे रहा हूं। एक बैंक के एक आदेश में लिखा है कि बैंक के सीईओ, प्रबंध निदेशक से लेकर तीनों कार्यकारी निदेशक तक हाथ जोड़ कर अपील करते हैं कि अपनी संस्था को बचाने के लिए प्लीज शेयर खरीदें। हमारे ५४ जोन हैं मगर संतोषजनक प्रगति नहीं हुंई है। बैंकों के जोन को टारगेट दिया गया है कि इतने करोड़ तक का शेयर खरीदें। यहां तक कि यूनियश्र के नेताओं ने भी अपील की है कि शेयर खरीदें। ग्रेड एक से चार तक के अधिकारियों से कहा गया है कि वे ढाई लाख तक के शेयर खरीदें। क्लर्क से डेढ़ लाख तक के शेयर खरीदने की बात कही गई है। इस स्कीम का नाम इम्पाई स्टाक परजेच स्कीम (ईएसपीएस) है। बैंक के एक शेयर के भाव ८० रुपये हैं। मैंने आदेश की कापी देखी है। जो मैनेजर शेयर खरीदने से इंकार कर रहे हैं उनका तबादला कर दिया जा रहा है। एक दूसरे बैंक के आदेश पत्र से पता चलता है कि बैंकों के कर्मचारियों के डी-मैट अकाउंट खुलवाए जा रहे हैं। बकायदा वीडियो कान्फ्रेंसिंग हो रही है कि कैसे डीमेट अकाउंट खोलें। जिनके हैं उन्हें सक्रिय रखने को कहा जा रहा है। ताकि शेयर ट्रांसफर का काम बिजली की गति से हो सके। इस बैंक के आदेश में लिखा है कि बैंक कर्मचारियों को शेयर जारी कर अपने लिए पूंजी जमा करने जा रहा है। सभी कर्मचारियों से उम्मीद की जा रही है कि वे डी-मेट अकाउंट खोलें। यहां तक लिखा है कि शाम को दफ्तर छोडऩे से पहले सभी ब्रांच कंफर्म करें कि डी-मेट अकाउंट खुला या नहीं। बताइये क्या गरिमा रह गई है इन बैंकरों की? ये सभी सरकारी बैंक हैं। बैंकरों ने बताया है कि उन्हें मजबूर किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि पैसे नहीं हैं तो ओवर-ड्राफ्ट करें। उसका ब्याज देना होता है। फिर उस पैसे से बैंक के पैसे खरीदें ताकि बैंक के पास पूंजी आ जाए। कमाल का आइडिया है।द्य इस देश में टीवी पर राष्ट्रवाद चल रहा है और दफ्तरों में इंसान की गरिमा कुचली जा रही है। एक नागरिक को शेयर खरीदने के विकल्प तक नहीं है। क्या सेबी या कोई नियामक संस्थाएं मर गई हैं? क्या बैंकरों ने अपनी नागरिकता बिल्कुल खो दी है कि इसमें उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता? अपने रिश्तेदारों को बता सकते थे, विपक्ष के नेताओं तक बातें पहुंचा सकते थे कि हमारे साथ हो रहा है, पत्रकारों को बता सकते थे, आखिर चुप कैसे रह गए? क्या बैंकरों के भीतर काम करने वाले इतनी सी बात नहीं समझे कि सिरिंज से उनका खून खींचा रहा है? फिर बैंकर बार-बार लाख बैंकर बीस लाख बैंकर परिवार क्यों करते हैं? ऊपर से अर्थव्यवस्था कितनी चमक रही है। इस चमक के शिकार बैंक वाले भी है। उनमें से भी बहुत होंगे जिन्हें ये गलत नहीं लगता होगा। अगर आपके रिश्तेदार सरकारी बैंकों में हैं तो उनसे पूछे कि क्या आपके साथ ऐसा क्या हुआ है? क्या आपको मजबूेर किया गया है कि बैंक से कर्ज लेकर शेयर खरीदें? कम से कम आप उनसे यह प्रश्न पूछ कर उन्हें बताने का मौदा दें। उन्हें खुद को जिंदा नागरिक समझने का मौका दें। इसका मतलब है कि बाजार में जिसे जो शेयर खरीदना है वो खरीदे। मगर बैंक कैसे मजबूर कर सकता है कि आप हमारा शेयर ढाई लाख का खरीदें ही। इस तरह से एक कर्मचारी से ढाई लाख और एक लाख के शेयर सिरिंज से खून की तरह खींच कर सालाना रिपोर्ट ठीक की जा रही है। मैंने बैंक सिरिंज की शुरुआत में ही और शायद पिछले साल इसी वक्त लिखा था कि बैंकों के भीतर गुलामी चल रही है। तब लगा था कि मैं गलत हूँ। मैं कौन सा समाजशास्त्री हूँ। इतनी बड़ी बात कैसे कह दी कि बैंकों में गुलामी की प्रथा चल रही है। लेकिन अब मैं इसे होते हुए देख रहा हूँ। अगर बैंकर गुलाम हो सकते हैं तो बाकियों की क्या हालत होगी। सोचिए आज बैंकरों के लिए कोई नहीं है। बैंकर भी खुद के नहीं हैं। जब मनुष्य नहीं रह जाता तो सब एक दूसरे की पीठ की चमड़ी उधेडऩे लगते हैं। अपनी पीठ से खून बह रहा हो ता है, मगर सामने वाले की पीठ की चमड़ी समेट रहे होते हैं। आर्थिक नीतियों का यह दौर हमसे कितनी कीमत मांग रहा है। अब लगता है कि चैनलों पर प्रोपेगेंडा न होता तो ये लोग अपने दर्द को कहां जाकर कम करते। मरे हुए मनुश्यों और अधमरे नागरिकों के बीच राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता का इंजेक्शन काम कर गया है। कम से कम रोज शाम को गर्व तो करते होंगे। उनके जीवन में भले गौरव न बचा हो मगर टीवी के जरिए स्टूडियो के सेट में बदल दिए गए भारत को देखकर अचंभित हो उठते होंगे। गौरव करते होंगे। बीस लाख बैंकर्स शून्य में बदल चुके हैं। वे सुन्न हो चुके हैं। हम उनका हाल जानकर सन्न रह गए हैं।
०- लेखक एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार हैं (नया इंडिया से साभार)
००००००००००००

LEAVE A REPLY